श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 372, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें३७० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- वे दोनों बार-बार महान् गर्जना करते हुए उछल- उछलकर बारी-बारीसे एक-दूसरेके शरीरपर गिर रहे थे और एड़ियोंके प्रहारसे तथा कोहनियोंके आघातसे एक- दूसरेपर वार कर रहे थे॥ २६-२७॥ वे दोनों अपनी जाँघों, घुटनों तथा कन्धोंसे परस्पर आघात कर रहे थे। युद्ध करते हुए वे धरतीपर लुढ़क रहे थे और बहुत अधिक धूलिधूसरित हो गये थे॥ २८॥ जब वे दोनों दूसरेपर विजय प्राप्त कर लेते थे तो 'बहुत अच्छा, बहुत अच्छा'- इस प्रकारसे चिल्ला उठते थे। इस प्रकार बहुत दिनोंतक होनेवाले उनके युद्धको देखकर देवता अत्यन्त विस्मित हो उठे॥ २९॥ वे इस दैत्य दुरासदके सामर्थ्यको देखकर मनमें बहुत लज्जित हो रहे थे। तदनन्तर देव विनायकने उसके ललाटपर अपनी मुट्ठीसे प्रबल आघात किया॥ ३०॥ इस प्रहारसे वह भूमिपर गिर पड़ा और उसका मुख फूट गया। दो मुहूर्ततक वह उसी प्रकार अचल होकर भूमिपर गिरा रहा, जैसे कि वज्रके प्रहारसे पर्वत गिरकर अचल पड़ा रहता है। दीर्घकालीन मूर्च्छाको छोड़कर किसी प्रकार वह उठ तो खड़ा हुआ, किंतु अपनेको वह असमर्थ मानने लगा। वह बहुत व्याकुल हो चुका था॥ ३१-३२॥ तदनन्तर सायंकाल होनेपर वह दैत्य दुरासद अपनी सेनाके बीच चला आया और वे विनायक भी युद्धभूमिसे हर्षपूर्वक अपने स्थानको लौट गये। जो व्यक्ति युद्धकाल उपस्थित होनेपर विनायकदेव और दुरासदके बीच हुए युद्धके इस वृत्तान्तका श्रवण करता है, वह निश्चित ही विजय प्राप्त कर लेता है, जिस प्रकार कि विनायकने विजय प्राप्त की॥ ३३-३४॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'द्वन्द्वयुद्धका वर्णन' नामक इकतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ४१॥ बयालीसवाँ अध्याय दैत्य दुरासदद्वारा पुनः विनायकसे युद्ध, विनायकद्वारा अपने तेजसे छप्पन विनायकोंको प्रकट करना, विनायकोंद्वारा सम्पूर्ण सेनाके मारे जानेपर दुरासदद्वारा भगवान् शंकरसे प्राप्त वरदानका स्मरण करना, विनायकद्वारा योगबलसे विराट् रूप धारणकर एक पैर काशीमें तथा दूसरा पैर दुरासदके सिरपर रखकर उसे काशीके द्वारके रूपमें काशीमें प्रतिष्ठित करना और स्वयं भी 'एकपाद विनायक'के नामसे काशीमें स्थित होना गृत्समद बोले- उन वक्रतुण्ड भगवान् गजाननके पराक्रमको जानकर धैर्य धारणकर वह दैत्यराज दुरासद अस्त्रोंको लेकर पुनः युद्धके लिये आया॥ १॥ भगवान् शिवका स्मरण करके तथा बड़े ही आदरपूर्वक अग्निदेवके मन्त्रका उच्चारणकर और उस मन्त्रसे बाणको अभिमन्त्रित करके उसने विनायकपर वह आग्नेयास्त्र छोड़ा॥ २॥ प्रज्वलित अग्निकी उस ज्वालासे भयभीत होकर सभी देवता देव विनायकके पीछे छिप गये। तब सर्वज्ञ विनायकने पर्जन्यास्त्रको छोड़ा॥ ३॥ उस पर्जन्यास्त्रके द्वारा क्षणभरमें हाथीकी सूँड़के समान मोटी जलकी धारा प्रवाहित हो गयी। फलतः वह अग्नि क्षणभरमें शान्त हो गयी। यह देखकर वह दैत्य दुरासद अत्यन्त क्रुद्ध हो उठा॥ ४॥ तब उसने जलवृष्टिको रोकनेके लिये अत्यन्त वेगशाली मारुतास्त्रको छोड़ा। उस वेगयुक्त वायुके कारण पृथ्वी कम्पायमान हो उठी। वृक्ष तथा पर्वत भूमिपर गिरने लगे॥ ५॥ उस मारुतास्त्रके प्रभावसे महामेघ भी आधे क्षणमें विनष्ट हो गये। तब विनायकदेवने अपने मनोबलसे