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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 366, कुल 656 में से

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पृष्ठ 366

३६४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 उनतालीसवाँ अध्याय भस्मासुरपुत्र दुरासदद्वारा भूमण्डल तथा देवलोकमें विजय प्राप्त करना, भस्मासुरका शिवसे वरदान प्राप्त करना, मोहिनीरूप भगवान् विष्णुकी युक्तिसे उसका भस्म होना, दुरासदका अविमुक्तक्षेत्र काशीपुरीमें आना, दुरासदके अत्याचारोंका वर्णन

मुनि गृत्समद बोले—तदनन्तर भगवान् शिवके | दिया था। जो अत्यन्त डरपोक थे और अपना राज्य छोड़कर द्वारा प्राप्त वरदानसे अभिमानको प्राप्त वह दैत्यराज | भाग चले थे, उन्हें उस दुरासदने दूतोंद्वारा अपने अधीन कर दुरासद अपनी महिमाको सहन नहीं कर पाया और | लिया था। इस प्रकार सम्पूर्ण भूमण्डलको जीतकर उस मोहित-सा हो गया। वह सम्पूर्ण पृथ्वीको जीतनेकी इच्छा | दैत्य दुरासदने इन्द्रको भी जीतनेकी इच्छा की॥ ९-१०॥ रखता था। [इसके निमित्त] वह अश्वपर आरूढ़ हुआ। | तदनन्तर अपनी सेनाके साथ वह दैत्य इन्द्रद्वारा उसने अपने केशोंको बाँध रखा था। कानोंमें कुण्डल | परिपालित नगरी अमरावतीपर जा पहुँचा। उस दैत्यराज धारण करनेसे वह सुशोभित हो रहा था॥ १-२॥ | दुरासदके वरदानके सामर्थ्यको जानकर देवराज इन्द्र उसने एक हाथमें तलवार तथा दूसरे हाथमें धनुष | सभी देवताओं तथा अपने कुटुम्बसहित वहाँसे पलायनकर ले रखा था और कन्धेपर दो तूणीर धारण किये थे। | हिमालयकी गुफामें छिप गये। उसी समय भगवान् अत्यन्त मूल्यवान् रत्नों तथा मुक्तामणियोंकी माला वह | विष्णु भी अपने लोकको छोड़कर क्षीरसागरमें चले धारण किये हुए था। उसके माथेपर कस्तूरीका तिलक | गये॥ ११-१२॥ था। वह दिव्य वस्त्रोंको पहने हुए था, मनोहर कंचुक | वे भगवान् मधुसूदन देवी महालक्ष्मीकी गोदमें सिर ओढ़ रखा था। उसका मुख ताम्बूलसे सुशोभित हो रहा | रखकर शयन करने लगे। त्रिशूलधारी भगवान् शिव था, उसके साथ उसके दो अमात्य भी थे, जिन्होंने अपनी | कैलासशिखरका परित्यागकर काशीमें चले गये॥ १३॥ भुजाओंकी शक्तिके बलपर अनेक वीरोंपर विजय पायी | उन्हीं भगवान् शिवके साथ बुद्धिमान् चतुर्मुख ब्रह्मा थी। दैत्य दुरासदके दोनों पार्श्वोंमें सेनासहित वे दोनों | भी चले गये। जो-जो देवता अपना पद छोड़कर जाते चल रहे थे॥ ३-५॥ | थे, वहाँ-वहाँपर वह दैत्यराज दुरासद अपने बलशाली उसकी चतुरंगिणी सेना थी, जो सम्पूर्ण पृथ्वीपर | परममित्र दूतको नियुक्त कर देता था। इस प्रकार वह विजय प्राप्त करनेके लिये उद्यत थी। उस सेनाके | महाबली दुरासद अपने बलपर समस्त देवताओंको चलनेसे उड़ी हुई धूलिसे आकाश आच्छादित हो गया | जीतकर कैवर्तकोंके देश अश्मकपुरमें निवास करने लगा, था। वह सेना समुद्रके समान विस्तारवाली थी॥ ६॥ | वह अश्मकपुर लोकमें सर्वत्र 'मुकुन्दपुर' इस नामसे जो-जो भी वीर धन आदिमें अपनेको बढ़ा-चढ़ा | विख्यात था॥ १४-१६॥ समझता था, उसपर वह विजय प्राप्त कर लेता था और | उसी मुकुन्दपुरमें प्राचीन कालमें महान् बलशाली उससे हजारोंकी मात्रामें रत्न तथा द्रव्य ग्रहण कर लेता था। | भस्मासुर नामक दैत्य निवास करता था। भगवान् शंकरने दैत्य उसे राज्यच्युत करके उसके स्थानपर अपने विश्वासपात्र | उसे महान् आश्चर्यजनक यह वर दे रखा था कि तुम महाबली लोगोंको स्थापित कर देता था। उस बलवान् | जिसके सिरपर हाथ रखोगे, वह उसी क्षण मृत्युको प्राप्त राजा दुरासदने सभी राजाओंको वशमें करके उनके पदोंपर | हो जायगा॥ १७॥ अपने लोगोंको स्थापित कर दिया था॥ ७-८॥ | इस प्रकारके वरदानको प्राप्त किया वह दुष्ट दैत्य जो राजा हथियार डालकर और कर प्रदानकर उसकी | भस्मासुर दुर्भावनासे प्रेरित होकर उस वरदानकी परीक्षा शरणमें आ गये थे, उन्हें उसने किसी पदपर स्थापित कर | करनेके लिये वरदान देनेवाले भगवान् शिवके ही सिरपर

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