श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 368, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें३६६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- शास्त्राध्ययन ही हो पाता था ॥ ३३-३४ ॥ न तो कहीं पुराण आदिकी कथा होती थी, न देवताओंका पूजन होता था, न कोई व्रत-नियम हो पाता था और न तीर्थ आदिकी परिक्रमा ही हो पाती थी। उस काशीमें दुष्टबुद्धि दुरासदके राज्य करते समय कर्मकाण्डके विधि-विधानोंका लोप हो जानेपर धर्ममार्ग भी विलुप्त हो गया। हे कीर्ते ! धर्माचरणके विनष्ट हो जानेपर सभी देवता क्षुधासे पीड़ित हो गये ॥ ३६-३७ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'दुरासदके उपाख्यानमें' उनतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३९ ॥
चालीसवाँ अध्याय दुरासददैत्यके वधका निवेदन करनेके लिये देवताओं तथा ऋषियोंका केदारक्षेत्रमें भगवान् शिव एवं पार्वतीके पास जाना, देवोंद्वारा भगवतीकी स्तुति, भगवतीके मुखमण्डलसे गजाननका प्राकट्य, देवीका उनका 'वक्रतुण्ड' नाम रखना
गृत्समद बोले—तदनन्तर देवगुरु बृहस्पति, इन्द्र तथा अग्नि आदि सभी देवता एवं ऋषिगण केदारक्षेत्रमें गये और उन्होंने भगवान् शिवसहित सर्वज्ञ पद्मयोनि ब्रह्माजीको सम्पूर्ण वृत्तान्त बताया ॥ १ १/२ ॥ देवता तथा ऋषि बोले—हम सभी देवता अपने- अपने पदोंसे च्युत हो गये हैं तथा समस्त मुनिगण भी अपने आचारसे वंचित हो गये हैं। दैत्य दुरासदके भयसे हम सभी स्नानादि नित्य क्रियाओंको करनेमें भी असमर्थ हो गये हैं। उस दुरासदको किसने ऐसा वर दे दिया है, जिससे कि वह दुष्ट समस्त भुवनोंका स्वामी बन गया है, इसका वध किस प्रकारसे हो, इसपर आप विचार करें। आप दयालुओंद्वारा ऐसा उपाय किया जाना चाहिये, जिससे कि सम्पूर्ण लोगोंको सुख प्राप्त हो सके ॥ २-४ ॥ गृत्समद बोले—उनका ऐसा वचन सुनकर चतुर्मुख ब्रह्माजी बोले ॥ ४ १/२ ॥ ब्रह्माजी बोले—हे देवताओ और ऋषियो ! उसके वधका उपाय मैं बतलाऊँगा। जब उस दैत्य दुरासदने बहुत दिनोंतक दारुण तप किया, तब पार्वतीपति भगवान् शंकरने इसे बहुतसे वरोंको दिया ॥ ५-६ ॥ हे श्रेष्ठ देवो ! तीनों लोकोंमें ऐसा कोई देवता नहीं है, जो इसका वध कर सके। कदाचित् वे देवाधिदेव, जो सत्त्वादि तीनों गुणोंमें क्षोभ उत्पन्न करनेवाले हैं, मैं (ब्रह्मा), शिव और विष्णु—ये त्रिदेव जिनकी आज्ञासे उत्पन्न हुए हैं, समस्त विश्वमें व्याप्त हैं, मायावी हैं, जगत्की रचना करनेवाले तथा उसका संहार करनेवाले हैं, गुणातीत हैं, तीनों गुणोंके स्वामी हैं, परसे भी परतर हैं, और कल्याण करनेवाले हैं, वे प्रभु यदि भगवती पार्वतीके उदरसे अवतार ग्रहण करें, तभी इस दुरासदका वध हो सकता है, अन्य किसी भी उपायसे नहीं ॥ ७-१० ॥ अतः आप सभी जगत्की चिन्ता करनेवाले उन प्रभुकी स्तुति करें। उससे पहले आप सभी शंकरप्रिया उन भगवती पार्वतीको प्रसन्न करें ॥ ११ ॥ उनके तेजसे उत्पन्न बालक दैत्य दुरासदका वध करनेमें समर्थ हो सकेगा। इस प्रकारका वरदान ही उन भगवान् शंकरने दुरासदको दिया है ॥ १२ ॥ गृत्समद बोले—ब्रह्माजीके मुखसे इस प्रकारकी बात सुनकर वे देवता अत्यन्त हर्षित हो गये। तदनन्तर वे भक्तवत्सल शिवप्रिया उन भवानी देवी पार्वतीकी इस प्रकार स्तुति करने लगे ॥ १३ ॥ देवता तथा ऋषिगण बोले—हे देवी ! आप जगत्की एकमात्र कारणरूपा हैं, परसे भी पर हैं, विश्वकी विचित्र शक्ति हैं, अचिन्त्य स्वरूपवाली हैं, सम्पूर्ण देवताओंके द्वारा सब प्रकारसे वन्दनीय हैं, त्रिगुणमयी और तीनों गुणोंकी स्वामिनी हैं। आपको हम नमस्कार करते हैं ॥ १४ ॥ आप सम्पूर्ण पृथ्वीको धारण करनेवाली हैं, पृथ्वीरूपा हैं, सम्पूर्ण चराचर जगत्की आधाररूपा हैं, तीनों लोकोंकी साररूपा हैं, सत्त्वादि तीनों गुणोंकी आदि कारणरूपा हैं, वेदत्रयीरूपी विग्रहवाली हैं तथा देवरूपा हैं, आपको हम नमस्कार करते हैं ॥ १५ ॥
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