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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 379, कुल 656 में से

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पृष्ठ 379

क्री०ख०-अ०४५ ] * शंकरजीका सभी देवताओंको लेकर मन्दरगिरिपर जाना * ३७७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ] होना बन्द हो गया। तब उस समय ब्रह्माजीके वचनोंसे प्रेरित होकर देवताओंने भगवान् शंकरकी प्रार्थना की ॥ २-३ ॥ देवता बोले—हे महादेव ! हे जगन्नाथ ! हे करुणानिधान ! हे शंकर ! महर्षि मरीचि मन्दराचलपर स्थित होकर दस वर्षोंसे तपस्या कर रहे हैं। हे देव ! आप उन्हें वर प्रदान करनेके लिये वहाँ जायें ॥ ४१/२ ॥ मुनि गृत्समद बोले— [हे कीर्ते !] इस प्रकारसे देवताओंद्वारा प्रार्थना किये गये करुणासागर भगवान् महेश्वर अग्नि, चन्द्रमा, अर्यमा (सूर्य), आदि सभी देवताओंके साथ उन महामुनि मरीचीजीको वर प्रदान करनेके लिये मन्दरगिरिपर गये ॥ ५-६ ॥ भगवान् शिवने देखा कि वे अस्थिमात्र शेष रह गये हैं, कदाचित् वे उस समय वहाँ न पहुँचते तो महर्षि मरीचि अपने प्राणोंका परित्याग कर देते ॥ ७ ॥ उनके उत्कट तपसे पार्वतीपति भगवान् शंकर अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्होंने अपना पद प्रदान किया तथा विमानमें बैठकर वाद्योंकी ध्वनि करते हुए अपने गणोंके साथ शीघ्र ही अपने लोकमें पहुँचाया। तभीसे सभी देवगणोंके साथ भगवान् शम्भु अत्यन्त कल्याणकारी पर्वतश्रेष्ठ मन्दराचलमें रहने लगे ॥ ८-९ ॥ जब भगवान् सदाशिवने राजा दिवोदासमें कोई भी दोष नहीं देखा तो उन्होंने बड़ी ही उत्सुकतापूर्वक उनके दोषोंको देखनेके लिये देवताओंको वाराणसी पुरीमें भेजा। जो-जो देवता काशी जाते और राजा दिवोदासमें कोई भी दोष नहीं देख पाते, तो वे अपने नामसे वहाँ काशीमें शिवलिंग स्थापित करके वहीं स्थित हो जाते ॥ १०-११ ॥ राजा दिवोदासके राज्यमें ब्राह्मण आदि सभी चारों वर्णोंके लोग अपने-अपने वर्ण एवं आश्रम-धर्मोंका परिपालन करते थे। सभी द्विजाति अपने आश्रममें स्थित होकर शास्त्रोंमें बताये गये आचारका पालन करते थे। शिष्य गुरुजनोंकी सेवा करते थे, स्त्रियाँ पतिव्रताएँ थीं और [सम्पूर्ण प्रजा] धर्माचरण करनेवाली, दानपरायण और व्रत-उपवास आदिके नियमोंका पालन करनेमें तत्पर

[दायाँ स्तम्भ] रहती थी ॥ १२-१३ ॥ संन्यासी तीनों समय (प्रातः, मध्याह्न तथा सायं) स्नानादि [संन्यासोचित] आचारोंका पालन करते थे, वानप्रस्थाश्रमी होम, मौनादिका आचरण करनेवाले थे। सभी गृहस्थाश्रम-धर्मका पालन करनेवाले, स्नान, सन्ध्या, जप, होम, स्वाध्याय, देवपूजन, अतिथिसत्कार, बलिवैश्वदेव—इन आठ कर्मोंको निष्पाप रहकर बड़े ही श्रद्धा-भक्तिपूर्वक स्वयं ही करते थे ॥ १४-१५ ॥ इसी कारण वहाँ धर्मकी बड़ी वृद्धि हुई और उत्तम वृष्टि हुई। उस समय स्वर्गस्थित देवता अत्यन्त आनन्दित रहते थे और पितरोंको स्वधाकार (श्राद्ध-तर्पण आदि) प्राप्त होता था ॥ १६ ॥ उस समय काशीमें न तो कोई स्त्री वन्ध्या थी, न कोई मासिकधर्मसे विहीन, न कोई स्त्री विधवा थी और न कोई स्त्री ऐसी थी, जिसके बच्चे पैदा होते ही मर जाते हों। न तो अवर्षण होता था, न अतिवृष्टि होती थी, न तो कोई राजद्रोह था और न किसी शत्रुका भय था। तोतों, टिड्डियों तथा चूहोंसे खेतीको कहीं कोई भय नहीं था और भलीभाँति कृषिकी उपज निर्विघ्न सम्पन्न होती थी ॥ १७-१८ ॥ नृपश्रेष्ठ दिवोदास यह डिण्डिम घोष नित्य ही करवाते थे कि जो कोई भी व्यक्ति विश्वेश्वर, विन्दुमाधव, ढुंढिराज गणेश, भैरव, दण्डपाणि, कार्तिकेय, मणिकर्णिका एवं भवानी (अन्नपूर्णा)-का दर्शन किये बिना तथा मणिकर्णिका एवं गंगामें बिना स्नान किये भोजन करेगा, वह निश्चित ही दण्डनीय होगा ॥ १९-२० ॥ ऐसे राजश्रेष्ठ दिवोदासके राज्य करते समय वहाँ लेशमात्र भी पाप नहीं था। बिना किसी दोषके रहते भगवान् सदाशिव उस काशीके राज्यको लेना नहीं चाहते थे। उस समय वाराणसीसे दूर मन्दरगिरिमें रहनेके कारण वहाँ (काशी)-के वियोगसे भगवान् शिव अत्यन्त दुखी हो गये थे। तब उन्होंने विघ्न उपस्थित करनेके लिये आठ भैरवों (असितांग, रुरु, चण्ड, क्रोध, उन्मत्त, कपाल, भीषण और संहारभैरव)-को काशीमें भेजा ॥ २१-२२ ॥