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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 363, कुल 656 में से

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पृष्ठ 363

क्री०ख०-अ०३८ ] * रानी कीर्तिके पुत्रको महर्षि गृत्समदद्वारा चतुरक्षर मन्त्रका उपदेश * ३६१ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ] जिन भगवान् विनायकका चार अक्षरोंवाला [ढुण्ढिराज] नाम सम्पूर्ण जगत्‌का कारणभूत है, जो [ढुण्ढिराज] शुभ तथा अशुभ कर्मोंके साक्षी हैं, दुष्ट दैत्योंका विनाश करनेवाले हैं, सभी धर्मोंकी रक्षा करनेवाले हैं, काशीके राजा दिवोदासका उपकार करनेवाले हैं, जो वाराणसीमें द्विजका रूप धारण करके विराजमान हैं, जिन्होंने भगवान् विश्वनाथके लिये अविमुक्तक्षेत्रमें निवास करनेके लिये प्रयत्न किया था, जो सर्वान्तर्यामी हैं, विश्वेश्वरद्वारा जिनकी स्तुति की गयी हैं, संसारका पालन करनेके लिये जो जनार्दन भगवान् विष्णुद्वारा स्तुत हैं, सृष्टि करनेके लिये पितामह ब्रह्माजीद्वारा जिनकी पूजा की जाती है और जिनका ध्यान किया जाता है, सम्पूर्ण जगत्‌के विनाशके लिये जो भगवान् शिवद्वारा पूजित होते हैं, पुलोमाकी पुत्री शचीके स्वामी देवराज इन्द्रके द्वारा दैत्योंका संहार करनेके लिये तथा देवताओंके राज्यसुखकी प्राप्तिके लिये अत्यन्त भक्तिपूर्वक जिनका पूजन किया गया है; सूर्य, वरुण, चन्द्रमा, यम, अग्नि तथा वायुदेवने भी अपने-अपने अभ्युदयकी प्राप्तिके लिये जिनका पूजन किया है, साथ ही देवगुरु बृहस्पति तथा दैत्यगुरु शुक्राचार्यने भी अपने उत्कर्षके लिये जिनकी पूजा की है, जिन ढुण्ढिराज गणेशकी आराधना शेषनागने पृथ्वीको धारण करनेकी शक्ति प्राप्त करनेके लिये की है। साथ ही गन्धर्व, किन्नर, यक्ष, सिद्ध, चारण, राक्षस, ऋषिगण, पशु तथा सभी शुभ स्थावर तथा जंगम प्राणी अपने-अपने कार्योंकी सिद्धिके लिये जिन विश्वके स्वामी भगवान् गणेशजीकी आराधना करते हैं, वे अखिल जगत्‌के स्वामी ही ढुण्ढिराज कहलाते हैं, वे अपार गुणोंसे भी परे हैं। ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव आदि देवोंने जिनके गुणोंका पार नहीं पाया है। उन भगवान् ढुण्ढिराजका तुम्हारे द्वारा भक्तिभावपूर्वक शमीपत्रोंसे पूजन होनेपर निश्चित ही तुम्हारा पुत्र शत्रुओंका नाश करनेवाला और राज्यका अधिकारी बनेगा ॥ ५-१५॥ कीर्ति बोली—हे ब्रह्मन्! मैंने ढुण्ढिराजसम्बन्धी सम्पूर्ण महिमाका श्रवण किया। वे ढुण्ढिराज कौन-सा कर्म करनेवाले हैं, किस प्रकार उनका प्रादुर्भाव हुआ, वे

[दायाँ स्तम्भ] किसके अंश हैं, उनका पराक्रम कैसा है? किसने उनका 'ढुण्ढिराज' यह नाम रखा, पूर्वकालमें वे किसके द्वारा पूजित हुए? हे ब्रह्मन्! मेरे इस संशयका आप पूर्णतः निराकरण करनेकी कृपा करें ॥ १६-१७॥ मुनि बोले—हे भद्रे! हे शुभे! तुमने और भी अधिक जाननेकी इच्छासे बहुत अच्छी बात पूछी है। तुमने भक्तिभावसे इस विषयमें पूछा है, अतः मैं तुम्हारे संशयको दूर करता हूँ ॥ १८॥ जिस प्रकारसे उन ढुण्ढिराजने दुरासद नामक दैत्य तथा अनेक राक्षसोंका वध किया, जिस प्रकारसे वे मायासे रूप धारणकर श्रेष्ठ राजा दिवोदासको मोहित करने गये थे, जिस उपायसे वे विश्वेश्वर भगवान् शिवको अविमुक्तक्षेत्र काशीमें लाये थे और हे नृपांगना ! जैसे उनका 'ढुण्ढिराज' यह नाम पड़ा था, वह सब मैं उसी प्रकार बताता हूँ, जिस प्रकारसे कि मैंने स्कन्दजीके द्वारा महर्षि अगस्त्यजीके प्रति कहते हुए सुना था। हे शुभे! उसीको तुम एकाग्रमन होकर सुनो ॥ १९-२१॥ स्कन्द बोले—हे ब्रह्मन् अगस्त्यजी! आप अविमुक्त- क्षेत्रसम्बन्धी उस कथाको ध्यानपूर्वक सुनिये, जिसके सुननेमात्रसे व्यक्ति सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ २२ ॥ एक बारकी बात है, भगवान् श्रीहरिने महर्षि कश्यपजीसे कहा था कि आप विविध प्रकारकी प्रजाओंकी सृष्टि कीजिये। तब उन्होंने तपस्या करके उसके प्रभावसे प्राणियोंकी मैथुनी सृष्टि की। उन्होंने इक्कीस हजार योनियोंवाले अण्डज, उतने ही स्वेदज तथा उतने ही उद्भिज्ज प्राणियोंकी सृष्टि की। इन चार प्रकारकी योनियोंमें मनुष्ययोनि अत्यन्त दुर्लभ है ॥ २३-२४॥ वह मनुष्यजन्म बड़े ही पुण्यसे प्राप्त होता है, उसमें भी ब्राह्मणकुलमें जन्म और भी विशेष पुण्यसे प्राप्त होता है। सम्यक् रूपसे धर्मका पालन और अधर्मका परित्याग करते हुए यदि उस ब्राह्मणत्वकी रक्षा की जाय तो वह उस परम धामको प्राप्त कराता है, जहाँसे फिर यहाँ पुनरागमन नहीं होता। यदि ऐसा नहीं हुआ तो प्राणी चौरासी लाख योनियोंमें भटकता ही रहता है ॥ २५-२६॥ दुराचरण करनेवाले प्राणी नारकीय यातनाओंका