श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 362, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें३६० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 वहाँपर पूर्वमें मन्दारवृक्षके काष्ठसे निर्मित जो | बतायी है। इस महिमाका श्रवण करनेसे सभी पाप विनायकजीकी विशाल मूर्ति थी, उसे ग्रहणकर इन्द्र परम | विनष्ट हो जाते हैं ॥ २८ ॥ ऋद्धिशाली अपनी पुरी अमरावतीमें ले गये ॥ २२ ॥ | तभीसे लेकर मंगलमयी शमी भगवान् गणेशको वे प्रभु इन्द्र आज भी सपत्नीक उस मूर्तिकी | अत्यन्त प्रिय हो गयी। तुम्हारे द्वारा अनजानमें भी भक्तिपूर्वक पूजा करते हैं। तदनन्तर उन सभी देवताओंने | [शमीदलोंके द्वारा] जो विनायककी पूजा हो गयी थी, भी अपने-अपने लोकमें मन्दारकाष्ठकी गणेशमूर्ति बनाकर | उसीके फलस्वरूप तुम्हारा पुत्र जीवित होकर उठ खड़ा शमीपत्रोंके द्वारा उनकी पूजा की। इसके फलस्वरूप वे | हुआ है। मन्दारकी भी महिमा मैंने भलीभाँति निरूपित सभी अपनी-अपनी स्त्रियोंके साथ परम आनन्दको प्राप्त | कर दी। [हे कीर्ते!] अब अनुमति दो, मैं अपने हुए और उन्होंने उत्तम भोगोंको प्राप्त किया ॥ २३-२४ ॥ | आश्रमको जाऊँगा ॥ २९-३० ॥ ब्रह्माजीने बारह वर्षोंतक परम तप करके भगवान् | ब्रह्माजी बोले-शमी तथा मन्दारकी महिमाको विघ्नेश्वरको प्रसन्न करनेके अनन्तर पुनः यज्ञ किया ॥ २५ ॥ | सुननेके अनन्तर रानी कीर्तिने अपने पुत्रके कल्याणके उन ब्रह्माजीने भी मन्दारकाष्ठसे विघ्नराज गणपतिकी | लिये गणपतिमन्त्रके विषयमें पूछा ॥ ३१ ॥ एक वरदायिनी मूर्ति बनवाकर अत्यन्त आदरके साथ | गणेशजीकी प्रीतिको बढ़ानेवाले इस श्रेष्ठ आख्यानका शमीपत्रोंके द्वारा अनेक बार उसका पूजन किया। उन्होंने | जो श्रवण करता है, वह व्यक्ति कभी भी संकटको प्राप्त स्वर्णपत्रों, दूर्वा, मन्दारपुष्पों, केतकीके पुष्पों तथा श्वेत | नहीं होता और अपनी समस्त कामनाओंको प्राप्त कर दूर्वांकुरोंके द्वारा सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाली उस | लेता है। जो व्यक्ति सर्वदा प्रातःकाल उठकर शमी, मूर्त्तिका पूजन किया ॥ २६-२७ ॥ | मन्दार तथा गणेशजीका श्रद्धाभक्तिपूर्वक स्मरण करता गृत्समद बोले-हे मातः ! हे शुभे ! इस प्रकार | है, वह सभी पापोंसे रहित हो जाता है और सुखी होता मैंने अत्यन्त संक्षेपमें मन्दार तथा शमीकी महिमा तुम्हें | है ॥ ३२-३३ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'शमी तथा मन्दारके माहात्म्यका वर्णन' नामक सैंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३७ ॥ अड़तीसवाँ अध्याय रानी कीर्तिके पुत्रको महर्षि गृत्समदद्वारा गणेशजीके 'ढुण्ढिराज' नामक चतुरक्षर मन्त्रका उपदेश, ढुण्ढिराज गणेशका माहात्म्य, काशीविश्वनाथ तथा गंगाजीकी महिमा, भस्मासुरपुत्र दुरासदद्वारा शंकरजीकी आराधना और वरप्राप्ति कीर्ति बोली-हे ब्रह्मन् ! आपने शमीकी महिमाका | कीजिये, जो सरलतासे उच्चारण किये जानेयोग्य हो, भलीभाँति बड़े आदरके साथ वर्णन किया और मन्दारके | गणेशजीको भलीभाँति प्रसन्न करनेवाला हो और अपने माहात्म्यको भी बतलाया, उससे मेरे मनमें बड़ी प्रसन्नता हो | राज्यको प्राप्त करानेवाला हो, साथ ही वह मन्त्र ऐसा रही है। हे मुनीश्वर ! आपने मेरे इस पुत्रको जीवन प्रदान | हो कि जिसका जप करनेमें बालक भी समर्थ हो ॥ ३ ॥ किया है और इसे गणेशजीके षडक्षरमन्त्रका उपदेश भी | गृत्समद बोले-[हे देवि!] भगवान् गजाननके दिया है, किंतु अभी छोटा बालक होनेके कारण यह उस | चरणकमलोंमें लगी हुई तुम्हारी बुद्धिको मैंने भलीभाँति मन्त्रका उच्चारण करनेमें समर्थ नहीं हो पायेगा ॥ १-२ ॥ | समझ लिया है, अतः मैं गणेशजीका सुख प्रदान अतः हे मुने ! आप इसे इस समय ऐसा मन्त्र प्रदान | करनेवाला स्वयं का मन्त्र इसे प्रदान करूँगा ॥ ४ ॥