भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 364, कुल 656 में से

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पृष्ठ 364

३६२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ] भोग करते हैं। बहुत समयतक इसी प्रकार यातनाओंको भोगते हुए पापकर्मोंके क्षीण हो जानेपर वे पुनः मृत्युलोकमें आते हैं और काने, बौने तथा दरिद्री होते हैं। उन प्राणियोंपर दया करनेके लिये ब्रह्मा, शिव आदि देवोंने तथा महाभाग ऋषियोंने विविध प्रकारके तीर्थों तथा अत्यन्त पवित्र क्षेत्रोंको बनाया है, जो प्राणियोंके पापोंका हरण कर लेनेवाले हैं॥ २७-२८॥ उन तीर्थस्थलों तथा पुण्यक्षेत्रोंमें देवता तथा ऋषिगण जीवोंके पापोंको विनष्ट करते हुए विराजमान रहते हैं, उन तीर्थोंमें निवास करनेवाले प्राणियोंके पाप नष्ट हो जाते हैं। पापोंसे प्राणियोंकी रक्षा करनेके लिये देवता तथा ऋषि सदा ही उन तीर्थोंमें निवास करते हैं॥ २९-३०१/२॥ भगवान् विश्वनाथने सर्वगुणसम्पन्न, सबसे श्रेष्ठ, भुक्ति तथा मुक्ति प्रदान करनेवाली, मंगलमयी वाराणसी नामकी पुरीका निर्माण किया था, वह पुरी ध्यान करनेवाले तथा ज्ञानी जनोंको मोक्ष प्रदान करनेवाली है तथा सर्वतीर्थमयी और अत्यन्त रमणीय है॥ ३१-३२॥ जहाँपर तपस्या करते समय सर्वसामर्थ्यसम्पन्न भगवान् विष्णुने [अपने चक्रसे] प्रसिद्ध चक्र-सरोवरका निर्माण किया था, जो अत्यन्त सुन्दर है और स्नानमात्र कर लेनेसे मुक्ति प्रदान करनेवाला है। जिसका दर्शनकर

[दायाँ स्तम्भ] भगवान् शिवजीके कन्धोंमें कम्पन होनेसे उनके कानोंमें पहने हुए कुण्डलोंसे [निकलकर] मणि उस चक्रसरोवरमें गिर पड़ी थी, तभीसे वह चक्रसरोवर तीर्थ 'मणिकर्णिका' नामसे प्रख्यात हो गया॥ ३३-३४॥ तदनन्तर राजर्षि भगीरथद्वारा आहूत की गयी भागीरथी गंगा नदी वहाँ आयीं। यहाँ मृत्युके प्राप्त होनेपर कीट-पतंगोंतककी मुक्ति होती है॥ ३५॥ गंगाजीका तीन बार मात्र नाम ले लेनेसे वे काशीवासका फल प्रदान करनेवाली हो जाती हैं। [वास्तवमें] वहाँकी लताएँ, झाड़ियाँ, तृण तथा वृक्ष भी धन्य ही हैं, अन्य स्थानोंके नहीं। गंगामें रहनेवाले कछुए तथा मत्स्य भी मृत्युके पश्चात् [रूपवान्] पृथ्वीके कैलास (काशी)- को छोड़कर उस धाममें जाते हैं, जहाँ रूपातीत भगवान् शिव नाना रूप धारणकर स्थित रहते हैं॥ ३६-३७॥ वे गिरिजापति भगवान् शंकर ही सूर्य, चन्द्रमा, विष्णु, ब्रह्मा, विनायक तथा शक्तिस्वरूपा दुर्गा हैं और वे ही इस जगत्के कारणस्वरूप हैं॥ ३८॥ प्रलयकालमें वे काशीपुरीको अपने त्रिशूलके अग्रभागमें धारण किये रहते हैं। वे एक ही परमेश्वर शिव लोगोंपर अनुग्रह करनेके लिये पाँच स्वरूपों (शिव, विष्णु, दुर्गा, गणेश तथा सूर्य)-में हो जाते हैं॥ ३९॥ भक्तगण जिस-जिस स्वरूपका ध्यान करते हैं, भगवान् शंकर तत्क्षण ही वैसा स्वरूप धारण कर लेते हैं। इन पाँचों देवोंमें जो भेद मानता है, वह मनुष्य अवीची नामवाले नरकोंको प्राप्त होता है॥ ४०॥ जो व्यक्ति एक ओर तो इन पंचदेवोंमेंसे किसी एककी स्तुति करता है और दूसरी ओर किसी देवकी निन्दा करता है, वह बहुत वर्षोंतक इक्कीस नरकोंमें पड़ा रहता है। भस्मासुर नामक राक्षसका दुरासद नामका एक प्रसिद्ध पुत्र था। उसने शुक्राचार्यजीके पास जाकर भगवान् शंकरकी पंचाक्षरी विद्या ('नमः शिवाय' मन्त्र) प्राप्त किया॥ ४१-४२॥ एक हजार दिव्य वर्षोंतक वह एक पैरके अँगूठेपर निराहार रहकर खड़ा रहा। वह सूखे काष्ठके समान हो गया था। उसके सारे शरीरमें दीमकोंने बाँबी बना ली थी,