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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 382, कुल 656 में से

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पृष्ठ 382

३८० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- सामर्थ्यसे पुत्रवती होने लगीं ॥ १७-१८ ॥ हाथ देखकर वे लोगोंके भाग्य तथा उनके कर्मोंको बता देते थे। जिस-जिसके द्वारा जो-जो भी भोजन किया हुआ रहता था और जो-जो वह आगे खायेगा; वह सब वे सही-सही तत्क्षण बता देते थे ॥ १९ ॥ उन्हें देखकर काशीनगरीके सभी लोग आश्चर्य- चकित और अत्यन्त प्रसन्नतासे भरे हुए थे। वे परस्पर यह कहते थे कि इस प्रकारका ब्राह्मण हमने नहीं देखा, जो कि सब कुछ जाननेवाला हो और गुणोंका खजाना हो। लोग उनके विषयमें यह कहते थे कि ऐसा व्यक्ति न कोई पहले हुआ और न कोई भविष्यमें होगा ॥ २० १/२ ॥ उनपर पूर्ण विश्वास करके लोग धन तथा रत्नोंद्वारा उनकी पूजा करने लगे। मुट्ठीमें बन्द वस्तुओंके विषयमें वे तत्क्षण ही बता देते थे। प्रश्न पूछनेके लिये आये हुए धनहीन तथा पुरुषार्थरहित व्यक्तिके मनकी बातको वे जान जाते थे और उससे कहते कि तुम तीन दिनके अन्दर ही धनवान् व्यक्ति हो जाओगे और फिर सचमें ऐसा ही होता भी था ॥ २१-२३ ॥ दूर गयी हुई तथा खोयी हुई वस्तुके विषयमें वे जैसा कहते थे, ठीक वैसा ही होता था। विप्ररूपधारी उन ढुण्ढिराज गजाननके इस प्रकारकी भविष्यवाणियाँ करनेकी बातको लोगोंद्वारा कहते हुए जब दो-तीन महीने बीत गये तो यह समाचार राजा दिवोदासके कानोंतक भी पहुँचा ॥ २४ १/२ ॥ राजाकी रानियाँ तथा अन्य भी पतिव्रतपरायणा स्त्रियाँ, जो कि अभीतक पतिके अतिरिक्त अन्य किसी देवताको भी नहीं मानती थीं, वे भी अब पतिकी आज्ञा लिये बिना ही 'हमारे पुत्र होगा या कन्या होगी' इस विचारको जाननेके लिये उन ज्योतिर्विद् ब्राह्मणको देखनेके लिये निकल पड़ीं। सखियोंने उन्हें यह कहकर रोका कि वे ज्योतिषी ढुण्ढि यहीं आ जायँगे ॥ २५-२७ ॥ तदनन्तर उन रानियोंने उन ज्योतिषीको बुलवाया और उन्हें वे एकान्त स्थानमें ले गयीं। उन्हें रमणीय आसनपर बैठाकर राजपत्नियोंने उनका भलीभाँति पूजन किया। उनके दर्शनसे अत्यन्त विह्वल हुई उन रानियोंने उनके दोनों चरणोंको प्रक्षालित किया और उनके शरीरपर कस्तूरी चन्दनका भलीभाँति विलेपन किया ॥ २८-२९ ॥ उनके समीप जाकर किसी रानीने उन्हें स्वयं अपने हाथोंसे पानका बीड़ा दिया। उन रानियोंने उनसे बहुत- से प्रश्न पूछे और उन्होंने उन सभी प्रश्नोंका सही-सही उत्तर दिया। इस प्रकार उनपर विश्वास हो जानेपर वे सभी अत्यन्त आश्चर्यचकित हो गयीं। वे घरके कामोंको करना छोड़कर तत्पर होकर प्रतिदिन उनका दर्शन-पूजन करने लगीं ॥ ३०-३१ १/२ ॥ 'इस प्रकारका भूत, वर्तमान तथा भविष्यका ज्ञाता ज्योतिषी हमने इससे पूर्व कभी नहीं देखा।' इस प्रकार कहती हुई वे सभी उन श्रेष्ठ ज्योतिर्विद्की प्रशंसा करने लगीं। तदनन्तर राजा दिवोदासके उठकर वहाँ पहुँचनेसे पहले उन सभीने क्षणभरमें शीघ्र ही उन्हें विदा कर दिया ॥ ३२-३३ ॥ वे स्त्रियाँ पतिभावका परित्याग करके उन्हीं ज्योतिर्विद्का सदा चिन्तन किया करती थीं। राजा दिवोदासने भी उन ज्योतिषीके विषयमें जानकर उनको बुलाकर उन्हें प्रणाम किया ॥ ३४ ॥ अपने राजसिंहासनपर उन्हें विराजमानकर विष्टर आदिसे उनकी पूजा की और बड़े ही आदरपूर्वक उन्हें गौ, अर्घ्य, धन तथा वस्त्र समर्पित किये ॥ ३५ ॥ राजाने उनसे जो-जो भी बात पूछी, उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक वह सब ठीक-ठीक बता दिया। अब तो राजा दिवोदास अपने अभीष्ट देवको भूल गये और उनका ही स्मरण-ध्यान करने लगे ॥ ३६ ॥ राजाने एकान्तमें उनसे अनेकों प्रकारके प्रश्न पूछे। तब विश्वास हो जानेपर उनसे आदरपूर्वक प्रार्थना की कि [हे ब्रह्मन् !] मैं आपको अनेकों ग्राम, धन-धान्य प्रदान करूँगा, आप मेरे समीप ही ठहरिये; क्योंकि मैंने आपके बहुत-से चमत्कारोंको देखा है ॥ ३७-३८ ॥ तदनन्तर प्रपंचसे अर्थात् राजाद्वारा दिये गये प्रलोभनोंसे रहित होकर ढुण्ढिने कहा - मैं स्त्री, पुत्र कन्या तथा मकान आदिको छोड़कर वाराणसी आया हूँ। मेरी ग्राम,