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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 380, कुल 656 में से

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पृष्ठ 380

३७८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-

[बायाँ स्तम्भ] भगवान् शिवने उनसे कहा—आपलोग राजा दिवोदासके राज्य काशीमें अणुमात्र (यत्किंचित्) पाप करायें। ऐसा होनेपर मैं दिवोदाससे काशीका राज्य ले लूँगा। इसमें कोई संशय नहीं है। हे भद्रे! भगवान् सदाशिवसे आज्ञा प्राप्तकर उन सभी भैरवोंने शीघ्र ही काशीके लिये प्रस्थान किया। वाराणसीका दर्शनकर, स्नान करनेके अनन्तर वे विश्राम करने लगे ॥ २३-२४ ॥ उन काशीराज दिवोदासका कोई भी पापकर्म न देखकर वे अष्ट भैरव वहीं काशीमें निवास करने लगे। उन भैरवोंके वहाँसे वापस न आनेपर शिवजी अत्यन्त चिन्तित हो उठे ॥ २५ ॥ तदनन्तर भगवान् शिवने उन राजा दिवोदासके छिद्रोंको देखनेके लिये द्वादश आदित्योंको काशीमें भेजा, किंतु वे भी राजा दिवोदासके पुण्यकर्मोंको देखकर अत्यन्त आनन्दित हो काशीमें ही स्थित हो गये। वे द्वादश आदित्य कहने लगे—'हमने भगवान् शिवका कार्य तो किया नहीं और यह पुरी भी त्याज्य नहीं है।' तदनन्तर भगवान् शिवने चौंसठ योगिनियोंको राजाका छिद्र ज्ञात करनेके लिये काशीपुरीमें प्रेषित किया ॥ २६-२७ ॥ उन योगिनियोंने [जब] दिवोदासका अणुमात्र भी दोष नहीं देखा तो वे भी उन अविनाशी महेश्वरका यजन-पूजन करते हुए वहीं वाराणसीपुरीमें निवास करने लगीं। तदनन्तर महेश्वरने दुःखका विनाश करनेवाली भगवती दुर्गाको काशी भेजा, किंतु राजाका कोई भी पाप न देखकर वे दुर्गाजी भी काशी ग्राम (पुरी)-से बाहर स्थित हो गयीं। उन्होंने ध्यानयोगके द्वारा भगवान् शिवको प्रसन्न किया और सम्पूर्ण अभिलाषाओंको पूर्णकर मानवोंको सन्तुष्ट किया ॥ २८-२९१/२ ॥ इसके पश्चात् भगवान् शम्भुने शीघ्र ही आठों दिक्पालोंको काशी भेजा, वाराणसीमें गये हुए उन दिक्पालोंने भी राजा दिवोदासके रंचमात्र भी पापकर्मको

[दायाँ स्तम्भ] नहीं देखा। तब वे आठों दिक्पाल अपने-अपने नामसे वहाँ लिंग स्थापितकर प्रसन्नतापूर्वक वहीं काशीमें निवास करने लगे ॥ ३०-३११/२ ॥ तदनन्तर शंकरजीने अत्यन्त उत्सुकतापूर्वक ऋषियोंको वहाँ भेजा। भगवान् शिवके द्वारा विशेष रूपसे प्रेरित किये जानेपर वे प्रसन्न मनसे त्वरापूर्वक वहाँ गये ॥ ३२ ॥ वाराणसीमें जाकर वे तीर्थस्नान आदिकी विधि सम्पन्न करके राजा दिवोदासको आशीर्वाद देनेके लिये उनके पास जा-जाकर उनकी चेष्टाओंको ध्यानसे देखने लगे। राजा दिवोदासने भक्तिपूर्वक उन सभीको धन तथा वस्त्र आदि प्रदानकर पूजा की, किंतु उन्होंने उस धनको राजप्रतिग्रह समझकर ग्रहण नहीं किया। परंतु ऋषियोंको भी राजा दिवोदासमें स्वल्प भी दोष दिखायी नहीं दिया ॥ ३३-३४ ॥ वे ऋषिगण भी वहाँ काशीमें अपने-अपने नामसे शिवलिंग स्थापित करके परम तप करने लगे। तदनन्तर शिवजीने अपने कार्यको सिद्ध करनेके लिये सभी देवताओंको काशी भेजा ॥ ३५ ॥ उन्होंने भी धर्माचरण करनेवाले उन दिवोदासका कोई भी दुष्कर्म नहीं देखा। जब वे देवता भी नहीं लौटे तो भगवान् शिव सोचने लगे कि जिस-जिसको भी मैंने काशी भेजा, वहाँसे कोई भी लौटकर नहीं आया ॥ ३६ ॥ तब चिन्तापरायण भगवान् रुद्र कुछ भी निश्चय नहीं कर सके। वे मन-ही-मन सोचने लगे कि कब मैं उस काशीपुरीको देखूँगा ॥ ३७ ॥ राजा दिवोदासके राज्यमें जब कोई पापकर्म होगा, तभी मेरे द्वारा काशीमें जाना होगा, ऐसा न होनेपर मुझे काशी कभी प्राप्त नहीं हो सकेगी ॥ ३८ ॥ ढुण्डिराज तथा माधवको छोड़कर सभी देवता विफल हो गये हैं। वे देवता वापस नहीं लौट रहे हैं और ध्यानपरायण होकर वहीं स्थित हो गये हैं ॥ ३९ ॥

[अन्तिम पंक्ति] ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें दिवोदासके उपाख्यानमें पैंतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४५ ॥