श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 367, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्री०ख०-अ० ३९] * भस्मासुरपुत्र दुरासदद्वारा भूमण्डल तथा देवलोकमें विजय प्राप्त करना * ३६५ हाथ रखनेके लिये गया। तब पार्वतीपति भगवान् शिव वहाँसे पलायित हो गये। उस समय सर्वसामर्थ्यशाली चक्रपाणि भगवान् विष्णुने दैत्य भस्मासुरको देख लिया, तब वे सुन्दर मोहिनी (स्त्री)-का रूप धारणकर उसके पास गये ॥ १८-२०॥ वे बोले- हे नरोत्तम ! यदि तुम मेरी बातपर विश्वास करोगे तो मैं तुम्हारी अर्धांगिनी बन जाऊँगी। तब अत्यन्त हर्षित हो भस्मासुरने अपनी स्वीकृति दे दी। तदनन्तर मोहिनीरूपधारी वे भगवान् विष्णु नृत्य करने लगे और उस मोहिनीके कहनेपर वह दैत्य भस्मासुर भी नाचने लगा। मोहिनी जिस-जिस प्रकारके हाव-भावको दिखाने लगी, वह भी वैसा ही करने लगा ॥ २१-२२॥ तदनन्तर मोहिनीने अपने सिरपर हाथ रखा, तो उस भस्मासुरने भी अपने सिरपर हाथ रखा, उसी क्षण वह दैत्य भस्मासुर भस्म हो गया। उस दुष्ट चेष्टावाले भस्मासुरका अन्त करनेवाले भगवान् विष्णु उस नगरमें मुकुन्द नामसे स्थित हो गये। उन्हीं मुकुन्दके नामसे वह नगर 'मुकुन्दपुर' नामसे विख्यात हो गया। वह नगर वहाँ अनुष्ठान करनेवाले मनुष्योंके लिये शीघ्र ही परमसिद्धि प्रदान करनेवाला हो गया ॥ २३-२४॥ वे मोहिनी भक्तिपूर्वक की गयी उपासनासे मनुष्योंकी सभी अभिलाषाएँ पूर्ण करती हैं। वहींपर स्थित होकर भस्मासुरका पुत्र वह दुरासद गर्वपूर्वक तीनों लोकोंपर शासन करता था ॥ २५ ॥ वह दुरासद अपने मन्त्रियोंसे बड़े ही गर्वपूर्वक बोला-देखो, कैसे मैंने अपने पराक्रमके बलपर असुरोंके शत्रु देवताओंपर विजय प्राप्त की ! ॥ २६ ॥ इसपर वे मन्त्री बोले-आपने अविमुक्तक्षेत्रपर तो विजय प्राप्त नहीं की, वह भारतवर्षका दसवाँ खण्ड है। उसके समान कहीं कोई क्षेत्र नहीं है। जहाँ भगवान् शंकर विराजमान रहते हैं और सभी देवोंद्वारा वहाँ उनकी सेवा की जाती है। जबतक आप उस काशीपुरीको नहीं जीत लेते, तबतक आपका पौरुष व्यर्थ ही है ॥ २७-२८ ॥ मन्त्रियोंका ऐसा वचन सुनकर युद्धप्रिय वह दुरासद बड़ा ही प्रसन्न हुआ और बोला, 'मैं शीघ्र ही सैनिकोंको लेकर उस काशीपुरीमें जाता हूँ' ॥ २९ ॥ तदनन्तर वह श्रेष्ठ विमानपर आरूढ़ होकर क्षणभरमें ही काशीपुरीकी ओर चल पड़ा। उस दैत्यके काशीपुरीमें प्रवेश करते ही उस पुरीमें सर्वत्र हाहाकार होने लगा ॥ ३० ॥ उस नगरीमें जो देवता थे, वे सभी अन्तर्धान हो गये। भगवान् शिवने अपना भक्त होनेके कारण उसपर कोई कोप नहीं किया ॥ ३१ ॥ 'कुछ समयतकके लिये मैंने तुम्हें अपना राज्य दे दिया'-ऐसा कहकर भगवान् शिव सपरिवार केदारक्षेत्रमें चले गये और तब हे शुभे ! क्षेत्रसंन्यासका नियम लिये हुए महर्षि जैगीषव्यको छोड़कर सभी मुनि भी काशीसे पलायित हो गये ॥ ३२¹/२ ॥ तदनन्तर उस मोहग्रस्त दुरासदने वहाँकी मूर्तियोंको तोड़ डाला। वह मन्दबुद्धि वहाँके मन्दिरोंको तोड़कर प्रसन्न होता था। यदि कोई किसी देवताका स्मरण-ध्यान करता था, तो वह उसे प्रताड़ितकर नगरसे बाहर कर देता था। न कहीं स्वाहाकार होता था, न वषट्कार अर्थात् ऋषियोंका पूजन, न कहीं पितरोंका तर्पण-पूजन होता था, न कहीं वेदका अध्ययन होता था और न कहीं भी Kalyana Visheshank 2021_Section_13_2_Front