श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
३६० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 वहाँपर पूर्वमें मन्दारवृक्षके काष्ठसे निर्मित जो | बतायी है। इस महिमाका श्रवण करनेसे सभी पाप विनायकजीकी विशाल मूर्ति थी, उसे ग्रहणकर इन्द्र परम | विनष्ट हो जाते हैं ॥ २८ ॥ ऋद्धिशाली अपनी पुरी अमरावतीमें ले गये ॥ २२ ॥ | तभीसे लेकर मंगलमयी शमी भगवान् गणेशको वे प्रभु इन्द्र आज भी सपत्नीक उस मूर्तिकी | अत्यन्त प्रिय हो गयी। तुम्हारे द्वारा अनजानमें भी भक्तिपूर्वक पूजा करते हैं। तदनन्तर उन सभी देवताओंने | [शमीदलोंके द्वारा] जो विनायककी पूजा हो गयी थी, भी अपने-अपने लोकमें मन्दारकाष्ठकी गणेशमूर्ति बनाकर | उसीके फलस्वरूप तुम्हारा पुत्र जीवित होकर उठ खड़ा शमीपत्रोंके द्वारा उनकी पूजा की। इसके फलस्वरूप वे | हुआ है। मन्दारकी भी महिमा मैंने भलीभाँति निरूपित सभी अपनी-अपनी स्त्रियोंके साथ परम आनन्दको प्राप्त | कर दी। [हे कीर्ते!] अब अनुमति दो, मैं अपने हुए और उन्होंने उत्तम भोगोंको प्राप्त किया ॥ २३-२४ ॥ | आश्रमको जाऊँगा ॥ २९-३० ॥ ब्रह्माजीने बारह वर्षोंतक परम तप करके भगवान् | ब्रह्माजी बोले-शमी तथा मन्दारकी महिमाको विघ्नेश्वरको प्रसन्न करनेके अनन्तर पुनः यज्ञ किया ॥ २५ ॥ | सुननेके अनन्तर रानी कीर्तिने अपने पुत्रके कल्याणके उन ब्रह्माजीने भी मन्दारकाष्ठसे विघ्नराज गणपतिकी | लिये गणपतिमन्त्रके विषयमें पूछा ॥ ३१ ॥ एक वरदायिनी मूर्ति बनवाकर अत्यन्त आदरके साथ | गणेशजीकी प्रीतिको बढ़ानेवाले इस श्रेष्ठ आख्यानका शमीपत्रोंके द्वारा अनेक बार उसका पूजन किया। उन्होंने | जो श्रवण करता है, वह व्यक्ति कभी भी संकटको प्राप्त स्वर्णपत्रों, दूर्वा, मन्दारपुष्पों, केतकीके पुष्पों तथा श्वेत | नहीं होता और अपनी समस्त कामनाओंको प्राप्त कर दूर्वांकुरोंके द्वारा सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाली उस | लेता है। जो व्यक्ति सर्वदा प्रातःकाल उठकर शमी, मूर्त्तिका पूजन किया ॥ २६-२७ ॥ | मन्दार तथा गणेशजीका श्रद्धाभक्तिपूर्वक स्मरण करता गृत्समद बोले-हे मातः ! हे शुभे ! इस प्रकार | है, वह सभी पापोंसे रहित हो जाता है और सुखी होता मैंने अत्यन्त संक्षेपमें मन्दार तथा शमीकी महिमा तुम्हें | है ॥ ३२-३३ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'शमी तथा मन्दारके माहात्म्यका वर्णन' नामक सैंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३७ ॥ अड़तीसवाँ अध्याय रानी कीर्तिके पुत्रको महर्षि गृत्समदद्वारा गणेशजीके 'ढुण्ढिराज' नामक चतुरक्षर मन्त्रका उपदेश, ढुण्ढिराज गणेशका माहात्म्य, काशीविश्वनाथ तथा गंगाजीकी महिमा, भस्मासुरपुत्र दुरासदद्वारा शंकरजीकी आराधना और वरप्राप्ति कीर्ति बोली-हे ब्रह्मन् ! आपने शमीकी महिमाका | कीजिये, जो सरलतासे उच्चारण किये जानेयोग्य हो, भलीभाँति बड़े आदरके साथ वर्णन किया और मन्दारके | गणेशजीको भलीभाँति प्रसन्न करनेवाला हो और अपने माहात्म्यको भी बतलाया, उससे मेरे मनमें बड़ी प्रसन्नता हो | राज्यको प्राप्त करानेवाला हो, साथ ही वह मन्त्र ऐसा रही है। हे मुनीश्वर ! आपने मेरे इस पुत्रको जीवन प्रदान | हो कि जिसका जप करनेमें बालक भी समर्थ हो ॥ ३ ॥ किया है और इसे गणेशजीके षडक्षरमन्त्रका उपदेश भी | गृत्समद बोले-[हे देवि!] भगवान् गजाननके दिया है, किंतु अभी छोटा बालक होनेके कारण यह उस | चरणकमलोंमें लगी हुई तुम्हारी बुद्धिको मैंने भलीभाँति मन्त्रका उच्चारण करनेमें समर्थ नहीं हो पायेगा ॥ १-२ ॥ | समझ लिया है, अतः मैं गणेशजीका सुख प्रदान अतः हे मुने ! आप इसे इस समय ऐसा मन्त्र प्रदान | करनेवाला स्वयं का मन्त्र इसे प्रदान करूँगा ॥ ४ ॥
क्री०ख०-अ०३८ ] * रानी कीर्तिके पुत्रको महर्षि गृत्समदद्वारा चतुरक्षर मन्त्रका उपदेश * ३६१ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ] जिन भगवान् विनायकका चार अक्षरोंवाला [ढुण्ढिराज] नाम सम्पूर्ण जगत्का कारणभूत है, जो [ढुण्ढिराज] शुभ तथा अशुभ कर्मोंके साक्षी हैं, दुष्ट दैत्योंका विनाश करनेवाले हैं, सभी धर्मोंकी रक्षा करनेवाले हैं, काशीके राजा दिवोदासका उपकार करनेवाले हैं, जो वाराणसीमें द्विजका रूप धारण करके विराजमान हैं, जिन्होंने भगवान् विश्वनाथके लिये अविमुक्तक्षेत्रमें निवास करनेके लिये प्रयत्न किया था, जो सर्वान्तर्यामी हैं, विश्वेश्वरद्वारा जिनकी स्तुति की गयी हैं, संसारका पालन करनेके लिये जो जनार्दन भगवान् विष्णुद्वारा स्तुत हैं, सृष्टि करनेके लिये पितामह ब्रह्माजीद्वारा जिनकी पूजा की जाती है और जिनका ध्यान किया जाता है, सम्पूर्ण जगत्के विनाशके लिये जो भगवान् शिवद्वारा पूजित होते हैं, पुलोमाकी पुत्री शचीके स्वामी देवराज इन्द्रके द्वारा दैत्योंका संहार करनेके लिये तथा देवताओंके राज्यसुखकी प्राप्तिके लिये अत्यन्त भक्तिपूर्वक जिनका पूजन किया गया है; सूर्य, वरुण, चन्द्रमा, यम, अग्नि तथा वायुदेवने भी अपने-अपने अभ्युदयकी प्राप्तिके लिये जिनका पूजन किया है, साथ ही देवगुरु बृहस्पति तथा दैत्यगुरु शुक्राचार्यने भी अपने उत्कर्षके लिये जिनकी पूजा की है, जिन ढुण्ढिराज गणेशकी आराधना शेषनागने पृथ्वीको धारण करनेकी शक्ति प्राप्त करनेके लिये की है। साथ ही गन्धर्व, किन्नर, यक्ष, सिद्ध, चारण, राक्षस, ऋषिगण, पशु तथा सभी शुभ स्थावर तथा जंगम प्राणी अपने-अपने कार्योंकी सिद्धिके लिये जिन विश्वके स्वामी भगवान् गणेशजीकी आराधना करते हैं, वे अखिल जगत्के स्वामी ही ढुण्ढिराज कहलाते हैं, वे अपार गुणोंसे भी परे हैं। ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव आदि देवोंने जिनके गुणोंका पार नहीं पाया है। उन भगवान् ढुण्ढिराजका तुम्हारे द्वारा भक्तिभावपूर्वक शमीपत्रोंसे पूजन होनेपर निश्चित ही तुम्हारा पुत्र शत्रुओंका नाश करनेवाला और राज्यका अधिकारी बनेगा ॥ ५-१५॥ कीर्ति बोली—हे ब्रह्मन्! मैंने ढुण्ढिराजसम्बन्धी सम्पूर्ण महिमाका श्रवण किया। वे ढुण्ढिराज कौन-सा कर्म करनेवाले हैं, किस प्रकार उनका प्रादुर्भाव हुआ, वे
[दायाँ स्तम्भ] किसके अंश हैं, उनका पराक्रम कैसा है? किसने उनका 'ढुण्ढिराज' यह नाम रखा, पूर्वकालमें वे किसके द्वारा पूजित हुए? हे ब्रह्मन्! मेरे इस संशयका आप पूर्णतः निराकरण करनेकी कृपा करें ॥ १६-१७॥ मुनि बोले—हे भद्रे! हे शुभे! तुमने और भी अधिक जाननेकी इच्छासे बहुत अच्छी बात पूछी है। तुमने भक्तिभावसे इस विषयमें पूछा है, अतः मैं तुम्हारे संशयको दूर करता हूँ ॥ १८॥ जिस प्रकारसे उन ढुण्ढिराजने दुरासद नामक दैत्य तथा अनेक राक्षसोंका वध किया, जिस प्रकारसे वे मायासे रूप धारणकर श्रेष्ठ राजा दिवोदासको मोहित करने गये थे, जिस उपायसे वे विश्वेश्वर भगवान् शिवको अविमुक्तक्षेत्र काशीमें लाये थे और हे नृपांगना ! जैसे उनका 'ढुण्ढिराज' यह नाम पड़ा था, वह सब मैं उसी प्रकार बताता हूँ, जिस प्रकारसे कि मैंने स्कन्दजीके द्वारा महर्षि अगस्त्यजीके प्रति कहते हुए सुना था। हे शुभे! उसीको तुम एकाग्रमन होकर सुनो ॥ १९-२१॥ स्कन्द बोले—हे ब्रह्मन् अगस्त्यजी! आप अविमुक्त- क्षेत्रसम्बन्धी उस कथाको ध्यानपूर्वक सुनिये, जिसके सुननेमात्रसे व्यक्ति सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ २२ ॥ एक बारकी बात है, भगवान् श्रीहरिने महर्षि कश्यपजीसे कहा था कि आप विविध प्रकारकी प्रजाओंकी सृष्टि कीजिये। तब उन्होंने तपस्या करके उसके प्रभावसे प्राणियोंकी मैथुनी सृष्टि की। उन्होंने इक्कीस हजार योनियोंवाले अण्डज, उतने ही स्वेदज तथा उतने ही उद्भिज्ज प्राणियोंकी सृष्टि की। इन चार प्रकारकी योनियोंमें मनुष्ययोनि अत्यन्त दुर्लभ है ॥ २३-२४॥ वह मनुष्यजन्म बड़े ही पुण्यसे प्राप्त होता है, उसमें भी ब्राह्मणकुलमें जन्म और भी विशेष पुण्यसे प्राप्त होता है। सम्यक् रूपसे धर्मका पालन और अधर्मका परित्याग करते हुए यदि उस ब्राह्मणत्वकी रक्षा की जाय तो वह उस परम धामको प्राप्त कराता है, जहाँसे फिर यहाँ पुनरागमन नहीं होता। यदि ऐसा नहीं हुआ तो प्राणी चौरासी लाख योनियोंमें भटकता ही रहता है ॥ २५-२६॥ दुराचरण करनेवाले प्राणी नारकीय यातनाओंका
३६२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ] भोग करते हैं। बहुत समयतक इसी प्रकार यातनाओंको भोगते हुए पापकर्मोंके क्षीण हो जानेपर वे पुनः मृत्युलोकमें आते हैं और काने, बौने तथा दरिद्री होते हैं। उन प्राणियोंपर दया करनेके लिये ब्रह्मा, शिव आदि देवोंने तथा महाभाग ऋषियोंने विविध प्रकारके तीर्थों तथा अत्यन्त पवित्र क्षेत्रोंको बनाया है, जो प्राणियोंके पापोंका हरण कर लेनेवाले हैं॥ २७-२८॥ उन तीर्थस्थलों तथा पुण्यक्षेत्रोंमें देवता तथा ऋषिगण जीवोंके पापोंको विनष्ट करते हुए विराजमान रहते हैं, उन तीर्थोंमें निवास करनेवाले प्राणियोंके पाप नष्ट हो जाते हैं। पापोंसे प्राणियोंकी रक्षा करनेके लिये देवता तथा ऋषि सदा ही उन तीर्थोंमें निवास करते हैं॥ २९-३०१/२॥ भगवान् विश्वनाथने सर्वगुणसम्पन्न, सबसे श्रेष्ठ, भुक्ति तथा मुक्ति प्रदान करनेवाली, मंगलमयी वाराणसी नामकी पुरीका निर्माण किया था, वह पुरी ध्यान करनेवाले तथा ज्ञानी जनोंको मोक्ष प्रदान करनेवाली है तथा सर्वतीर्थमयी और अत्यन्त रमणीय है॥ ३१-३२॥ जहाँपर तपस्या करते समय सर्वसामर्थ्यसम्पन्न भगवान् विष्णुने [अपने चक्रसे] प्रसिद्ध चक्र-सरोवरका निर्माण किया था, जो अत्यन्त सुन्दर है और स्नानमात्र कर लेनेसे मुक्ति प्रदान करनेवाला है। जिसका दर्शनकर
[दायाँ स्तम्भ] भगवान् शिवजीके कन्धोंमें कम्पन होनेसे उनके कानोंमें पहने हुए कुण्डलोंसे [निकलकर] मणि उस चक्रसरोवरमें गिर पड़ी थी, तभीसे वह चक्रसरोवर तीर्थ 'मणिकर्णिका' नामसे प्रख्यात हो गया॥ ३३-३४॥ तदनन्तर राजर्षि भगीरथद्वारा आहूत की गयी भागीरथी गंगा नदी वहाँ आयीं। यहाँ मृत्युके प्राप्त होनेपर कीट-पतंगोंतककी मुक्ति होती है॥ ३५॥ गंगाजीका तीन बार मात्र नाम ले लेनेसे वे काशीवासका फल प्रदान करनेवाली हो जाती हैं। [वास्तवमें] वहाँकी लताएँ, झाड़ियाँ, तृण तथा वृक्ष भी धन्य ही हैं, अन्य स्थानोंके नहीं। गंगामें रहनेवाले कछुए तथा मत्स्य भी मृत्युके पश्चात् [रूपवान्] पृथ्वीके कैलास (काशी)- को छोड़कर उस धाममें जाते हैं, जहाँ रूपातीत भगवान् शिव नाना रूप धारणकर स्थित रहते हैं॥ ३६-३७॥ वे गिरिजापति भगवान् शंकर ही सूर्य, चन्द्रमा, विष्णु, ब्रह्मा, विनायक तथा शक्तिस्वरूपा दुर्गा हैं और वे ही इस जगत्के कारणस्वरूप हैं॥ ३८॥ प्रलयकालमें वे काशीपुरीको अपने त्रिशूलके अग्रभागमें धारण किये रहते हैं। वे एक ही परमेश्वर शिव लोगोंपर अनुग्रह करनेके लिये पाँच स्वरूपों (शिव, विष्णु, दुर्गा, गणेश तथा सूर्य)-में हो जाते हैं॥ ३९॥ भक्तगण जिस-जिस स्वरूपका ध्यान करते हैं, भगवान् शंकर तत्क्षण ही वैसा स्वरूप धारण कर लेते हैं। इन पाँचों देवोंमें जो भेद मानता है, वह मनुष्य अवीची नामवाले नरकोंको प्राप्त होता है॥ ४०॥ जो व्यक्ति एक ओर तो इन पंचदेवोंमेंसे किसी एककी स्तुति करता है और दूसरी ओर किसी देवकी निन्दा करता है, वह बहुत वर्षोंतक इक्कीस नरकोंमें पड़ा रहता है। भस्मासुर नामक राक्षसका दुरासद नामका एक प्रसिद्ध पुत्र था। उसने शुक्राचार्यजीके पास जाकर भगवान् शंकरकी पंचाक्षरी विद्या ('नमः शिवाय' मन्त्र) प्राप्त किया॥ ४१-४२॥ एक हजार दिव्य वर्षोंतक वह एक पैरके अँगूठेपर निराहार रहकर खड़ा रहा। वह सूखे काष्ठके समान हो गया था। उसके सारे शरीरमें दीमकोंने बाँबी बना ली थी,
क्री०ख०-अ०३८ ] * रानी कीर्तिके पुत्रको महर्षि गृत्समदद्वारा चतुरक्षर मन्त्रका उपदेश * ३६३ उसका शरीर अस्थिमात्र ही शेष रह गया था। उसके केवल नेत्रमात्र ही दीखते थे। इसी अवस्थामें वह मन्त्रजप किया करता था। उसकी कठिन साधनासे प्रसन्न होकर भगवान् शंकर उसे दर्शन देनेके लिये वहाँ आये ॥ ४३-४४॥ उनकी दस भुजाएँ थीं। पाँच मुख थे। वे रुण्डोंकी मालासे सुशोभित थे। हाथमें डमरू तथा त्रिशूल धारण किये हुए थे। जटाजूटसे विभूषित थे। उन्होंने सिरपर गंगाको धारण कर रखा था। उनके तीन नेत्र थे। सम्पूर्ण शरीरमें चिताभस्मका लेपन किया हुआ था, वे नन्दी वृषभपर आरूढ़ थे, उनकी ध्वजामें वृषका चिह्न अंकित था। माथेपर विराजमान चन्द्ररेखासे वे सुशोभित थे। उन्होंने अपर्णा पार्वतीजीको अपनी गोदमें बिठा रखा था। इस प्रकारके स्वरूपवाले वे भगवान् शंकर कृपा करते हुए उस दैत्यश्रेष्ठ दुरासदसे बोले ॥ ४५-४६ १/२ ॥ शिवजी बोले- उठो, उठो, तुम्हारा कल्याण हो। तपस्याके द्वारा तुमने महान् कष्ट सहन किया है। मैं तुम्हें तुम्हारा अभीष्ट मनोरथ प्रदान करूँगा। जो भी बात तुम्हारे मनमें स्थित हो, उसे माँग लो ॥ ४७ १/२ ॥ ब्रह्माजी बोले- तब अपनी आँखोंको खोलकर उस दैत्य दुरासदने हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम किया और वह उन वरदायी भगवान् महेश्वरकी स्तुति करने लगा। हे देव! आप सम्पूर्ण जगत्के कारणस्वरूप हैं, आप परम आनन्दस्वरूप हैं। आप क्षर तथा अक्षरसे अतीत शरीरवाले, सत्त्वादि तीनों गुणोंमें विकार उत्पन्न करनेवाले, गुणातीत, ज्ञानमय और व्यक्त तथा अव्यक्तके विधानके ज्ञाता हैं ॥ ४८-५० ॥ आपका विग्रह मुनियोंके द्वारा ध्यान किये जाने योग्य है, आप सभी भक्तोंपर अनुग्रह करनेवाले हैं। आप अनन्त ब्रह्माण्डोंके कारणभूत हैं, सत्पुरुषोंको श्रेय प्रदान करनेवाले हैं। आप अखण्ड आनन्दसे परिपूर्ण, अमोघ फल प्रदान करनेवाले, सर्वाधार, सब कुछ सहन करनेवाले और सभी शक्तियोंसे सम्पन्न हैं ॥ ५१-५२ ॥ आप पृथिवी, वायु, जल, अग्नि तथा आकाश- स्वरूप हैं। आज मेरी तपस्या धन्य हो गयी, मेरे नेत्र धन्य हो गये, मेरे माता-पिता धन्य हो गये, मेरा जन्म लेना सफल हो गया, जो कि मुझे आपका साक्षात् दर्शन प्राप्त हुआ है। आज मेरे सम्पूर्ण पाप नितान्त रूपसे लयको प्राप्त हो गये हैं। योगियोंके हृदयके लिये भी अगम्य और वेद- वाणीके लिये भी सर्वथा अगोचर आपके स्वरूपका आज मुझे दर्शन प्राप्त हुआ है। हे भगवन्! इस समय मैं आपसे वर माँगता हूँ, उसे आप देनेकी कृपा करें ॥ ५३-५४ ॥ शिवजी बोले- मैं तुम्हारे द्वारा की गयी स्तुति, तपस्या और प्रेमसे अत्यन्त प्रसन्न हूँ। तुम निःसंकोच होकर वर माँगो, मैं तुम्हें वह सब अत्यन्त दुर्लभ वर शीघ्र ही प्रदान करूँगा ॥ ५५ ॥ मुनि बोले- तब उस दुरासद दैत्यने प्रसन्न हुए भगवान् सदाशिवसे निर्भय होनेका वरदान माँगा और उसने कहा- जरायुज, अण्डज, स्वेदज तथा उद्भिज्ज- इन चारों प्रकारकी योनियोंवाले प्राणियोंके द्वारा मेरी मृत्यु न हो। इसीके साथ ही यक्ष, राक्षस, पिशाच, देव, दानव, किन्नर, मुनि, मानव, गन्धर्व, सर्प, वनेचर प्राणियोंसे भी मेरी मृत्यु न हो। हे महाभाग! युद्धस्थलमें मेरे स्वरूपको देखकर सभी देवता भयभीत हो जायँ और मुझे देवलोकका राज्य प्राप्त हो। मुझे आपके चरणोंका नित्य स्मरण रहे और आपमें मेरी अखण्ड भक्ति बनी रहे ॥ ५६-५९ ॥ शिवजी बोले- एकमात्र शक्तिको छोड़कर मैं तुम्हें सभी देवताओंसे अभय प्रदान करता हूँ। शक्तिके तेजसे उत्पन्न कोई वीर तुम्हें जीतकर पुनः जीवित कर देगा ॥ ६० ॥ वह तुम्हारे सिरपर अपना चरण नित्य रखा रहेगा। जब वह तुम्हारे सिरपर रखा हुआ अपना पैर हटा लेगा, तब तुम अपने पराक्रमसे तथा अपने तेजसे पुनः त्रिलोकीको जीत लोगे। तुम्हें मेरी दृढ़ भक्ति प्राप्त होगी और तुम्हें निरन्तर मेरा स्मरण बना रहेगा ॥ ६१-६२ ॥ गृत्समद बोले- दुरासदको इस प्रकारके वर्रोंको प्रदानकर भगवान् शिव अन्तर्धान हो गये। प्रसन्नतासे भरा हुआ वह दुरासद भी अपने घर चला आया। जो इस स्तोत्रका पाठ करता है, वह अपनी समस्त कामनाओंको प्राप्त कर लेता है ॥ ६३ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें '[दुरासदकी] शिवाराधनाका वर्णन' नामक अड़तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३८ ॥ Kalyana Visheshank 2021_Section_13_1_Front
उनतालीसवाँ अध्याय
३६४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 उनतालीसवाँ अध्याय भस्मासुरपुत्र दुरासदद्वारा भूमण्डल तथा देवलोकमें विजय प्राप्त करना, भस्मासुरका शिवसे वरदान प्राप्त करना, मोहिनीरूप भगवान् विष्णुकी युक्तिसे उसका भस्म होना, दुरासदका अविमुक्तक्षेत्र काशीपुरीमें आना, दुरासदके अत्याचारोंका वर्णन
मुनि गृत्समद बोले—तदनन्तर भगवान् शिवके | दिया था। जो अत्यन्त डरपोक थे और अपना राज्य छोड़कर द्वारा प्राप्त वरदानसे अभिमानको प्राप्त वह दैत्यराज | भाग चले थे, उन्हें उस दुरासदने दूतोंद्वारा अपने अधीन कर दुरासद अपनी महिमाको सहन नहीं कर पाया और | लिया था। इस प्रकार सम्पूर्ण भूमण्डलको जीतकर उस मोहित-सा हो गया। वह सम्पूर्ण पृथ्वीको जीतनेकी इच्छा | दैत्य दुरासदने इन्द्रको भी जीतनेकी इच्छा की॥ ९-१०॥ रखता था। [इसके निमित्त] वह अश्वपर आरूढ़ हुआ। | तदनन्तर अपनी सेनाके साथ वह दैत्य इन्द्रद्वारा उसने अपने केशोंको बाँध रखा था। कानोंमें कुण्डल | परिपालित नगरी अमरावतीपर जा पहुँचा। उस दैत्यराज धारण करनेसे वह सुशोभित हो रहा था॥ १-२॥ | दुरासदके वरदानके सामर्थ्यको जानकर देवराज इन्द्र उसने एक हाथमें तलवार तथा दूसरे हाथमें धनुष | सभी देवताओं तथा अपने कुटुम्बसहित वहाँसे पलायनकर ले रखा था और कन्धेपर दो तूणीर धारण किये थे। | हिमालयकी गुफामें छिप गये। उसी समय भगवान् अत्यन्त मूल्यवान् रत्नों तथा मुक्तामणियोंकी माला वह | विष्णु भी अपने लोकको छोड़कर क्षीरसागरमें चले धारण किये हुए था। उसके माथेपर कस्तूरीका तिलक | गये॥ ११-१२॥ था। वह दिव्य वस्त्रोंको पहने हुए था, मनोहर कंचुक | वे भगवान् मधुसूदन देवी महालक्ष्मीकी गोदमें सिर ओढ़ रखा था। उसका मुख ताम्बूलसे सुशोभित हो रहा | रखकर शयन करने लगे। त्रिशूलधारी भगवान् शिव था, उसके साथ उसके दो अमात्य भी थे, जिन्होंने अपनी | कैलासशिखरका परित्यागकर काशीमें चले गये॥ १३॥ भुजाओंकी शक्तिके बलपर अनेक वीरोंपर विजय पायी | उन्हीं भगवान् शिवके साथ बुद्धिमान् चतुर्मुख ब्रह्मा थी। दैत्य दुरासदके दोनों पार्श्वोंमें सेनासहित वे दोनों | भी चले गये। जो-जो देवता अपना पद छोड़कर जाते चल रहे थे॥ ३-५॥ | थे, वहाँ-वहाँपर वह दैत्यराज दुरासद अपने बलशाली उसकी चतुरंगिणी सेना थी, जो सम्पूर्ण पृथ्वीपर | परममित्र दूतको नियुक्त कर देता था। इस प्रकार वह विजय प्राप्त करनेके लिये उद्यत थी। उस सेनाके | महाबली दुरासद अपने बलपर समस्त देवताओंको चलनेसे उड़ी हुई धूलिसे आकाश आच्छादित हो गया | जीतकर कैवर्तकोंके देश अश्मकपुरमें निवास करने लगा, था। वह सेना समुद्रके समान विस्तारवाली थी॥ ६॥ | वह अश्मकपुर लोकमें सर्वत्र 'मुकुन्दपुर' इस नामसे जो-जो भी वीर धन आदिमें अपनेको बढ़ा-चढ़ा | विख्यात था॥ १४-१६॥ समझता था, उसपर वह विजय प्राप्त कर लेता था और | उसी मुकुन्दपुरमें प्राचीन कालमें महान् बलशाली उससे हजारोंकी मात्रामें रत्न तथा द्रव्य ग्रहण कर लेता था। | भस्मासुर नामक दैत्य निवास करता था। भगवान् शंकरने दैत्य उसे राज्यच्युत करके उसके स्थानपर अपने विश्वासपात्र | उसे महान् आश्चर्यजनक यह वर दे रखा था कि तुम महाबली लोगोंको स्थापित कर देता था। उस बलवान् | जिसके सिरपर हाथ रखोगे, वह उसी क्षण मृत्युको प्राप्त राजा दुरासदने सभी राजाओंको वशमें करके उनके पदोंपर | हो जायगा॥ १७॥ अपने लोगोंको स्थापित कर दिया था॥ ७-८॥ | इस प्रकारके वरदानको प्राप्त किया वह दुष्ट दैत्य जो राजा हथियार डालकर और कर प्रदानकर उसकी | भस्मासुर दुर्भावनासे प्रेरित होकर उस वरदानकी परीक्षा शरणमें आ गये थे, उन्हें उसने किसी पदपर स्थापित कर | करनेके लिये वरदान देनेवाले भगवान् शिवके ही सिरपर
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क्री०ख०-अ० ३९] * भस्मासुरपुत्र दुरासदद्वारा भूमण्डल तथा देवलोकमें विजय प्राप्त करना * ३६५ हाथ रखनेके लिये गया। तब पार्वतीपति भगवान् शिव वहाँसे पलायित हो गये। उस समय सर्वसामर्थ्यशाली चक्रपाणि भगवान् विष्णुने दैत्य भस्मासुरको देख लिया, तब वे सुन्दर मोहिनी (स्त्री)-का रूप धारणकर उसके पास गये ॥ १८-२०॥ वे बोले- हे नरोत्तम ! यदि तुम मेरी बातपर विश्वास करोगे तो मैं तुम्हारी अर्धांगिनी बन जाऊँगी। तब अत्यन्त हर्षित हो भस्मासुरने अपनी स्वीकृति दे दी। तदनन्तर मोहिनीरूपधारी वे भगवान् विष्णु नृत्य करने लगे और उस मोहिनीके कहनेपर वह दैत्य भस्मासुर भी नाचने लगा। मोहिनी जिस-जिस प्रकारके हाव-भावको दिखाने लगी, वह भी वैसा ही करने लगा ॥ २१-२२॥ तदनन्तर मोहिनीने अपने सिरपर हाथ रखा, तो उस भस्मासुरने भी अपने सिरपर हाथ रखा, उसी क्षण वह दैत्य भस्मासुर भस्म हो गया। उस दुष्ट चेष्टावाले भस्मासुरका अन्त करनेवाले भगवान् विष्णु उस नगरमें मुकुन्द नामसे स्थित हो गये। उन्हीं मुकुन्दके नामसे वह नगर 'मुकुन्दपुर' नामसे विख्यात हो गया। वह नगर वहाँ अनुष्ठान करनेवाले मनुष्योंके लिये शीघ्र ही परमसिद्धि प्रदान करनेवाला हो गया ॥ २३-२४॥ वे मोहिनी भक्तिपूर्वक की गयी उपासनासे मनुष्योंकी सभी अभिलाषाएँ पूर्ण करती हैं। वहींपर स्थित होकर भस्मासुरका पुत्र वह दुरासद गर्वपूर्वक तीनों लोकोंपर शासन करता था ॥ २५ ॥ वह दुरासद अपने मन्त्रियोंसे बड़े ही गर्वपूर्वक बोला-देखो, कैसे मैंने अपने पराक्रमके बलपर असुरोंके शत्रु देवताओंपर विजय प्राप्त की ! ॥ २६ ॥ इसपर वे मन्त्री बोले-आपने अविमुक्तक्षेत्रपर तो विजय प्राप्त नहीं की, वह भारतवर्षका दसवाँ खण्ड है। उसके समान कहीं कोई क्षेत्र नहीं है। जहाँ भगवान् शंकर विराजमान रहते हैं और सभी देवोंद्वारा वहाँ उनकी सेवा की जाती है। जबतक आप उस काशीपुरीको नहीं जीत लेते, तबतक आपका पौरुष व्यर्थ ही है ॥ २७-२८ ॥ मन्त्रियोंका ऐसा वचन सुनकर युद्धप्रिय वह दुरासद बड़ा ही प्रसन्न हुआ और बोला, 'मैं शीघ्र ही सैनिकोंको लेकर उस काशीपुरीमें जाता हूँ' ॥ २९ ॥ तदनन्तर वह श्रेष्ठ विमानपर आरूढ़ होकर क्षणभरमें ही काशीपुरीकी ओर चल पड़ा। उस दैत्यके काशीपुरीमें प्रवेश करते ही उस पुरीमें सर्वत्र हाहाकार होने लगा ॥ ३० ॥ उस नगरीमें जो देवता थे, वे सभी अन्तर्धान हो गये। भगवान् शिवने अपना भक्त होनेके कारण उसपर कोई कोप नहीं किया ॥ ३१ ॥ 'कुछ समयतकके लिये मैंने तुम्हें अपना राज्य दे दिया'-ऐसा कहकर भगवान् शिव सपरिवार केदारक्षेत्रमें चले गये और तब हे शुभे ! क्षेत्रसंन्यासका नियम लिये हुए महर्षि जैगीषव्यको छोड़कर सभी मुनि भी काशीसे पलायित हो गये ॥ ३२¹/२ ॥ तदनन्तर उस मोहग्रस्त दुरासदने वहाँकी मूर्तियोंको तोड़ डाला। वह मन्दबुद्धि वहाँके मन्दिरोंको तोड़कर प्रसन्न होता था। यदि कोई किसी देवताका स्मरण-ध्यान करता था, तो वह उसे प्रताड़ितकर नगरसे बाहर कर देता था। न कहीं स्वाहाकार होता था, न वषट्कार अर्थात् ऋषियोंका पूजन, न कहीं पितरोंका तर्पण-पूजन होता था, न कहीं वेदका अध्ययन होता था और न कहीं भी Kalyana Visheshank 2021_Section_13_2_Front
न तो कहीं पुराण आदिकी कथा होती थी, न
३६६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- शास्त्राध्ययन ही हो पाता था ॥ ३३-३४ ॥ न तो कहीं पुराण आदिकी कथा होती थी, न देवताओंका पूजन होता था, न कोई व्रत-नियम हो पाता था और न तीर्थ आदिकी परिक्रमा ही हो पाती थी। उस काशीमें दुष्टबुद्धि दुरासदके राज्य करते समय कर्मकाण्डके विधि-विधानोंका लोप हो जानेपर धर्ममार्ग भी विलुप्त हो गया। हे कीर्ते ! धर्माचरणके विनष्ट हो जानेपर सभी देवता क्षुधासे पीड़ित हो गये ॥ ३६-३७ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'दुरासदके उपाख्यानमें' उनतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३९ ॥
चालीसवाँ अध्याय दुरासददैत्यके वधका निवेदन करनेके लिये देवताओं तथा ऋषियोंका केदारक्षेत्रमें भगवान् शिव एवं पार्वतीके पास जाना, देवोंद्वारा भगवतीकी स्तुति, भगवतीके मुखमण्डलसे गजाननका प्राकट्य, देवीका उनका 'वक्रतुण्ड' नाम रखना
गृत्समद बोले—तदनन्तर देवगुरु बृहस्पति, इन्द्र तथा अग्नि आदि सभी देवता एवं ऋषिगण केदारक्षेत्रमें गये और उन्होंने भगवान् शिवसहित सर्वज्ञ पद्मयोनि ब्रह्माजीको सम्पूर्ण वृत्तान्त बताया ॥ १ १/२ ॥ देवता तथा ऋषि बोले—हम सभी देवता अपने- अपने पदोंसे च्युत हो गये हैं तथा समस्त मुनिगण भी अपने आचारसे वंचित हो गये हैं। दैत्य दुरासदके भयसे हम सभी स्नानादि नित्य क्रियाओंको करनेमें भी असमर्थ हो गये हैं। उस दुरासदको किसने ऐसा वर दे दिया है, जिससे कि वह दुष्ट समस्त भुवनोंका स्वामी बन गया है, इसका वध किस प्रकारसे हो, इसपर आप विचार करें। आप दयालुओंद्वारा ऐसा उपाय किया जाना चाहिये, जिससे कि सम्पूर्ण लोगोंको सुख प्राप्त हो सके ॥ २-४ ॥ गृत्समद बोले—उनका ऐसा वचन सुनकर चतुर्मुख ब्रह्माजी बोले ॥ ४ १/२ ॥ ब्रह्माजी बोले—हे देवताओ और ऋषियो ! उसके वधका उपाय मैं बतलाऊँगा। जब उस दैत्य दुरासदने बहुत दिनोंतक दारुण तप किया, तब पार्वतीपति भगवान् शंकरने इसे बहुतसे वरोंको दिया ॥ ५-६ ॥ हे श्रेष्ठ देवो ! तीनों लोकोंमें ऐसा कोई देवता नहीं है, जो इसका वध कर सके। कदाचित् वे देवाधिदेव, जो सत्त्वादि तीनों गुणोंमें क्षोभ उत्पन्न करनेवाले हैं, मैं (ब्रह्मा), शिव और विष्णु—ये त्रिदेव जिनकी आज्ञासे उत्पन्न हुए हैं, समस्त विश्वमें व्याप्त हैं, मायावी हैं, जगत्की रचना करनेवाले तथा उसका संहार करनेवाले हैं, गुणातीत हैं, तीनों गुणोंके स्वामी हैं, परसे भी परतर हैं, और कल्याण करनेवाले हैं, वे प्रभु यदि भगवती पार्वतीके उदरसे अवतार ग्रहण करें, तभी इस दुरासदका वध हो सकता है, अन्य किसी भी उपायसे नहीं ॥ ७-१० ॥ अतः आप सभी जगत्की चिन्ता करनेवाले उन प्रभुकी स्तुति करें। उससे पहले आप सभी शंकरप्रिया उन भगवती पार्वतीको प्रसन्न करें ॥ ११ ॥ उनके तेजसे उत्पन्न बालक दैत्य दुरासदका वध करनेमें समर्थ हो सकेगा। इस प्रकारका वरदान ही उन भगवान् शंकरने दुरासदको दिया है ॥ १२ ॥ गृत्समद बोले—ब्रह्माजीके मुखसे इस प्रकारकी बात सुनकर वे देवता अत्यन्त हर्षित हो गये। तदनन्तर वे भक्तवत्सल शिवप्रिया उन भवानी देवी पार्वतीकी इस प्रकार स्तुति करने लगे ॥ १३ ॥ देवता तथा ऋषिगण बोले—हे देवी ! आप जगत्की एकमात्र कारणरूपा हैं, परसे भी पर हैं, विश्वकी विचित्र शक्ति हैं, अचिन्त्य स्वरूपवाली हैं, सम्पूर्ण देवताओंके द्वारा सब प्रकारसे वन्दनीय हैं, त्रिगुणमयी और तीनों गुणोंकी स्वामिनी हैं। आपको हम नमस्कार करते हैं ॥ १४ ॥ आप सम्पूर्ण पृथ्वीको धारण करनेवाली हैं, पृथ्वीरूपा हैं, सम्पूर्ण चराचर जगत्की आधाररूपा हैं, तीनों लोकोंकी साररूपा हैं, सत्त्वादि तीनों गुणोंकी आदि कारणरूपा हैं, वेदत्रयीरूपी विग्रहवाली हैं तथा देवरूपा हैं, आपको हम नमस्कार करते हैं ॥ १५ ॥
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क्री०ख०-अ०४० ] * दुरासददैत्यके वधके लिये ऋषियों और देवताओंका केदारक्षेत्रमें जाना * ३६७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
३६८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 पार्वती, जो बार-बार निःश्वास ले रही थीं, उनके मुख, | स्वयंप्रकाश, जगन्मय, अव्यक्त, जगत्के आधार, नासापुटों तथा नेत्रोंसे एक उत्तम तेज प्रकट हुआ ॥ ३१ ॥ | परब्रह्मस्वरूप और समस्त पदार्थोंके द्रष्टा हैं ॥ ३७-३८ ॥ अग्निकी ज्वालाओंसे समन्वित वह तेज मानो | आप पुराणपुरुषोत्तम, ज्ञानकी मूर्ति और वाणी ब्रह्माण्डको जला डालनेके लिये उद्यत था। उसे देखकर | आदिसे अगोचर हैं। ऐसे आप विनायकका दर्शनकर हम सभी देवताओंकी दृष्टि चकाचौंध हो उठी, तदनन्तर उन्होंने | धन्य हो गये, कृतार्थ हो गये, ऐसा कहते हुए वे देवता अपने ज्ञानचक्षुओंसे उस तेजके मध्यमें भगवान् विनायककी | [आनन्दित हो] नृत्य करने लगे ॥ ३९ ॥ विशाल मूर्तिको देखा, जो दस हाथोंवाली थी, अन्धकारको | मुनि बोले—जिस प्रकारसे देवताओंने उस तेजस्वरूप दूर करनेवाली थी, रत्नोंके मुकुटको धारण की हुई और | विनायक (की महिमा)-का वर्णन किया, उसी प्रकारसे करोड़ों सूर्योंके समान कान्तिवाली थी ॥ ३२-३३ ॥ | जगन्माता पार्वतीने भी उन गजाननकी महिमा वर्णित गणेशजीकी वह मूर्ति विद्युत्के समान प्रभासे | की ॥ ४० ॥ सम्पन्न थी, उत्तम रत्नोंके कुण्डल धारण किये हुई थी | देवी बोलीं—जिन निर्गुण, निराकार, अव्यक्त, और सुन्दर दाँतोंवाली थी। उसने दिव्य परिधान धारण | सर्वत्र गमन करनेवाले, ध्यानसे जाननेयोग्य, चिदाभास, कर रखा था, सिन्दूरका विलेपन किया हुआ था और | सर्वत्र व्याप्त, पर, जगत्के कारणभूत एवं सच्चिदानन्द- दस भुजाओंमें दस आयुध धारण कर रखे थे ॥ ३४ ॥ | विग्रहस्वरूप परमात्माके विषयमें आजतक मैंने जो भी उस मूर्तिके मस्तकपर कस्तूरीका तिलक सुशोभित | चिन्तन किया, वह सब आज मैंने इस साकार विनायकरूपमें हो रहा था। उसने वक्षःस्थलपर मोतियोंकी माला | स्पष्टरूपसे देखा है। वे ही परमात्मा अनेक दैत्योंका वध धारण कर रखी थी। प्रलयकालीन अग्निके समान उसका | करनेके लिये, सम्पूर्ण जगत्का उपकार करनेके लिये तेज सम्पूर्ण विश्वमें व्याप्त हो रहा था। उस विनायकमूर्तिने | और अखिल चराचर विश्वकी रक्षा करनेके लिये मेरे नागका यज्ञोपवीत धारण कर रखा था। उसे सर्वेश्वर | घरमें अवतीर्ण हुए हैं ॥ ४१-४३ ॥ जानकर तब उन देवताओंने उन्हें प्रणाम किया और वे | मुनि बोले—तदनन्तर देवी पार्वतीने भक्तिभावपूर्वक उन आनन्दघन परमेश्वर विनायककी प्रार्थना करने | उनकी पूजा की और उन्हें अपना वाहन सिंह प्रदान लगे ॥ ३५-३६ ॥ | किया। माता पार्वतीने उनका 'वक्रतुण्ड' यह नाम रखा, देवता बोले—[हे प्रभो!] योग-साधनाद्वारा प्राप्त | जो मनुष्योंको सब प्रकारके अर्थोंको प्रदान करनेवाला होनेवाले आपका हमने दर्शन प्राप्त किया है। आप | है। उन्होंने उनसे दैत्य दुरासदके वधके लिये, देवताओंको अतर्क्य, अव्यय, स्वराट्, निरामय, निराभास, निर्विकल्प, | शत्रुओंसे रहित बनाकर उन्हें अपने-अपने पदकी प्राप्तिके अजर और अमर हैं। आप सर्वस्वरूप, सबके ईश्वर, | लिये प्रार्थना की ॥ ४४-४५ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'विनायकके आविर्भावका वर्णन' नामक चालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४० ॥ इकतालीसवाँ अध्याय विनायकदेव और दैत्य दुरासदका युद्ध, भयभीत दैत्य दुरासदका युद्धक्षेत्रसे वापस लौटना ब्रह्माजी बोले—इस प्रकार देवी पार्वती तथा | प्राणियोंका श्रेष्ठ रीतिसे पालन करनेके लिये, दैत्य दुरासदका देवताओंके द्वारा भगवान् विनायककी स्तुति-प्रशंसा की | वध करनेके लिये, पृथ्वीके भारका हरण करनेके लिये जानेके अनन्तर गणेशजी बड़े ही प्रेमपूर्वक देवी पार्वतीको | तथा हे मातः ! हे सर्वज्ञे ! आपकी सेवा करनेके लिये और प्रणाम करके प्रसन्न होकर उनसे बोले ॥ १ ॥ | वैदिक धर्म-कर्मकी स्थापना करनेके लिये अवतीर्ण हुआ गणेशजी बोले—मैं देवताओं तथा सभी लोकोंके | हूँ, मैं जो कहता हूँ, वही करूँगा भी ॥ २-३ ॥
क्री०ख०-अ०४१ ] * विनायकदेव और दैत्य दुरासदका युद्ध * ३६९ ब्रह्माजी बोले—विघ्नेश्वर विनायकके द्वारा ऐसा कहे जानेपर सभी देवता पुनः प्रणाम करके और स्तुति करके उन जगत्के कारणके भी परम कारणस्वरूप गणेशजीसे कहने लगे—जो व्यक्ति भूमिके रजकणोंकी गिनती कर सके, आकाशस्थित नक्षत्रों एवं तारागणोंकी गणना कर सके और जो सागरके जलको माप सके, वही आपके गुणोंको जान सकता है॥४-५॥ हे विभो ! आज देवताओंके नेत्रोंका होना धन्य हो गया, जो कि उनके द्वारा आपके युगलचरणोंका दर्शन हुआ है। आज हमारा दुःख समाप्त हो गया और हमने अपना-अपना पद भी प्राप्त कर लिया॥ ६॥ हे अखिलेश्वर ! इस दुरासदका वध करें और पृथ्वीके भारका हरण करें। देवताओंका इस प्रकारका वचन सुनकर वे विनायक हँसने लगे ॥७॥ अपने दस हाथोंमें दस आयुध धारण करनेवाले प्रभु विनायक कहने लगे—'सब कुछ करूँगा।' हर्षित होकर गद्गद वाणीमें इस प्रकार देवताओंसे कहकर भगवान् गणेश सिंहपर आरूढ़ होकर शीघ्र ही वाराणसीपुरीकी ओर चल पड़े। भगवान् शिव, पार्वती तथा सभी देवता भी उनके पीछे-पीछे गये ॥ ८-९ ॥ देवसेनासहित विनायकको वहाँ आया हुआ जानकर वीर दुरासद दैत्य नगरसे बाहर चला आया ॥ १० ॥ उस दैत्य दुरासदकी मन्त्रियोंसहित, नाना प्रकारके आयुधोंसे सुसज्जित, बादलोंके समान बार-बार गर्जन करती हुई विशाल सुदृढ़ सेनाको देखकर विनायकने सभी कन्दराओंको विदीर्ण करनेवाला उच्च स्वरयुक्त गर्जन किया और वे उस महादैत्यसे बोले-अरे दैत्य ! अब भी तुम क्यों भ्रममें पड़े हो ? ॥ ११-१२॥ तुमने बलपूर्वक देवताओं तथा राजाओंपर विजय प्राप्त की है, सभी मुनियोंको अपमानित किया है, अरे दुष्ट ! उस समय मैं नहीं था ॥ १३ ॥ पूर्वमें तुमने निर्भय होकर बहुतसे दोष-पापोंका संचय किया हुआ है, अब उन सभीका फल इस समय तुम मुझ गणेशसे प्राप्त करो। तुमने तीनों लोकोंमें रहनेवाले समस्त प्राणियोंको बहुत कष्ट पहुँचाया है, मैं उन्हींको सुख पहुँचानेके लिये तथा तुम्हारे भारसे पीड़ित पृथ्वीका उद्धार करनेके लिये प्रकट हुआ हूँ॥ १४-१५ ॥ अरे दुष्ट ! तुम मान-सम्मान तथा दुस्त्याज्य लज्जाको छोड़कर मेरी शरणमें आ जाओ, यदि तुम युद्धस्थलमें जाना चाहो, तो इस समय मृत्युको प्राप्त होओगे ॥ १६ ॥ भगवान् शिवसे प्राप्त वरदानके प्रभावसे तुमने सम्पूर्ण त्रिलोकीको पीड़ित किया है। उस दुष्ट बुद्धिवाले दैत्य दुरासदसे इस प्रकार कहकर युद्धोद्यत भगवान् गणेशने अत्यन्त क्षुब्ध होकर प्रलयाग्निके समान दीप्तिमान् और अग्निकी ज्वालामालाओंसे सुशोभित अपने परशु नामक अस्त्रको उठाया। उस परशुकी प्रभासे भगवान् सूर्य भी आच्छादित हो गये ॥ १७-१८ ॥ तदनन्तर उन्होंने यमराजके समान होकर बड़े ही वेगसे उस परशुसे उसके वक्षःस्थलपर प्रहार किया। उस परशुसे आहत होनेपर भी उसका एक रोमतक नहीं हिला। क्रोधसे आँखें लाल करता हुआ तथा तीनों लोकोंको मानो ग्रस लेता हुआ वह दैत्य दुरासद उन गणेशसे कहने लगा। न तो देवता, न देवराज इन्द्र और न दिक्पाल ही मेरे समक्ष युद्धके लिये आये, फिर तुम बालभावसे किस प्रकार मेरे सम्मुख आये हो ? तुम मेरे सामनेसे हट जाओ ॥ १९-२१ ॥ अरे मूर्ख ! मैं यमराजसे भी नहीं डरता हूँ, फिर तुम क्यों मरनेकी इच्छा करते हो? ऐसा कहकर उस दुरासदने म्यानसे छूरेके समान तीक्ष्ण धारवाली तथा अत्यन्त दीप्तिमान् तलवार निकाली, जिसके आघातसे पर्वत भी चूर-चूर हो जाते थे, उस तलवारसे दुरासदने गणेशजीपर आघात किया, किंतु उन्होंने अपने अंकुशसे उसे रोक दिया ॥ २२-२३ ॥ वह तलवार परशुकी चोटसे सौ भागोंमें टूटकर नीचे गिर पड़ी। तलवारके टूट जानेपर महाबली दैत्य दुरासद मल्लयुद्धके लिये आया। तब देव विनायक भी आयुधोंसे युद्ध करना छोड़कर उसीके समान वेगसे उसके समक्ष आये। तब उन दोनोंमें रोमांचकारी भीषण युद्ध हुआ ॥ २४-२५ ॥ बाहुओंसे, कोहनियोंसे तथा मुष्टियोंसे वे एक- दूसरेपर आघात करने लगे, साथ ही पैरोंसे, जानुओंसे, जंघाओंसे तथा पीठसे एक-दूसरेको चोट पहुँचाने लगे।
३७० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- वे दोनों बार-बार महान् गर्जना करते हुए उछल- उछलकर बारी-बारीसे एक-दूसरेके शरीरपर गिर रहे थे और एड़ियोंके प्रहारसे तथा कोहनियोंके आघातसे एक- दूसरेपर वार कर रहे थे॥ २६-२७॥ वे दोनों अपनी जाँघों, घुटनों तथा कन्धोंसे परस्पर आघात कर रहे थे। युद्ध करते हुए वे धरतीपर लुढ़क रहे थे और बहुत अधिक धूलिधूसरित हो गये थे॥ २८॥ जब वे दोनों दूसरेपर विजय प्राप्त कर लेते थे तो 'बहुत अच्छा, बहुत अच्छा'- इस प्रकारसे चिल्ला उठते थे। इस प्रकार बहुत दिनोंतक होनेवाले उनके युद्धको देखकर देवता अत्यन्त विस्मित हो उठे॥ २९॥ वे इस दैत्य दुरासदके सामर्थ्यको देखकर मनमें बहुत लज्जित हो रहे थे। तदनन्तर देव विनायकने उसके ललाटपर अपनी मुट्ठीसे प्रबल आघात किया॥ ३०॥ इस प्रहारसे वह भूमिपर गिर पड़ा और उसका मुख फूट गया। दो मुहूर्ततक वह उसी प्रकार अचल होकर भूमिपर गिरा रहा, जैसे कि वज्रके प्रहारसे पर्वत गिरकर अचल पड़ा रहता है। दीर्घकालीन मूर्च्छाको छोड़कर किसी प्रकार वह उठ तो खड़ा हुआ, किंतु अपनेको वह असमर्थ मानने लगा। वह बहुत व्याकुल हो चुका था॥ ३१-३२॥ तदनन्तर सायंकाल होनेपर वह दैत्य दुरासद अपनी सेनाके बीच चला आया और वे विनायक भी युद्धभूमिसे हर्षपूर्वक अपने स्थानको लौट गये। जो व्यक्ति युद्धकाल उपस्थित होनेपर विनायकदेव और दुरासदके बीच हुए युद्धके इस वृत्तान्तका श्रवण करता है, वह निश्चित ही विजय प्राप्त कर लेता है, जिस प्रकार कि विनायकने विजय प्राप्त की॥ ३३-३४॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'द्वन्द्वयुद्धका वर्णन' नामक इकतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ४१॥ बयालीसवाँ अध्याय दैत्य दुरासदद्वारा पुनः विनायकसे युद्ध, विनायकद्वारा अपने तेजसे छप्पन विनायकोंको प्रकट करना, विनायकोंद्वारा सम्पूर्ण सेनाके मारे जानेपर दुरासदद्वारा भगवान् शंकरसे प्राप्त वरदानका स्मरण करना, विनायकद्वारा योगबलसे विराट् रूप धारणकर एक पैर काशीमें तथा दूसरा पैर दुरासदके सिरपर रखकर उसे काशीके द्वारके रूपमें काशीमें प्रतिष्ठित करना और स्वयं भी 'एकपाद विनायक'के नामसे काशीमें स्थित होना गृत्समद बोले- उन वक्रतुण्ड भगवान् गजाननके पराक्रमको जानकर धैर्य धारणकर वह दैत्यराज दुरासद अस्त्रोंको लेकर पुनः युद्धके लिये आया॥ १॥ भगवान् शिवका स्मरण करके तथा बड़े ही आदरपूर्वक अग्निदेवके मन्त्रका उच्चारणकर और उस मन्त्रसे बाणको अभिमन्त्रित करके उसने विनायकपर वह आग्नेयास्त्र छोड़ा॥ २॥ प्रज्वलित अग्निकी उस ज्वालासे भयभीत होकर सभी देवता देव विनायकके पीछे छिप गये। तब सर्वज्ञ विनायकने पर्जन्यास्त्रको छोड़ा॥ ३॥ उस पर्जन्यास्त्रके द्वारा क्षणभरमें हाथीकी सूँड़के समान मोटी जलकी धारा प्रवाहित हो गयी। फलतः वह अग्नि क्षणभरमें शान्त हो गयी। यह देखकर वह दैत्य दुरासद अत्यन्त क्रुद्ध हो उठा॥ ४॥ तब उसने जलवृष्टिको रोकनेके लिये अत्यन्त वेगशाली मारुतास्त्रको छोड़ा। उस वेगयुक्त वायुके कारण पृथ्वी कम्पायमान हो उठी। वृक्ष तथा पर्वत भूमिपर गिरने लगे॥ ५॥ उस मारुतास्त्रके प्रभावसे महामेघ भी आधे क्षणमें विनष्ट हो गये। तब विनायकदेवने अपने मनोबलसे
क्री०ख०-अ०४२ ] * दैत्य दुरासदद्वारा पुनः विनायकसे युद्ध * ३७१
[बायाँ स्तम्भ] पर्वतास्त्रको प्रकट किया। सर्वत्र पर्वत-ही-पर्वत हो गये, जिससे उस मारुतास्त्रकी गति कुण्ठित हो गयी। मारुतास्त्रके विलीन हो जानेपर उस दुरासदने रौद्रास्त्रको उत्पन्न किया॥ ६-७॥ उस रौद्रास्त्रके छोड़े जानेपर वक्रतुण्ड गणेशजीने भी उसको निवारित करनेके लिये ब्रह्मास्त्रको प्रकट किया। उससे दुरासदकी सेना भस्म हो गयी ॥ ८॥ वे दोनों अस्त्र-रौद्रास्त्र और ब्रह्मास्त्र बहुत दिनोंतक परस्पर युद्ध करते रहे। उनके परस्पर संघातसे उत्पन्न अग्नि पृथ्वीपर गिरने लगी ॥ ९ ॥ [हे शुभे!] उस अग्निसे लोगोंको जलता हुआ जानकर ब्रह्मा तथा शिवजीने उन दोनों अस्त्रोंको रोका। तब वह दैत्य विनायकको अपनेसे अधिक उत्कृष्ट पराक्रमी जानकर अपने अमात्योंसे बोला- ॥ १० ॥ आप सभी लोग उस विनायकसे युद्ध करें, मैं भोजन करके पुनः युद्ध करूँगा। तब सभी सैनिकोंसहित अमात्यगण उन विनायकसे युद्ध करने लगे ॥ ११ ॥ उस समय विनायक अकेले होनेके कारण चिन्तित हो गये। तब उन्होंने अपने तेजसे छप्पन विनायकमूर्तियोंको प्रकट किया। वे सभी विनायक विविध प्रकारके अलंकारोंसे समन्वित थे, विविध प्रकारकी मालाओंसे सुशोभित थे। उन सभी ने दिव्य बाजूबन्द धारण कर रखे थे और सभी चन्द्रमाको अपने मस्तकपर आभूषणके रूपमें धारण किये हुए थे ॥ १२-१३॥ उनमें कोई चार भुजावाले थे, कोई छः भुजावाले और कोई दस भुजावाले थे। कोई सिंहके ऊपर विराजमान थे, कोई मयूरके ऊपर आरूढ़ थे, तो कोई मूषकपर सवार थे। वे सभी शत्रुओंके सैनिकोंको विदारित करते हुए युद्ध करने लगे। उन्होंने कुछ दैत्योंके पाँव तोड़ डाले, तो किसीके मस्तकोंको फोड़ डाला ॥ १४-१५॥ कुछके बाहुओंको छिन्न-भिन्न कर डाला और किसीके जानु, जंघा तथा उदरदेशको तोड़-मरोड़ दिया। वे हुंकार करते हुए गरज रहे थे। कुछ दैत्य उनकी शरणमें आ गये ॥ १६॥ कुछ दैत्य अपने प्राणोंकी रक्षा करनेके लिये वहाँसे
[दायाँ स्तम्भ] भागने लगे। कुछ दैत्य प्रहार करते हुए युद्धके आमने- सामने मृत्युको प्राप्त हो गये ॥ १७ ॥ युद्धमें वीरगतिको प्राप्त हुए वे स्वर्गलोकमें गये और वहाँ विविध भोगों तथा अप्सराओंके साथ आनन्द मनाने लगे। अनेकों घोड़े, रथ, हाथी, खच्चर तथा ऊँट विविध प्रकारके शस्त्रोंके द्वारा आहत होनेपर शरीरके कट जानेसे भूमिपर गिर पड़े और उनके प्राण निकल गये। वहाँ रक्तकी नदियाँ प्रवाहित हो चलीं। जो केशरूपी सेवारसे सुशोभित हो रही थीं ॥ १८-१९ ॥ छुरी और खड्ग उन रक्तरूपा नदियोंके मत्स्य थे, हाथी मगरमच्छ थे तथा ढालें ही कच्छपरूप थीं। दैत्य सैनिकोंके धड़ ही कमलरूप थे, सैनिकोंकी चर्बी ही नदीका फेन और मेद ही कीचड़रूप था ॥ २० ॥ धनुष [उन रक्तसरिताओंके] सर्प थे, हड्डियाँ बगुले थे, कवच एवं युद्धपरिधान बड़े-बड़े मेढक थे और भाले ही [पानीके साथ बहनेवाले] काष्ठखण्ड थे। [इन सभी विशेषताओंसे युक्त] तथा मनस्वीजनोंको हर्षित करनेवाली वे [रक्तसरिताएँ] शोभायमान हो रही थीं। भोजन कर लेनेके अनन्तर वहाँ आकर उसने जब रणांगणको देखा तो सारी सेनाके मारे जानेसे वह दैत्य दुरासद अत्यन्त दुखित हो उठा ॥ २१-२२ ॥ उस समय वह शूलपाणि भगवान् शंकरद्वारा वरदानके समय दिये गये उस वचनको याद करने लगा, जिसमें कहा गया था कि शक्तिसे उत्पन्न कोई देवता ही तुमपर विजय प्राप्त करेगा। क्या यही बालक शक्तिसे उत्पन्न तो नहीं है? क्योंकि इसमें तीनों लोकोंका सारभूत बल दिखायी देता है ॥ २३-२४ ॥ काल भी इसपर विजय प्राप्त करनेमें समर्थ नहीं है, फिर अन्य दूसरेकी क्या बात है! ऐसा मनमें विचारकर वह अकेला पड़ जानेके कारण भाग उठा ॥ २५ ॥ वक्रतुण्ड गणेशजीने उस समय विचार किया कि भागते हुए शत्रुको मारना नहीं चाहिये। [वैसे तो] देवताओंके द्वारा भी यह मारे जा सकनेयोग्य नहीं है, जैसा कि शंकरजीने कहा है- ॥ २६ ॥ अतः अब मैं अपने योगबलसे उत्तम विराट् रूप
३७२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- धारण करूँगा। तब विराट् स्वरूपधारी उन विनायकने | प्रकार दैत्य दुरासदपर विजय प्राप्त करके देव विनायकने अपने एक हाथसे उस दुरासदको पकड़ लिया ॥ २७ ॥ | समस्त जगत्को आनन्दित कर दिया ॥ ३२ ॥ वे एक पैरसे काशीमें स्थित हुए ताकि बलपूर्वक | उन वक्रतुण्ड विनायकपर पुष्पोंकी वर्षा करके उन्हें उस नगरीकी रक्षा कर सकें और दूसरा पैर उन्होंने उस | प्रणाम करके और उनका भलीभाँति पूजन करके सभी दैत्यके सिरपर रखा। विनायक उस दैत्यसे बोले—अरे | देवता अपने-अपने स्थानोंको गये और मुनिगण भी दैत्य! भगवान् शिवके वरदानके प्रभावसे तुम्हारी मृत्यु | अपने-अपने आश्रमोंकी ओर चले गये ॥ ३३ ॥ नहीं हो रही है, अतः तुम इस काशीनगरीमें पर्वतके | अन्य जो-जो भी मनुष्य उन विनायककी पूजा करते समान निश्चल होकर रहो ॥ २८-२९ ॥ | हैं, उनकी समस्त कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं। इस प्रकार तुम इस नगरीके द्वारके समान बनकर स्थित रहो, | काशीमें विनायकदेव छप्पन मूर्तियोंसे युक्त विख्यात हुए। ताकि यहाँ आनेवालोंकी दृष्टि सबसे पहले तुमपर ही पड़े। | वे विनायक अपने विराट् रूपको अन्तर्धान करके तुण्डन तुम यहाँ दुष्टजनोंको निरन्तर पीड़ा पहुँचाते रहो। तुम्हें | नामक पुरमें भी 'एकपाद विनायक' नामसे स्थित हुए और मेरी नित्य सन्निधि प्राप्त होगी। उस दैत्य दुरासदने भी | वहाँ वे सभीकी कामनाएँ पूर्ण करते हैं ॥ ३४-३५ ॥ परम भक्तिभावपूर्वक उसी वरकी याचना की ॥ ३०१/२ ॥ | जो भक्तिमान् पुरुष इस श्रेष्ठ आख्यानका श्रवण दैत्य दुरासद बोला— [हे विनायक !] आप इसी | करता है, वह अपनी सभी मनोकामनाओंको प्राप्त कर प्रकारसे मेरे मस्तकपर पैर रखकर सदा स्थित रहें ॥ ३१ ॥ | लेता है और अन्तमें गणेशजीके धामको प्राप्त होता है। मुनि बोले—उस दैत्यसे 'ऐसा ही होगा' इस | वह सर्वत्र विजय प्राप्त करता है और पुष्टि तथा आरोग्य प्रकार कहकर विनायक काशीमें स्थित हो गये। इस | प्राप्त करता है ॥ ३६ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'दुरासदपर विजयका वर्णन' नामक बयालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४२ ॥ तैंतालीसवाँ अध्याय देवताओं तथा मुनियोंद्वारा ढुण्ढिराज गणेश तथा छप्पन विनायकोंकी स्तुति तथा पूजाका वर्णन गृत्समद बोले—गणेशजीद्वारा उस दैत्य दुरासदपर | भी आप ही हैं ॥ ४ ॥ विजय प्राप्त कर लेनेके अनन्तर आठों दिक्पाल, | आप नाना प्रकारके अर्थोंकी गवेषणा करते हैं और मुनिगण, चन्द्रमा, सूर्य, देवगुरु बृहस्पति तथा शुक्राचार्य— | प्राणियोंको उन-उन कर्मोंमें नियुक्त करते हैं। मनीषियोंके ये सभी दुरासदके शत्रु प्रभु देवाधिदेव विनायककी | द्वारा ढुण्ढि (ढुन्ध्) धातुका प्रयोग गवेषण अर्थमें किया महिमाका इस प्रकार गान करने लगे— [हे प्रभो!] | गया है। इसलिये आपकी 'ढुण्ढि' यह संज्ञा है और आपने दैत्य दुरासदका दमन करके श्रुति-स्मृतिविहित | ढुण्ढिके अनन्तर 'राज' पदके प्रयोगसे आपको 'ढुण्ढिराज' मार्गकी स्थापना की है। दुरासदको पराजित करनेमें सब | कहा जाता है ॥ ५१/२ ॥ प्रकारसे अशक्त हम देवताओंको अपने अपने-अपने | आपका दर्शन, पूजा, ध्यान तथा स्मरण धर्म-अर्थ- पदपर प्रतिष्ठित किया है। आप ही इस विश्वकी सर्जना | काम तथा मोक्ष इस चतुर्विध पुरुषार्थका साधन है और करते हैं और आप ही कर्मफलोंको प्रदान करनेवाले | पुत्र-पौत्रको प्रदान करनेवाला है ॥ ६१/२ ॥ हैं ॥ १–३॥ | ऐसा कहकर उन सभी देवता आदिने मन्दार पुष्पों, आप समस्त प्राणियोंमें समान दृष्टि रखते हैं। आप | शमीपत्रों, हरित वर्णके दूर्वांकुरों तथा श्वेत पुष्पों और कर्मोंमें लिप्त नहीं होते। ब्राह्मण-क्षत्रिय आदि चारों वर्ण | नाना प्रकारके पक्वान्नोंके नैवेद्यों और बहुत प्रकारके आपके ही आश्रयमें रहते हैं और सभी प्राणियोंके आधार | फलोंके द्वारा उन ढुण्ढिराजका पूजन किया ॥ ७-८ ॥
क्री०ख०-अ०४४ ] * मुनि गृत्समदद्वारा रानी कीर्तिसे विनायकदेवकी महिमाका कथन * ३७३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
साथ ही रत्नोंकी महान् राशि अर्पित करके तथा ब्राह्मणोंको भोजन कराकर उन विनायकको सन्तुष्ट किया। इसी प्रकार उन्होंने [अविमुक्तेश्वर श्रीकाशी विश्वनाथजीके बाहर] सातों आवरणोंमें स्थित सभी छप्पन विनायकोंका भी पूजन किया ॥ ९॥
तबसे वे सभी छप्पन विनायक वाराणसी नगरीकी रक्षा करनेके लिये वहीं स्थित हो गये। उनसे अतिरिक्त पाँच मुखवाले एक पंचमुखी विनायक भगवान् विश्वनाथके द्वारपर स्थित हो गये ॥ १० ॥
अन्य सभी छप्पन विनायक भिन्न-भिन्न नामोंसे वाराणसीमें व्याप्त होकर (सातों आवरणोंमें) स्थित हो गये। भगवान् विश्वेश्वरके वाराणसीमें स्थित हो जानेपर वे सभी भी वहीं स्थित हो गये ॥ ११॥
तबसे सूर्य तथा चन्द्रमाके स्थित रहनेतक ब्रह्मा आदि सभी देवता तथा सभी मुनिजन अपने-अपने अधिकारोंमें स्थित हो गये। सभी लोग उसी प्रकार सभी धर्म-कर्मोंको करने लगे, जैसा कि वे पूर्वमें करते थे ॥ १२ ॥
हे कीर्ते ! जिस प्रकार तुमने पूछा था, वह सब मैंने तुम्हें बता दिया है। ढुण्ढिराज गणेशके अवतारकी कथाका श्रवण धर्म [-अर्थ], काम तथा सुख (मोक्ष) प्रदान करनेवाला है। अब मैं तुम्हें काशीके राजा दिवोदासके राज्यसे बाहर चले जानेकी कथा बताऊँगा ॥ १३॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'ढुण्ढिराजाख्यान' नामक तैंतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४३ ॥
चौवालीसवाँ अध्याय
मुनि गृत्समदद्वारा रानी कीर्तिसे विनायकदेवकी महिमाका कथन, काशीमें राजा दिवोदासके राज्य-शासनका वर्णन
कीर्ति बोली— [हे मुने!] आपने दैत्य दुरासदके वधके लिये तथा तीनों लोकोंके पालनके लिये अवतरित हुए शक्तिपुत्र ढुण्ढिराजकी कथाका वर्णन किया। मैंने आपसे यह सुना कि वे विनायक एक पैरसे तुण्ड[न] नगरमें स्थित हुए और दूसरे पैरसे दैत्य दुरासदके मस्तकको आक्रान्तकर वाराणसीमें स्थित हुए; तो दो पैरोंसे एक बारमें दो अलग-अलग स्थानोंपर रहना कैसे सम्भव है? हे ब्रह्मन् ! आप सब कुछ जाननेवाले हैं, अतः मेरे इस संशयका निवारण करें ॥ १–३॥
मुनि गृत्समद बोले— [हे कीर्ते!] विश्वरूप, विश्वके कर्ता, समस्त विश्वकी रक्षा करनेवाले तथा समस्त विश्वमें व्याप्त रहनेवाले विश्वेश्वर ढुण्ढिराज गणेशके शासनमें क्या असम्भव है ! ॥ ४॥
जो जगत्के अन्तर्यामी हैं, पर हैं, विश्वका संहार करनेवाले हैं, सातों पाताल ही जिनके चरण हैं, स्वर्गलोकतक जिनके केश व्याप्त हैं, जिनके हाथ-पैर सब ओर हैं, सभी ओर जिनके कान और नेत्र हैं, जो मनसे, वेदोंसे, ब्रह्मा आदि देवताओंसे तथा योगियोंके लिये भी यथार्थरूपसे अगम्य हैं। जो वायु, पृथिवी तथा जलस्वरूप हैं, जो हजारों सूर्योंके सदृश तेजोमय हैं, सूर्य, चन्द्रमा, आकाश आदि जिनका ही स्वरूप हैं, जो चराचर जगत्के गुरु हैं और स्वयं चराचरात्मा भी हैं। जिनके रोमकूपोंमें करोड़ों-करोड़ों ब्रह्माण्ड उसी प्रकार भ्रमण करते रहते हैं, जिस प्रकार कि हवाके द्वारा लाये गये पतंगे आकाशमें घूमते रहते हैं, अतः हे मात: ! ऐसे उन देव विनायकके विषयमें कोई भी संशय अथवा तर्क-वितर्क नहीं किया जा सकता ॥ ५–९॥
वे प्रभु विनायक अनेक स्वरूपवाले हैं और चराचर विश्वकी सृष्टि करनेमें समर्थ हैं। हे राज्ञि! उनकी इच्छासे अमृत भी विषरूप तथा विष भी अमृतरूप हो जाता है, अतः उनके लिये कुछ भी असम्भव नहीं है। उन भगवान् गजाननके अवतारकी विचित्र गति कही गयी है ॥ १०-११ ॥
उन विनायकके कितने अवतार हुए, कब हुए और कहाँ हुए, इसे जाननेमें शेषनागसहित समस्त देवता भी कभी भी समर्थ नहीं हुए ॥ १२ ॥
अतः सभी धर्मोंको जाननेवाली हे कीर्ते ! इस प्रकारके संदेहोंका परित्यागकर मेरे द्वारा कही जानेवाली
३७४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
कथाको सुनो, जिसे सुनकर मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त हो | आज्ञाका पालन करनेवाली थी ॥ २०-२१ ॥ जाता है ॥ १३ ॥ | राजा दिवोदास आचार, व्यवहार अथवा प्रायश्चित्त- प्राचीन कालकी बात है, सूर्यवंशमें दिवोदास | सम्बन्धी बातोंका निर्णय पण्डितजनोंसे करवाते थे, वे नामके एक राजा हुए, जो बहुत बड़े दानी, स्वाभिमानसे | किसीको भी राजदण्ड नहीं देते थे। उस समय सभी भरे हुए, सम्पूर्ण भूमण्डलमें मान-सम्मानको प्राप्त, | देवता शंकरजीके साथ मन्दराचल-पर्वतपर चले गये थे। देवगुरु बृहस्पतिके समान वक्ता, सर्वज्ञ, सर्वदा सभीका | राजा दिवोदासके काशीमें शासन करनेपर न तो किसीकी कल्याण करनेवाले, वेद-शास्त्रों तथा पुराणोंके ज्ञाता, | अपमृत्यु होती थी, न किसीको कोई शोक ही होता था और विद्वज्जनोंके अत्यन्त प्रिय थे ॥ १४-१५ ॥ | और न किसी प्रकारका दुःख ही था ॥ २२-२३ ॥ वे अपनी सुन्दर आकृतिसे स्त्रियोंको मोहित करनेवाले | उनके द्वारा शासित राज्यमें तीनों प्रकारके उत्पात होनेपर भी जितेन्द्रिय थे। वे निरन्तर उपकार-परायण, | (दिव्य, आन्तरिक्ष और भौम) नहीं होते थे। वर्षा न दूसरेसे द्रोह करनेसे दूर रहनेवाले, पराये धनकी तनिक | होनेके कारण पशु-पक्षी तथा मनुष्योंमें जो महान् भी अभिलाषा न रखनेवाले, दूरदृष्टि रखनेवाले और | हाहाकार हो रहा था, वह अब शान्त हो गया था। वर्षा अत्यन्त पराक्रमसम्पन्न थे ॥ १६ १/२ ॥ | हो जानेके कारण खेतोंमें बहुत प्रकारके सस्य (धान्यादि) उन राजा दिवोदासकी तपस्यासे सन्तुष्ट होकर | उत्पन्न होने लगे। उन्हीं धान्यादिपर प्राणिमात्रका जीवन लोकोंपर उपकार करनेवाले ब्रह्माजीने वृष्टि न होनेके | आधारित रहता है ॥ २४-२५ ॥ कारण अकालग्रस्त काशीपुरीका उत्तम राज्य उन्हें प्रदान | पूर्व समयमें जिस प्रकारसे स्वाहाकार, स्वधाकार किया। सभी देवताओंको बहिष्कृत करनेपर ही उन | तथा वषट्कार (अर्थात् देवपूजन, यज्ञ-यागादि, श्राद्ध बुद्धिमान् राजा दिवोदासने काशीका राज्य स्वीकार किया | तथा तर्पण आदि) होता था, वह सब फिरसे होने लगा। था ॥ १७-१९॥ | जिन देवताओंने पूर्वमें उन राजाकी प्रार्थना की थी, वे तदनन्तर राजा दिवोदास स्वयं ही सूर्य, इन्द्र, अग्नि, | सुखी हो गये। ब्रह्माजीके कथनानुसार सभी देवताओंने वायु तथा चन्द्रमा बनकर धर्मपूर्वक उस काशीपुरीका | राजा दिवोदासकी स्तुति की, उन राजा दिवोदासने भी परिपालन करने लगे। उनकी सुशीला नामकी पत्नी थी, | देवोंका दर्शन प्राप्तकर विविध प्रकारसे उनकी बहुत जो पतिव्रता, धर्माचरणपरायण, दानशील तथा पतिकी | स्तुति की ॥ २६-२७॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'दिवोदासके उपाख्यानमें' चौवालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४४ ॥
पैंतालीसवाँ अध्याय शंकरजीका सभी देवताओंको लेकर मन्दरगिरिपर जाना, राजा दिवोदासका काशीमें राज्य करना, भगवान् शिवका दिवोदासके विकार देखनेके लिये देवताओं तथा ऋषियोंको काशी भेजना, किंतु दिवोदासको निर्विकार देखकर उन सभीका काशीमें स्थित हो जाना, फलस्वरूप शिवका काशीदर्शनके लिये चिन्तित होना
कीर्ति बोली- हे मुने ! सभी देवता मन्दराचल | कृपा करें ॥ १ १/२ ॥ पर्वतपर क्यों चले गये और भगवान् शिवने उस रमणीय | मुनि गृत्समद बोले- एक बार जब बारह वर्षोंतक पुरी वाराणसीका क्यों परित्याग किया ? हे महामुने ! हे | लगातार वृष्टि नहीं हुई, तो सम्पूर्ण चराचर जगत् विनष्ट देवर्षे ! मुझे इस विषयमें संशय है, इसे आप दूर करनेकी | होने लगा, पृथ्वीपर स्वाहाकार-स्वधाकार तथा वषट्कार
क्री०ख०-अ०४५ ] * श्रीगणेशपुराणके कतिपय लीला-प्रसंग-तीन * ३७५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 श्रीगणेश-परिवार श्रीशिव-परिवार
[क्रीडाखण्ड अ० ४५]
३७६ * श्रीगणेशपुराणके कतिपय लीला-प्रसंग-चार * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 भगवान् शिवद्वारा सूर्यदेवको काशीपुरी भेजना [क्रीडाखण्ड अ० ४५] भगवान् वामनको राजा बलिद्वारा भूदान [क्रीडाखण्ड अ० ३१]
क्री०ख०-अ०४५ ] * शंकरजीका सभी देवताओंको लेकर मन्दरगिरिपर जाना * ३७७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ] होना बन्द हो गया। तब उस समय ब्रह्माजीके वचनोंसे प्रेरित होकर देवताओंने भगवान् शंकरकी प्रार्थना की ॥ २-३ ॥ देवता बोले—हे महादेव ! हे जगन्नाथ ! हे करुणानिधान ! हे शंकर ! महर्षि मरीचि मन्दराचलपर स्थित होकर दस वर्षोंसे तपस्या कर रहे हैं। हे देव ! आप उन्हें वर प्रदान करनेके लिये वहाँ जायें ॥ ४१/२ ॥ मुनि गृत्समद बोले— [हे कीर्ते !] इस प्रकारसे देवताओंद्वारा प्रार्थना किये गये करुणासागर भगवान् महेश्वर अग्नि, चन्द्रमा, अर्यमा (सूर्य), आदि सभी देवताओंके साथ उन महामुनि मरीचीजीको वर प्रदान करनेके लिये मन्दरगिरिपर गये ॥ ५-६ ॥ भगवान् शिवने देखा कि वे अस्थिमात्र शेष रह गये हैं, कदाचित् वे उस समय वहाँ न पहुँचते तो महर्षि मरीचि अपने प्राणोंका परित्याग कर देते ॥ ७ ॥ उनके उत्कट तपसे पार्वतीपति भगवान् शंकर अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्होंने अपना पद प्रदान किया तथा विमानमें बैठकर वाद्योंकी ध्वनि करते हुए अपने गणोंके साथ शीघ्र ही अपने लोकमें पहुँचाया। तभीसे सभी देवगणोंके साथ भगवान् शम्भु अत्यन्त कल्याणकारी पर्वतश्रेष्ठ मन्दराचलमें रहने लगे ॥ ८-९ ॥ जब भगवान् सदाशिवने राजा दिवोदासमें कोई भी दोष नहीं देखा तो उन्होंने बड़ी ही उत्सुकतापूर्वक उनके दोषोंको देखनेके लिये देवताओंको वाराणसी पुरीमें भेजा। जो-जो देवता काशी जाते और राजा दिवोदासमें कोई भी दोष नहीं देख पाते, तो वे अपने नामसे वहाँ काशीमें शिवलिंग स्थापित करके वहीं स्थित हो जाते ॥ १०-११ ॥ राजा दिवोदासके राज्यमें ब्राह्मण आदि सभी चारों वर्णोंके लोग अपने-अपने वर्ण एवं आश्रम-धर्मोंका परिपालन करते थे। सभी द्विजाति अपने आश्रममें स्थित होकर शास्त्रोंमें बताये गये आचारका पालन करते थे। शिष्य गुरुजनोंकी सेवा करते थे, स्त्रियाँ पतिव्रताएँ थीं और [सम्पूर्ण प्रजा] धर्माचरण करनेवाली, दानपरायण और व्रत-उपवास आदिके नियमोंका पालन करनेमें तत्पर
[दायाँ स्तम्भ] रहती थी ॥ १२-१३ ॥ संन्यासी तीनों समय (प्रातः, मध्याह्न तथा सायं) स्नानादि [संन्यासोचित] आचारोंका पालन करते थे, वानप्रस्थाश्रमी होम, मौनादिका आचरण करनेवाले थे। सभी गृहस्थाश्रम-धर्मका पालन करनेवाले, स्नान, सन्ध्या, जप, होम, स्वाध्याय, देवपूजन, अतिथिसत्कार, बलिवैश्वदेव—इन आठ कर्मोंको निष्पाप रहकर बड़े ही श्रद्धा-भक्तिपूर्वक स्वयं ही करते थे ॥ १४-१५ ॥ इसी कारण वहाँ धर्मकी बड़ी वृद्धि हुई और उत्तम वृष्टि हुई। उस समय स्वर्गस्थित देवता अत्यन्त आनन्दित रहते थे और पितरोंको स्वधाकार (श्राद्ध-तर्पण आदि) प्राप्त होता था ॥ १६ ॥ उस समय काशीमें न तो कोई स्त्री वन्ध्या थी, न कोई मासिकधर्मसे विहीन, न कोई स्त्री विधवा थी और न कोई स्त्री ऐसी थी, जिसके बच्चे पैदा होते ही मर जाते हों। न तो अवर्षण होता था, न अतिवृष्टि होती थी, न तो कोई राजद्रोह था और न किसी शत्रुका भय था। तोतों, टिड्डियों तथा चूहोंसे खेतीको कहीं कोई भय नहीं था और भलीभाँति कृषिकी उपज निर्विघ्न सम्पन्न होती थी ॥ १७-१८ ॥ नृपश्रेष्ठ दिवोदास यह डिण्डिम घोष नित्य ही करवाते थे कि जो कोई भी व्यक्ति विश्वेश्वर, विन्दुमाधव, ढुंढिराज गणेश, भैरव, दण्डपाणि, कार्तिकेय, मणिकर्णिका एवं भवानी (अन्नपूर्णा)-का दर्शन किये बिना तथा मणिकर्णिका एवं गंगामें बिना स्नान किये भोजन करेगा, वह निश्चित ही दण्डनीय होगा ॥ १९-२० ॥ ऐसे राजश्रेष्ठ दिवोदासके राज्य करते समय वहाँ लेशमात्र भी पाप नहीं था। बिना किसी दोषके रहते भगवान् सदाशिव उस काशीके राज्यको लेना नहीं चाहते थे। उस समय वाराणसीसे दूर मन्दरगिरिमें रहनेके कारण वहाँ (काशी)-के वियोगसे भगवान् शिव अत्यन्त दुखी हो गये थे। तब उन्होंने विघ्न उपस्थित करनेके लिये आठ भैरवों (असितांग, रुरु, चण्ड, क्रोध, उन्मत्त, कपाल, भीषण और संहारभैरव)-को काशीमें भेजा ॥ २१-२२ ॥
३७८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
[बायाँ स्तम्भ] भगवान् शिवने उनसे कहा—आपलोग राजा दिवोदासके राज्य काशीमें अणुमात्र (यत्किंचित्) पाप करायें। ऐसा होनेपर मैं दिवोदाससे काशीका राज्य ले लूँगा। इसमें कोई संशय नहीं है। हे भद्रे! भगवान् सदाशिवसे आज्ञा प्राप्तकर उन सभी भैरवोंने शीघ्र ही काशीके लिये प्रस्थान किया। वाराणसीका दर्शनकर, स्नान करनेके अनन्तर वे विश्राम करने लगे ॥ २३-२४ ॥ उन काशीराज दिवोदासका कोई भी पापकर्म न देखकर वे अष्ट भैरव वहीं काशीमें निवास करने लगे। उन भैरवोंके वहाँसे वापस न आनेपर शिवजी अत्यन्त चिन्तित हो उठे ॥ २५ ॥ तदनन्तर भगवान् शिवने उन राजा दिवोदासके छिद्रोंको देखनेके लिये द्वादश आदित्योंको काशीमें भेजा, किंतु वे भी राजा दिवोदासके पुण्यकर्मोंको देखकर अत्यन्त आनन्दित हो काशीमें ही स्थित हो गये। वे द्वादश आदित्य कहने लगे—'हमने भगवान् शिवका कार्य तो किया नहीं और यह पुरी भी त्याज्य नहीं है।' तदनन्तर भगवान् शिवने चौंसठ योगिनियोंको राजाका छिद्र ज्ञात करनेके लिये काशीपुरीमें प्रेषित किया ॥ २६-२७ ॥ उन योगिनियोंने [जब] दिवोदासका अणुमात्र भी दोष नहीं देखा तो वे भी उन अविनाशी महेश्वरका यजन-पूजन करते हुए वहीं वाराणसीपुरीमें निवास करने लगीं। तदनन्तर महेश्वरने दुःखका विनाश करनेवाली भगवती दुर्गाको काशी भेजा, किंतु राजाका कोई भी पाप न देखकर वे दुर्गाजी भी काशी ग्राम (पुरी)-से बाहर स्थित हो गयीं। उन्होंने ध्यानयोगके द्वारा भगवान् शिवको प्रसन्न किया और सम्पूर्ण अभिलाषाओंको पूर्णकर मानवोंको सन्तुष्ट किया ॥ २८-२९१/२ ॥ इसके पश्चात् भगवान् शम्भुने शीघ्र ही आठों दिक्पालोंको काशी भेजा, वाराणसीमें गये हुए उन दिक्पालोंने भी राजा दिवोदासके रंचमात्र भी पापकर्मको
[दायाँ स्तम्भ] नहीं देखा। तब वे आठों दिक्पाल अपने-अपने नामसे वहाँ लिंग स्थापितकर प्रसन्नतापूर्वक वहीं काशीमें निवास करने लगे ॥ ३०-३११/२ ॥ तदनन्तर शंकरजीने अत्यन्त उत्सुकतापूर्वक ऋषियोंको वहाँ भेजा। भगवान् शिवके द्वारा विशेष रूपसे प्रेरित किये जानेपर वे प्रसन्न मनसे त्वरापूर्वक वहाँ गये ॥ ३२ ॥ वाराणसीमें जाकर वे तीर्थस्नान आदिकी विधि सम्पन्न करके राजा दिवोदासको आशीर्वाद देनेके लिये उनके पास जा-जाकर उनकी चेष्टाओंको ध्यानसे देखने लगे। राजा दिवोदासने भक्तिपूर्वक उन सभीको धन तथा वस्त्र आदि प्रदानकर पूजा की, किंतु उन्होंने उस धनको राजप्रतिग्रह समझकर ग्रहण नहीं किया। परंतु ऋषियोंको भी राजा दिवोदासमें स्वल्प भी दोष दिखायी नहीं दिया ॥ ३३-३४ ॥ वे ऋषिगण भी वहाँ काशीमें अपने-अपने नामसे शिवलिंग स्थापित करके परम तप करने लगे। तदनन्तर शिवजीने अपने कार्यको सिद्ध करनेके लिये सभी देवताओंको काशी भेजा ॥ ३५ ॥ उन्होंने भी धर्माचरण करनेवाले उन दिवोदासका कोई भी दुष्कर्म नहीं देखा। जब वे देवता भी नहीं लौटे तो भगवान् शिव सोचने लगे कि जिस-जिसको भी मैंने काशी भेजा, वहाँसे कोई भी लौटकर नहीं आया ॥ ३६ ॥ तब चिन्तापरायण भगवान् रुद्र कुछ भी निश्चय नहीं कर सके। वे मन-ही-मन सोचने लगे कि कब मैं उस काशीपुरीको देखूँगा ॥ ३७ ॥ राजा दिवोदासके राज्यमें जब कोई पापकर्म होगा, तभी मेरे द्वारा काशीमें जाना होगा, ऐसा न होनेपर मुझे काशी कभी प्राप्त नहीं हो सकेगी ॥ ३८ ॥ ढुण्डिराज तथा माधवको छोड़कर सभी देवता विफल हो गये हैं। वे देवता वापस नहीं लौट रहे हैं और ध्यानपरायण होकर वहीं स्थित हो गये हैं ॥ ३९ ॥
[अन्तिम पंक्ति] ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें दिवोदासके उपाख्यानमें पैंतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४५ ॥
छियालीसवाँ अध्याय
क्री०ख०-अ०४६ ] * भगवान् शिवद्वारा ढुण्ढिराज गणेशसे काशी जानेकी प्रार्थना करना * ३७९ छियालीसवाँ अध्याय भगवान् शिवद्वारा ढुण्ढिराज गणेशसे काशी जानेकी प्रार्थना करना, ढुण्ढिराजका एक मायावी ज्योतिषीके रूपमें काशी जाना तथा वहाँके स्त्री-पुरुषों एवं राजा दिवोदासको भी अपनी भविष्यवाणियोंसे मोहित करना मुनि गृत्समद बोले—अविमुक्तक्षेत्र काशीके वियोगसे अत्यन्त सन्तप्त भगवान् शिवने सब प्रकारके अर्थोंका अन्वेषण करनेवाले ढुण्ढिराजको प्रणाम करके बड़े ही कातरभावसे उनसे प्रार्थना की ॥ १ ॥ भगवान् शिव बोले—[हे ढुण्ढे!] आप पृथ्वी, जल, तेज आदि पाँच महाभूतोंके कारणोंके भी कारण हैं। आप चिदानन्दघन, विश्वके द्वारा ध्येय तथा वेदान्तके द्वारा गोचर होनेवाले हैं। आप ही प्रधान (प्रकृति) भी हैं और आप ही पुरुष भी हैं। सत्त्वादि तीनों गुणोंमें विभाग करनेवाले आप ही हैं। आप समस्त विश्वमें व्याप्त रहनेवाले हैं, आप ही विश्वके निधि तथा विश्वकी रक्षा करनेमें तत्पर रहते हैं॥ २-३॥ आप नाना प्रकारके अवतार धारण करते हैं और पृथ्वीके भारको हलका करनेके लिये उद्यत रहते हैं। आप देवताओंकी रक्षा, दैत्योंके निधन तथा द्विजों, धर्मों, दुखिजनों और शरणागतोंकी रक्षा करनेमें समर्थ हैं। ब्रह्मस्वरूप आपने अपनी इच्छासे ही मेरी पुत्रताको स्वीकार किया है। फिर आपको छोड़कर काशीके विरहसे दुखित मैं अन्य किसकी शरणमें जाऊँ ? ॥ ४-५ १/२ ॥ ढुण्ढिराज बोले—हे सदाशिव ! आप सर्वविद्या- विशारद देवादिको ही वहाँ क्यों भेजते हैं? आप तो सर्वदर्शी हैं, फिर भी आप मोहको प्राप्त हो रहे हैं! ॥ ६ १/२ ॥ शिव बोले—हे गजानन ! राजा दिवोदासके कार्योंमें विघ्न उपस्थित करनेके लिये तथा मेरे कार्यकी सिद्धिके लिये आप इसी समय अविमुक्तक्षेत्र काशीमें जायें और वहाँ जाकर लोगोंको मोहित करें, जिससे राजाका पुण्य क्षीण हो जाय ॥ ७-८ ॥ ढुण्ढि बोले—हे महादेव ! मैं शीघ्र ही जाता हूँ, आप चिन्ता न करें। मैं आपका कार्य सिद्ध करूँगा। काशीनिवासी जनोंके पापके भागी बने राजा दिवोदासको मैं काशीसे बाहर करूँगा, जिससे आप शीघ्र ही अपनी पुरीका दर्शन कर सकेंगे ॥ ९ १/२ ॥ मुनि गृत्समद बोले—इस प्रकार कह करके सम्पूर्ण विद्याओं तथा कलाओंके निधान, विभु, ढुण्ढिराज गजाननने भगवान् शिव, पार्वती, कार्तिकेय, देवर्षि नारद तथा गुरुको प्रणाम करके और उनकी प्रदक्षिणा करके काशीके लिये प्रस्थान किया ॥ १०-११ ॥ वाराणसी पहुँचकर ढुण्ढिराजने सर्वत्र दिवोदासका पुण्य ही. देखा। तब उनका कोई भी पाप न देखकर उन्होंने शीघ्र ही एक ज्योतिषीका रूप धारण कर लिया। उस समय उनकी कान्ति चमकते हुए स्वर्णकी भाँति थी। देह अत्यन्त दिव्य थी। वे मोतियोंकी मालाओंसे विभूषित थे। उन्होंने नाभिमें महान् रत्नोंसे सुशोभित करधनी पहनी हुई थी ॥ १२-१३ ॥ उन्होंने पीले वस्त्रोंका परिधान धारण कर रखा था। शरीरपर दिव्य गन्धोंका अनुलेपन किया हुआ था। उनका शरीर कामदेवसे भी अधिक सुन्दर था और वे कामिनियोंको मोहित करनेवाले थे ॥ १४ ॥ वहाँ जो पतिव्रता स्त्रियाँ थीं, वे भी उन ज्योतिर्विद् द्विजके प्रति आकृष्ट हो गयी थीं। ज्योतिर्विद् बने वे ढुण्ढिराज सबके द्वारा मनमें चिन्तित बातको बतला देते थे। अतएव पतिव्रता स्त्रियाँ अपने बालकों, पतियों, भाइयों तथा अन्य सुहृज्जनोंको छोड़कर [अकेले ही] अपना प्रश्न पूछनेके लिये उनके समीपमें आयीं ॥ १५-१६ ॥ वे लोगोंको अपनी मायाके प्रभावसे स्वप्न दिखलाते थे और फिर उनका उत्तर भी बतला देते थे। वे अपनी सेवा करनेवाले जनोंको बहुत-से उत्तम वर प्रदान कर देते थे। उनके वरदानके प्रभावसे असाध्य कुष्ठ भी नष्ट हो जाता था और पूर्णरूपसे वन्ध्या स्त्रियाँ भी वरकी