श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 381, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्री०ख०-अ०४६ ] * भगवान् शिवद्वारा ढुण्ढिराज गणेशसे काशी जानेकी प्रार्थना करना * ३७९ छियालीसवाँ अध्याय भगवान् शिवद्वारा ढुण्ढिराज गणेशसे काशी जानेकी प्रार्थना करना, ढुण्ढिराजका एक मायावी ज्योतिषीके रूपमें काशी जाना तथा वहाँके स्त्री-पुरुषों एवं राजा दिवोदासको भी अपनी भविष्यवाणियोंसे मोहित करना मुनि गृत्समद बोले—अविमुक्तक्षेत्र काशीके वियोगसे अत्यन्त सन्तप्त भगवान् शिवने सब प्रकारके अर्थोंका अन्वेषण करनेवाले ढुण्ढिराजको प्रणाम करके बड़े ही कातरभावसे उनसे प्रार्थना की ॥ १ ॥ भगवान् शिव बोले—[हे ढुण्ढे!] आप पृथ्वी, जल, तेज आदि पाँच महाभूतोंके कारणोंके भी कारण हैं। आप चिदानन्दघन, विश्वके द्वारा ध्येय तथा वेदान्तके द्वारा गोचर होनेवाले हैं। आप ही प्रधान (प्रकृति) भी हैं और आप ही पुरुष भी हैं। सत्त्वादि तीनों गुणोंमें विभाग करनेवाले आप ही हैं। आप समस्त विश्वमें व्याप्त रहनेवाले हैं, आप ही विश्वके निधि तथा विश्वकी रक्षा करनेमें तत्पर रहते हैं॥ २-३॥ आप नाना प्रकारके अवतार धारण करते हैं और पृथ्वीके भारको हलका करनेके लिये उद्यत रहते हैं। आप देवताओंकी रक्षा, दैत्योंके निधन तथा द्विजों, धर्मों, दुखिजनों और शरणागतोंकी रक्षा करनेमें समर्थ हैं। ब्रह्मस्वरूप आपने अपनी इच्छासे ही मेरी पुत्रताको स्वीकार किया है। फिर आपको छोड़कर काशीके विरहसे दुखित मैं अन्य किसकी शरणमें जाऊँ ? ॥ ४-५ १/२ ॥ ढुण्ढिराज बोले—हे सदाशिव ! आप सर्वविद्या- विशारद देवादिको ही वहाँ क्यों भेजते हैं? आप तो सर्वदर्शी हैं, फिर भी आप मोहको प्राप्त हो रहे हैं! ॥ ६ १/२ ॥ शिव बोले—हे गजानन ! राजा दिवोदासके कार्योंमें विघ्न उपस्थित करनेके लिये तथा मेरे कार्यकी सिद्धिके लिये आप इसी समय अविमुक्तक्षेत्र काशीमें जायें और वहाँ जाकर लोगोंको मोहित करें, जिससे राजाका पुण्य क्षीण हो जाय ॥ ७-८ ॥ ढुण्ढि बोले—हे महादेव ! मैं शीघ्र ही जाता हूँ, आप चिन्ता न करें। मैं आपका कार्य सिद्ध करूँगा। काशीनिवासी जनोंके पापके भागी बने राजा दिवोदासको मैं काशीसे बाहर करूँगा, जिससे आप शीघ्र ही अपनी पुरीका दर्शन कर सकेंगे ॥ ९ १/२ ॥ मुनि गृत्समद बोले—इस प्रकार कह करके सम्पूर्ण विद्याओं तथा कलाओंके निधान, विभु, ढुण्ढिराज गजाननने भगवान् शिव, पार्वती, कार्तिकेय, देवर्षि नारद तथा गुरुको प्रणाम करके और उनकी प्रदक्षिणा करके काशीके लिये प्रस्थान किया ॥ १०-११ ॥ वाराणसी पहुँचकर ढुण्ढिराजने सर्वत्र दिवोदासका पुण्य ही. देखा। तब उनका कोई भी पाप न देखकर उन्होंने शीघ्र ही एक ज्योतिषीका रूप धारण कर लिया। उस समय उनकी कान्ति चमकते हुए स्वर्णकी भाँति थी। देह अत्यन्त दिव्य थी। वे मोतियोंकी मालाओंसे विभूषित थे। उन्होंने नाभिमें महान् रत्नोंसे सुशोभित करधनी पहनी हुई थी ॥ १२-१३ ॥ उन्होंने पीले वस्त्रोंका परिधान धारण कर रखा था। शरीरपर दिव्य गन्धोंका अनुलेपन किया हुआ था। उनका शरीर कामदेवसे भी अधिक सुन्दर था और वे कामिनियोंको मोहित करनेवाले थे ॥ १४ ॥ वहाँ जो पतिव्रता स्त्रियाँ थीं, वे भी उन ज्योतिर्विद् द्विजके प्रति आकृष्ट हो गयी थीं। ज्योतिर्विद् बने वे ढुण्ढिराज सबके द्वारा मनमें चिन्तित बातको बतला देते थे। अतएव पतिव्रता स्त्रियाँ अपने बालकों, पतियों, भाइयों तथा अन्य सुहृज्जनोंको छोड़कर [अकेले ही] अपना प्रश्न पूछनेके लिये उनके समीपमें आयीं ॥ १५-१६ ॥ वे लोगोंको अपनी मायाके प्रभावसे स्वप्न दिखलाते थे और फिर उनका उत्तर भी बतला देते थे। वे अपनी सेवा करनेवाले जनोंको बहुत-से उत्तम वर प्रदान कर देते थे। उनके वरदानके प्रभावसे असाध्य कुष्ठ भी नष्ट हो जाता था और पूर्णरूपसे वन्ध्या स्त्रियाँ भी वरकी