श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 361, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्री०ख०-अ०३७ ] * देवपत्नियोंद्वारा की गयी गजाननस्तुति * ३५९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ] है। आप विश्वकी रक्षा करनेमें तत्पर रहते हैं, नाना प्रकारके अवतार धारण करनेवाले आपको नमस्कार है ॥ ६ ॥ अपने हाथोंमें अनेक आयुध धारण करनेवालेको नमस्कार है। सभी शत्रुओंका विनाश करनेवालेको नमस्कार है। हे भक्तोंके हितकारक ! अनेक वर प्रदान करनेवाले आपको नमस्कार है१॥ ७ ॥ ब्रह्माजी बोले—इस प्रकार उनकी स्तुति करके पुनः उन्हें प्रणाम करके उन्होंने बहुत-से वरोंकी याचना की ॥ ७१/२ ॥ वे बोलीं—हे देव ! जलरूपताको प्राप्त देवताओंको आप उनका पूर्व स्वरूप प्रदान करें तथा आप ऐसी कृपा करें कि हम कभी भी आपका विस्मरण न करें, सर्वदा स्मरण करते रहें ! ॥ ८१/२ ॥ गणेशजी बोले—तुम सबने अपनी पूजा- आराधनाके द्वारा मुझे अपने वशमें कर लिया है। अतः मैं तुम सबकी मनोभिलषित वाञ्छाको अवश्य पूर्ण करूँगा। तुम्हारे द्वारा की गयी इस स्तुतिसे शीघ्र ही प्रसन्न होकर 'तुम्हारी अभिलाषा पूर्ण होगी।' ऐसा वचन मैं देता हूँ ॥ ९१/२ ॥ देवी सावित्रीके कथनानुसार सभी देवता मंगलमय जलरूपमें परिणत हुए हैं। उन देवीके वचनको अन्यथा करनेमें पितामह ब्रह्माजी भी समर्थ नहीं हैं, अतः सभी देवता एक अंशसे जलस्वरूप (नदीरूप) - को प्राप्त करनेपर भी अपने पूर्व स्वरूपको प्राप्त करेंगे और अपने- अपने अधिकारोंको प्राप्त करेंगे। मेरा कहा हुआ मिथ्या नहीं होगा। तुम सभी देवांगनाएं एवं देवगण यहाँपर शमीपत्रोंके द्वारा मेरा पूजन करो ॥ १०-१२ ॥ जिसने मुझे शमीपत्र अर्पित कर दिया, उसने मानो सम्पूर्ण भुवन ही मुझे प्रदान कर दिया, उसे सौ भार सुवर्ण२
[दायाँ स्तम्भ] दान करनेका फल प्राप्त होगा। इसमें कोई संशय नहीं ॥ १३ ॥ ब्रह्माजी बोले—विघ्नेश्वर गणेशजीके इस प्रकारसे कहनेपर सभी देवता अपने-अपने स्वरूपमें स्थित हो गये और अंशरूपसे वे नदीरूपमें भी स्थित रहे। तब उन्होंने विनायकका दर्शन किया ॥ १४ ॥ वे देवता भगवान् गजाननको प्रणाम करके तथा उनकी स्तुति करके प्रार्थना करने लगे कि हे देव ! आप हमारे अपराधको क्षमा करें। हमने बुद्धिमें मोह उत्पन्न हो जानेके कारण बिना आपका पूजन किये और पितामह ब्रह्माजीकी ज्येष्ठ पत्नी देवी सावित्रीकी उपेक्षाकर यज्ञ प्रारम्भ कर दिया था और उसका फल भी तत्काल हमने देख लिया, अब आपकी कृपासे हमने अपना पुनः नवीन रूप प्राप्त किया है। आपकी कृपासे हम परमानन्दको प्राप्त हुए हैं। ऐसा कहकर उन्होंने शमीपत्रोंके द्वारा विनायकका पूजन किया ॥ १५-१७ ॥ वे विघ्ननाशन विनायक भी उन देवताओंको आनन्दित करके अन्तर्धान हो गये। तब उन देवताओंने गणेशजीकी पत्थरकी एक शुभ मूर्ति बनायी, जो चार भुजाओंवाली थी और हाथीके सूँडयुक्त मुखवाली थी, उस मूर्तिको उन्होंने 'हेरम्ब' यह नाम रखा। साथ ही एक श्रेष्ठ मन्दिर बनवाकर उसमें उस मूर्तिको बड़े ही आदरपूर्वक स्थापित किया ॥ १८-१९ ॥ तदनन्तर सभी लोगोंपर उपकार करनेकी दृष्टिसे वे देवता बोले—जो व्यक्ति विद्याके अधीश्वर इन हेरम्ब गणपतिका इस उत्तम नगरमें भक्तिपूर्वक पूजन करेगा, उसके ऊपर प्रसन्न होकर भगवान् हेरम्ब उसकी समस्त कामनाओंको पूर्ण करेंगे। इन हेरम्बका वन्दन करनेसे, स्मरण करनेसे अथवा प्रणाम करनेसे गजानन पूर्वोक्त फल प्रदान करेंगे, इसमें कोई संशय नहीं ॥ २०-२१ ॥
[पाद-टिप्पणी / Footnotes] १-नमस्ते सर्वरूपाय सर्वान्तर्यामिणे नमः । नमः सर्वकृते तुभ्यं सर्वदात्रे कृपालवे ॥ नमः सर्वविनाशाय नमस्तेऽनन्तशक्तये । नमः सर्वप्रबोधाय सर्वपात्रेऽखिलादये ॥ परब्रह्मस्वरूपाय निर्गुणाय नमो नमः । चिदानन्दस्वरूपाय वेदानामप्यगोचर ॥ मायाश्रयायामेयाय गुणातीताय ते नमः । सत्यायानन्तरूपाय गुणविक्षोभकारिणे ॥ शरणागतपालाय दैत्यदानवभेदिने । नमो नानावताराय विश्वरक्षणतत्पर ॥ अनेकायुधहस्ताय सर्वशत्रुनिबर्हण । अनेकवरदात्रे ते भक्तानां हितकारक ॥ (श्रीगणेशपुराण, क्रीडाखण्ड ३७। २-७) २-दो हजार पल सुवर्णका मान एक भारके बराबर होता है।