भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 371, कुल 656 में से

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पृष्ठ 371

क्री०ख०-अ०४१ ] * विनायकदेव और दैत्य दुरासदका युद्ध * ३६९ ब्रह्माजी बोले—विघ्नेश्वर विनायकके द्वारा ऐसा कहे जानेपर सभी देवता पुनः प्रणाम करके और स्तुति करके उन जगत्के कारणके भी परम कारणस्वरूप गणेशजीसे कहने लगे—जो व्यक्ति भूमिके रजकणोंकी गिनती कर सके, आकाशस्थित नक्षत्रों एवं तारागणोंकी गणना कर सके और जो सागरके जलको माप सके, वही आपके गुणोंको जान सकता है॥४-५॥ हे विभो ! आज देवताओंके नेत्रोंका होना धन्य हो गया, जो कि उनके द्वारा आपके युगलचरणोंका दर्शन हुआ है। आज हमारा दुःख समाप्त हो गया और हमने अपना-अपना पद भी प्राप्त कर लिया॥ ६॥ हे अखिलेश्वर ! इस दुरासदका वध करें और पृथ्वीके भारका हरण करें। देवताओंका इस प्रकारका वचन सुनकर वे विनायक हँसने लगे ॥७॥ अपने दस हाथोंमें दस आयुध धारण करनेवाले प्रभु विनायक कहने लगे—'सब कुछ करूँगा।' हर्षित होकर गद्गद वाणीमें इस प्रकार देवताओंसे कहकर भगवान् गणेश सिंहपर आरूढ़ होकर शीघ्र ही वाराणसीपुरीकी ओर चल पड़े। भगवान् शिव, पार्वती तथा सभी देवता भी उनके पीछे-पीछे गये ॥ ८-९ ॥ देवसेनासहित विनायकको वहाँ आया हुआ जानकर वीर दुरासद दैत्य नगरसे बाहर चला आया ॥ १० ॥ उस दैत्य दुरासदकी मन्त्रियोंसहित, नाना प्रकारके आयुधोंसे सुसज्जित, बादलोंके समान बार-बार गर्जन करती हुई विशाल सुदृढ़ सेनाको देखकर विनायकने सभी कन्दराओंको विदीर्ण करनेवाला उच्च स्वरयुक्त गर्जन किया और वे उस महादैत्यसे बोले-अरे दैत्य ! अब भी तुम क्यों भ्रममें पड़े हो ? ॥ ११-१२॥ तुमने बलपूर्वक देवताओं तथा राजाओंपर विजय प्राप्त की है, सभी मुनियोंको अपमानित किया है, अरे दुष्ट ! उस समय मैं नहीं था ॥ १३ ॥ पूर्वमें तुमने निर्भय होकर बहुतसे दोष-पापोंका संचय किया हुआ है, अब उन सभीका फल इस समय तुम मुझ गणेशसे प्राप्त करो। तुमने तीनों लोकोंमें रहनेवाले समस्त प्राणियोंको बहुत कष्ट पहुँचाया है, मैं उन्हींको सुख पहुँचानेके लिये तथा तुम्हारे भारसे पीड़ित पृथ्वीका उद्धार करनेके लिये प्रकट हुआ हूँ॥ १४-१५ ॥ अरे दुष्ट ! तुम मान-सम्मान तथा दुस्त्याज्य लज्जाको छोड़कर मेरी शरणमें आ जाओ, यदि तुम युद्धस्थलमें जाना चाहो, तो इस समय मृत्युको प्राप्त होओगे ॥ १६ ॥ भगवान् शिवसे प्राप्त वरदानके प्रभावसे तुमने सम्पूर्ण त्रिलोकीको पीड़ित किया है। उस दुष्ट बुद्धिवाले दैत्य दुरासदसे इस प्रकार कहकर युद्धोद्यत भगवान् गणेशने अत्यन्त क्षुब्ध होकर प्रलयाग्निके समान दीप्तिमान् और अग्निकी ज्वालामालाओंसे सुशोभित अपने परशु नामक अस्त्रको उठाया। उस परशुकी प्रभासे भगवान् सूर्य भी आच्छादित हो गये ॥ १७-१८ ॥ तदनन्तर उन्होंने यमराजके समान होकर बड़े ही वेगसे उस परशुसे उसके वक्षःस्थलपर प्रहार किया। उस परशुसे आहत होनेपर भी उसका एक रोमतक नहीं हिला। क्रोधसे आँखें लाल करता हुआ तथा तीनों लोकोंको मानो ग्रस लेता हुआ वह दैत्य दुरासद उन गणेशसे कहने लगा। न तो देवता, न देवराज इन्द्र और न दिक्पाल ही मेरे समक्ष युद्धके लिये आये, फिर तुम बालभावसे किस प्रकार मेरे सम्मुख आये हो ? तुम मेरे सामनेसे हट जाओ ॥ १९-२१ ॥ अरे मूर्ख ! मैं यमराजसे भी नहीं डरता हूँ, फिर तुम क्यों मरनेकी इच्छा करते हो? ऐसा कहकर उस दुरासदने म्यानसे छूरेके समान तीक्ष्ण धारवाली तथा अत्यन्त दीप्तिमान् तलवार निकाली, जिसके आघातसे पर्वत भी चूर-चूर हो जाते थे, उस तलवारसे दुरासदने गणेशजीपर आघात किया, किंतु उन्होंने अपने अंकुशसे उसे रोक दिया ॥ २२-२३ ॥ वह तलवार परशुकी चोटसे सौ भागोंमें टूटकर नीचे गिर पड़ी। तलवारके टूट जानेपर महाबली दैत्य दुरासद मल्लयुद्धके लिये आया। तब देव विनायक भी आयुधोंसे युद्ध करना छोड़कर उसीके समान वेगसे उसके समक्ष आये। तब उन दोनोंमें रोमांचकारी भीषण युद्ध हुआ ॥ २४-२५ ॥ बाहुओंसे, कोहनियोंसे तथा मुष्टियोंसे वे एक- दूसरेपर आघात करने लगे, साथ ही पैरोंसे, जानुओंसे, जंघाओंसे तथा पीठसे एक-दूसरेको चोट पहुँचाने लगे।