श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 365, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्री०ख०-अ०३८ ] * रानी कीर्तिके पुत्रको महर्षि गृत्समदद्वारा चतुरक्षर मन्त्रका उपदेश * ३६३ उसका शरीर अस्थिमात्र ही शेष रह गया था। उसके केवल नेत्रमात्र ही दीखते थे। इसी अवस्थामें वह मन्त्रजप किया करता था। उसकी कठिन साधनासे प्रसन्न होकर भगवान् शंकर उसे दर्शन देनेके लिये वहाँ आये ॥ ४३-४४॥ उनकी दस भुजाएँ थीं। पाँच मुख थे। वे रुण्डोंकी मालासे सुशोभित थे। हाथमें डमरू तथा त्रिशूल धारण किये हुए थे। जटाजूटसे विभूषित थे। उन्होंने सिरपर गंगाको धारण कर रखा था। उनके तीन नेत्र थे। सम्पूर्ण शरीरमें चिताभस्मका लेपन किया हुआ था, वे नन्दी वृषभपर आरूढ़ थे, उनकी ध्वजामें वृषका चिह्न अंकित था। माथेपर विराजमान चन्द्ररेखासे वे सुशोभित थे। उन्होंने अपर्णा पार्वतीजीको अपनी गोदमें बिठा रखा था। इस प्रकारके स्वरूपवाले वे भगवान् शंकर कृपा करते हुए उस दैत्यश्रेष्ठ दुरासदसे बोले ॥ ४५-४६ १/२ ॥ शिवजी बोले- उठो, उठो, तुम्हारा कल्याण हो। तपस्याके द्वारा तुमने महान् कष्ट सहन किया है। मैं तुम्हें तुम्हारा अभीष्ट मनोरथ प्रदान करूँगा। जो भी बात तुम्हारे मनमें स्थित हो, उसे माँग लो ॥ ४७ १/२ ॥ ब्रह्माजी बोले- तब अपनी आँखोंको खोलकर उस दैत्य दुरासदने हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम किया और वह उन वरदायी भगवान् महेश्वरकी स्तुति करने लगा। हे देव! आप सम्पूर्ण जगत्के कारणस्वरूप हैं, आप परम आनन्दस्वरूप हैं। आप क्षर तथा अक्षरसे अतीत शरीरवाले, सत्त्वादि तीनों गुणोंमें विकार उत्पन्न करनेवाले, गुणातीत, ज्ञानमय और व्यक्त तथा अव्यक्तके विधानके ज्ञाता हैं ॥ ४८-५० ॥ आपका विग्रह मुनियोंके द्वारा ध्यान किये जाने योग्य है, आप सभी भक्तोंपर अनुग्रह करनेवाले हैं। आप अनन्त ब्रह्माण्डोंके कारणभूत हैं, सत्पुरुषोंको श्रेय प्रदान करनेवाले हैं। आप अखण्ड आनन्दसे परिपूर्ण, अमोघ फल प्रदान करनेवाले, सर्वाधार, सब कुछ सहन करनेवाले और सभी शक्तियोंसे सम्पन्न हैं ॥ ५१-५२ ॥ आप पृथिवी, वायु, जल, अग्नि तथा आकाश- स्वरूप हैं। आज मेरी तपस्या धन्य हो गयी, मेरे नेत्र धन्य हो गये, मेरे माता-पिता धन्य हो गये, मेरा जन्म लेना सफल हो गया, जो कि मुझे आपका साक्षात् दर्शन प्राप्त हुआ है। आज मेरे सम्पूर्ण पाप नितान्त रूपसे लयको प्राप्त हो गये हैं। योगियोंके हृदयके लिये भी अगम्य और वेद- वाणीके लिये भी सर्वथा अगोचर आपके स्वरूपका आज मुझे दर्शन प्राप्त हुआ है। हे भगवन्! इस समय मैं आपसे वर माँगता हूँ, उसे आप देनेकी कृपा करें ॥ ५३-५४ ॥ शिवजी बोले- मैं तुम्हारे द्वारा की गयी स्तुति, तपस्या और प्रेमसे अत्यन्त प्रसन्न हूँ। तुम निःसंकोच होकर वर माँगो, मैं तुम्हें वह सब अत्यन्त दुर्लभ वर शीघ्र ही प्रदान करूँगा ॥ ५५ ॥ मुनि बोले- तब उस दुरासद दैत्यने प्रसन्न हुए भगवान् सदाशिवसे निर्भय होनेका वरदान माँगा और उसने कहा- जरायुज, अण्डज, स्वेदज तथा उद्भिज्ज- इन चारों प्रकारकी योनियोंवाले प्राणियोंके द्वारा मेरी मृत्यु न हो। इसीके साथ ही यक्ष, राक्षस, पिशाच, देव, दानव, किन्नर, मुनि, मानव, गन्धर्व, सर्प, वनेचर प्राणियोंसे भी मेरी मृत्यु न हो। हे महाभाग! युद्धस्थलमें मेरे स्वरूपको देखकर सभी देवता भयभीत हो जायँ और मुझे देवलोकका राज्य प्राप्त हो। मुझे आपके चरणोंका नित्य स्मरण रहे और आपमें मेरी अखण्ड भक्ति बनी रहे ॥ ५६-५९ ॥ शिवजी बोले- एकमात्र शक्तिको छोड़कर मैं तुम्हें सभी देवताओंसे अभय प्रदान करता हूँ। शक्तिके तेजसे उत्पन्न कोई वीर तुम्हें जीतकर पुनः जीवित कर देगा ॥ ६० ॥ वह तुम्हारे सिरपर अपना चरण नित्य रखा रहेगा। जब वह तुम्हारे सिरपर रखा हुआ अपना पैर हटा लेगा, तब तुम अपने पराक्रमसे तथा अपने तेजसे पुनः त्रिलोकीको जीत लोगे। तुम्हें मेरी दृढ़ भक्ति प्राप्त होगी और तुम्हें निरन्तर मेरा स्मरण बना रहेगा ॥ ६१-६२ ॥ गृत्समद बोले- दुरासदको इस प्रकारके वर्रोंको प्रदानकर भगवान् शिव अन्तर्धान हो गये। प्रसन्नतासे भरा हुआ वह दुरासद भी अपने घर चला आया। जो इस स्तोत्रका पाठ करता है, वह अपनी समस्त कामनाओंको प्राप्त कर लेता है ॥ ६३ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें '[दुरासदकी] शिवाराधनाका वर्णन' नामक अड़तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३८ ॥ Kalyana Visheshank 2021_Section_13_1_Front