भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 374, कुल 656 में से

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पृष्ठ 374

३७२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- धारण करूँगा। तब विराट् स्वरूपधारी उन विनायकने | प्रकार दैत्य दुरासदपर विजय प्राप्त करके देव विनायकने अपने एक हाथसे उस दुरासदको पकड़ लिया ॥ २७ ॥ | समस्त जगत्को आनन्दित कर दिया ॥ ३२ ॥ वे एक पैरसे काशीमें स्थित हुए ताकि बलपूर्वक | उन वक्रतुण्ड विनायकपर पुष्पोंकी वर्षा करके उन्हें उस नगरीकी रक्षा कर सकें और दूसरा पैर उन्होंने उस | प्रणाम करके और उनका भलीभाँति पूजन करके सभी दैत्यके सिरपर रखा। विनायक उस दैत्यसे बोले—अरे | देवता अपने-अपने स्थानोंको गये और मुनिगण भी दैत्य! भगवान् शिवके वरदानके प्रभावसे तुम्हारी मृत्यु | अपने-अपने आश्रमोंकी ओर चले गये ॥ ३३ ॥ नहीं हो रही है, अतः तुम इस काशीनगरीमें पर्वतके | अन्य जो-जो भी मनुष्य उन विनायककी पूजा करते समान निश्चल होकर रहो ॥ २८-२९ ॥ | हैं, उनकी समस्त कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं। इस प्रकार तुम इस नगरीके द्वारके समान बनकर स्थित रहो, | काशीमें विनायकदेव छप्पन मूर्तियोंसे युक्त विख्यात हुए। ताकि यहाँ आनेवालोंकी दृष्टि सबसे पहले तुमपर ही पड़े। | वे विनायक अपने विराट् रूपको अन्तर्धान करके तुण्डन तुम यहाँ दुष्टजनोंको निरन्तर पीड़ा पहुँचाते रहो। तुम्हें | नामक पुरमें भी 'एकपाद विनायक' नामसे स्थित हुए और मेरी नित्य सन्निधि प्राप्त होगी। उस दैत्य दुरासदने भी | वहाँ वे सभीकी कामनाएँ पूर्ण करते हैं ॥ ३४-३५ ॥ परम भक्तिभावपूर्वक उसी वरकी याचना की ॥ ३०१/२ ॥ | जो भक्तिमान् पुरुष इस श्रेष्ठ आख्यानका श्रवण दैत्य दुरासद बोला— [हे विनायक !] आप इसी | करता है, वह अपनी सभी मनोकामनाओंको प्राप्त कर प्रकारसे मेरे मस्तकपर पैर रखकर सदा स्थित रहें ॥ ३१ ॥ | लेता है और अन्तमें गणेशजीके धामको प्राप्त होता है। मुनि बोले—उस दैत्यसे 'ऐसा ही होगा' इस | वह सर्वत्र विजय प्राप्त करता है और पुष्टि तथा आरोग्य प्रकार कहकर विनायक काशीमें स्थित हो गये। इस | प्राप्त करता है ॥ ३६ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'दुरासदपर विजयका वर्णन' नामक बयालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४२ ॥ तैंतालीसवाँ अध्याय देवताओं तथा मुनियोंद्वारा ढुण्ढिराज गणेश तथा छप्पन विनायकोंकी स्तुति तथा पूजाका वर्णन गृत्समद बोले—गणेशजीद्वारा उस दैत्य दुरासदपर | भी आप ही हैं ॥ ४ ॥ विजय प्राप्त कर लेनेके अनन्तर आठों दिक्पाल, | आप नाना प्रकारके अर्थोंकी गवेषणा करते हैं और मुनिगण, चन्द्रमा, सूर्य, देवगुरु बृहस्पति तथा शुक्राचार्य— | प्राणियोंको उन-उन कर्मोंमें नियुक्त करते हैं। मनीषियोंके ये सभी दुरासदके शत्रु प्रभु देवाधिदेव विनायककी | द्वारा ढुण्ढि (ढुन्ध्) धातुका प्रयोग गवेषण अर्थमें किया महिमाका इस प्रकार गान करने लगे— [हे प्रभो!] | गया है। इसलिये आपकी 'ढुण्ढि' यह संज्ञा है और आपने दैत्य दुरासदका दमन करके श्रुति-स्मृतिविहित | ढुण्ढिके अनन्तर 'राज' पदके प्रयोगसे आपको 'ढुण्ढिराज' मार्गकी स्थापना की है। दुरासदको पराजित करनेमें सब | कहा जाता है ॥ ५१/२ ॥ प्रकारसे अशक्त हम देवताओंको अपने अपने-अपने | आपका दर्शन, पूजा, ध्यान तथा स्मरण धर्म-अर्थ- पदपर प्रतिष्ठित किया है। आप ही इस विश्वकी सर्जना | काम तथा मोक्ष इस चतुर्विध पुरुषार्थका साधन है और करते हैं और आप ही कर्मफलोंको प्रदान करनेवाले | पुत्र-पौत्रको प्रदान करनेवाला है ॥ ६१/२ ॥ हैं ॥ १–३॥ | ऐसा कहकर उन सभी देवता आदिने मन्दार पुष्पों, आप समस्त प्राणियोंमें समान दृष्टि रखते हैं। आप | शमीपत्रों, हरित वर्णके दूर्वांकुरों तथा श्वेत पुष्पों और कर्मोंमें लिप्त नहीं होते। ब्राह्मण-क्षत्रिय आदि चारों वर्ण | नाना प्रकारके पक्वान्नोंके नैवेद्यों और बहुत प्रकारके आपके ही आश्रयमें रहते हैं और सभी प्राणियोंके आधार | फलोंके द्वारा उन ढुण्ढिराजका पूजन किया ॥ ७-८ ॥

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