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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 373, कुल 656 में से

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पृष्ठ 373

क्री०ख०-अ०४२ ] * दैत्य दुरासदद्वारा पुनः विनायकसे युद्ध * ३७१

[बायाँ स्तम्भ] पर्वतास्त्रको प्रकट किया। सर्वत्र पर्वत-ही-पर्वत हो गये, जिससे उस मारुतास्त्रकी गति कुण्ठित हो गयी। मारुतास्त्रके विलीन हो जानेपर उस दुरासदने रौद्रास्त्रको उत्पन्न किया॥ ६-७॥ उस रौद्रास्त्रके छोड़े जानेपर वक्रतुण्ड गणेशजीने भी उसको निवारित करनेके लिये ब्रह्मास्त्रको प्रकट किया। उससे दुरासदकी सेना भस्म हो गयी ॥ ८॥ वे दोनों अस्त्र-रौद्रास्त्र और ब्रह्मास्त्र बहुत दिनोंतक परस्पर युद्ध करते रहे। उनके परस्पर संघातसे उत्पन्न अग्नि पृथ्वीपर गिरने लगी ॥ ९ ॥ [हे शुभे!] उस अग्निसे लोगोंको जलता हुआ जानकर ब्रह्मा तथा शिवजीने उन दोनों अस्त्रोंको रोका। तब वह दैत्य विनायकको अपनेसे अधिक उत्कृष्ट पराक्रमी जानकर अपने अमात्योंसे बोला- ॥ १० ॥ आप सभी लोग उस विनायकसे युद्ध करें, मैं भोजन करके पुनः युद्ध करूँगा। तब सभी सैनिकोंसहित अमात्यगण उन विनायकसे युद्ध करने लगे ॥ ११ ॥ उस समय विनायक अकेले होनेके कारण चिन्तित हो गये। तब उन्होंने अपने तेजसे छप्पन विनायकमूर्तियोंको प्रकट किया। वे सभी विनायक विविध प्रकारके अलंकारोंसे समन्वित थे, विविध प्रकारकी मालाओंसे सुशोभित थे। उन सभी ने दिव्य बाजूबन्द धारण कर रखे थे और सभी चन्द्रमाको अपने मस्तकपर आभूषणके रूपमें धारण किये हुए थे ॥ १२-१३॥ उनमें कोई चार भुजावाले थे, कोई छः भुजावाले और कोई दस भुजावाले थे। कोई सिंहके ऊपर विराजमान थे, कोई मयूरके ऊपर आरूढ़ थे, तो कोई मूषकपर सवार थे। वे सभी शत्रुओंके सैनिकोंको विदारित करते हुए युद्ध करने लगे। उन्होंने कुछ दैत्योंके पाँव तोड़ डाले, तो किसीके मस्तकोंको फोड़ डाला ॥ १४-१५॥ कुछके बाहुओंको छिन्न-भिन्न कर डाला और किसीके जानु, जंघा तथा उदरदेशको तोड़-मरोड़ दिया। वे हुंकार करते हुए गरज रहे थे। कुछ दैत्य उनकी शरणमें आ गये ॥ १६॥ कुछ दैत्य अपने प्राणोंकी रक्षा करनेके लिये वहाँसे

[दायाँ स्तम्भ] भागने लगे। कुछ दैत्य प्रहार करते हुए युद्धके आमने- सामने मृत्युको प्राप्त हो गये ॥ १७ ॥ युद्धमें वीरगतिको प्राप्त हुए वे स्वर्गलोकमें गये और वहाँ विविध भोगों तथा अप्सराओंके साथ आनन्द मनाने लगे। अनेकों घोड़े, रथ, हाथी, खच्चर तथा ऊँट विविध प्रकारके शस्त्रोंके द्वारा आहत होनेपर शरीरके कट जानेसे भूमिपर गिर पड़े और उनके प्राण निकल गये। वहाँ रक्तकी नदियाँ प्रवाहित हो चलीं। जो केशरूपी सेवारसे सुशोभित हो रही थीं ॥ १८-१९ ॥ छुरी और खड्ग उन रक्तरूपा नदियोंके मत्स्य थे, हाथी मगरमच्छ थे तथा ढालें ही कच्छपरूप थीं। दैत्य सैनिकोंके धड़ ही कमलरूप थे, सैनिकोंकी चर्बी ही नदीका फेन और मेद ही कीचड़रूप था ॥ २० ॥ धनुष [उन रक्तसरिताओंके] सर्प थे, हड्डियाँ बगुले थे, कवच एवं युद्धपरिधान बड़े-बड़े मेढक थे और भाले ही [पानीके साथ बहनेवाले] काष्ठखण्ड थे। [इन सभी विशेषताओंसे युक्त] तथा मनस्वीजनोंको हर्षित करनेवाली वे [रक्तसरिताएँ] शोभायमान हो रही थीं। भोजन कर लेनेके अनन्तर वहाँ आकर उसने जब रणांगणको देखा तो सारी सेनाके मारे जानेसे वह दैत्य दुरासद अत्यन्त दुखित हो उठा ॥ २१-२२ ॥ उस समय वह शूलपाणि भगवान् शंकरद्वारा वरदानके समय दिये गये उस वचनको याद करने लगा, जिसमें कहा गया था कि शक्तिसे उत्पन्न कोई देवता ही तुमपर विजय प्राप्त करेगा। क्या यही बालक शक्तिसे उत्पन्न तो नहीं है? क्योंकि इसमें तीनों लोकोंका सारभूत बल दिखायी देता है ॥ २३-२४ ॥ काल भी इसपर विजय प्राप्त करनेमें समर्थ नहीं है, फिर अन्य दूसरेकी क्या बात है! ऐसा मनमें विचारकर वह अकेला पड़ जानेके कारण भाग उठा ॥ २५ ॥ वक्रतुण्ड गणेशजीने उस समय विचार किया कि भागते हुए शत्रुको मारना नहीं चाहिये। [वैसे तो] देवताओंके द्वारा भी यह मारे जा सकनेयोग्य नहीं है, जैसा कि शंकरजीने कहा है- ॥ २६ ॥ अतः अब मैं अपने योगबलसे उत्तम विराट् रूप