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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 352, कुल 656 में से

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पृष्ठ 352

३५० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-

प्रथम स्तम्भ (बायाँ स्तम्भ): कान्तिहीन तथा रक्त-पित्तके विकारसे ग्रस्त हो गयी॥ २०॥ उसके हाथों, पैरों तथा नाकसे नित्य रक्त निकलने लगा। वह अत्यन्त बीभत्स स्वरूपवाली हो गयी, तब पति राजा प्रियव्रतने मनसे उसका परित्याग कर दिया॥ २१॥ बहुत प्रयत्न करनेपर भी चिकित्सा-सम्बन्धी सभी उपायोंके विफल हो जानेपर अब राजा न तो उससे बोलते थे और न ही उसकी ओर देखते ही थे। तत्पश्चात् तपस्याके द्वारा अत्यन्त सुन्दर आकृतिवाली हो गयी कीर्तिके भवनमें [किसी समय] राजा गये। भगवान् गणेशकी कृपासे राजा प्रियव्रत स्वयं ही उसके वशीभूत हो गये। वे उसका हाथ पकड़कर उसे शय्यापर ले गये॥ २२-२३॥ वे कीर्तिमें एकनिष्ठावान् होकर उसके साथ स्वेच्छानुसार क्रीड़ा करने लगे। नृपश्रेष्ठ प्रियव्रत क्षणभरके लिये भी उसका वियोग सहन नहीं कर पाते थे॥ २४॥ उस पतिपरायणा कीर्तिने भी अनेक प्रकारके भोगों तथा अलंकारोंका उपभोग किया। वह गर्भवती हुई और यथासमय उसने एक पुत्रको जन्म दिया। पुत्रके जन्मसे हर्षित होकर राजा प्रियव्रतने ब्राह्मणोंको [उस] शुभ मुहूर्तमें यथायोग्य अनेक प्रकारके दानोंको दिया॥ २५-२६॥ उन्होंने पाँच ब्राह्मणोंको विभिन्न दिशाओंमें बैठाकर पुत्रका जातकर्म-संस्कार कराया और फिर उस बालकका ‘क्षिप्रप्रसादन’ यह नाम रखा। नाना प्रकारके अलंकारोंसे सुसज्जित अपने पुत्रको देखकर राजाको अत्यन्त प्रसन्नता हुई। ऐसे ही पुत्रका दर्शन करके रानी कीर्ति भी अत्यन्त आनन्दको प्राप्त हुई॥ २७-२८॥ सपत्नी कीर्तिके सुन्दर पुत्रको देखकर प्रभा अत्यन्त दुखी हो गयी। वह यह सोचने लगी कि ज्येष्ठा रानी कीर्तिका यह पुत्र ही आगे चलकर राजा होगा॥ २९॥ तब उसने दही-भातमें विष मिलाकर कीर्तिके पुत्रको खिला दिया। तब क्षणभरमें ही वह विह्वलताको प्राप्त हो गया और उसके नेत्र उलटे हो गये॥ ३०॥ तदनन्तर वह प्रभा स्वयं भी अत्यन्त आतुर होकर बड़े जोरसे शब्द करती हुई रोने लगी। प्रभाका वह कातर शब्द सुनकर कीर्ति उस बालकके पास वेगपूर्वक आयी। उसने उस सम्पूर्ण वृत्तान्तको बड़े आदरके साथ राजाको बतलाया। तब राजाकी आज्ञासे वैद्योंने भी अनेक

द्वितीय स्तम्भ (दायाँ स्तम्भ): प्रकारकी औषधियाँ उस बालकको दीं॥ ३१-३२॥ उन्होंने विषके दोषका परीक्षण करके राजाको बताया कि नाना प्रकारके मन्त्रों तथा औषधियोंसे कोई भी लाभ नहीं हो पा रहा है। राजाने प्रभाको धिक्कारा और उसे घरसे दूर कर दिया। तदनन्तर कीर्ति उस बालकको लेकर सखियोंके साथ वनमें चली आयी॥ ३३-३४॥ जब वह नगरसे एक योजन दूर पहुँची थी कि उसी बीच उस बालककी मृत्यु हो गयी। अपनी गोदमें बालकको लेकर शोकसे विह्वल हुई वह कीर्ति रोने लगी। जिस प्रकार वायुके झोंकेसे लता भूमिपर गिर पड़ती है, वैसे ही वह भी मूर्च्छित होकर भूमिपर गिर पड़ी। उसके आभूषण गिर गये। हाथका कंकण टूट गया और मस्तकपरसे आँचल खिसक गया॥ ३५-३६॥ क्षणभरके बाद जब उसे कुछ होश आया तो वह द्विरदानन भगवान् गणेशका स्मरण करने लगी। वह अपने नवजात शिशुकी उत्पत्ति तथा बालचेष्टाओंका स्मरण करते हुए अपनी छाती पीटने लगी॥ ३७॥ दैवयोगसे उसी समय उस मार्गसे गृत्समद नामवाले मुनिश्रेष्ठ महात्मा आ पड़े, वे साक्षात् सूर्यके समान तेजसे सम्पन्न थे। वे गणेशजीके भक्तोंमें सबसे अग्रणी तथा तपस्याकी परम निधि थे। दयार्द्र होकर वे वहीं रुक गये। तब उस कीर्तिने उन्हें प्रणाम किया॥ ३८-३९॥ वह लम्बी साँस लेते हुए बोली-गणेशजीकी कृपासे मुझे यह पुत्र प्राप्त हुआ, किंतु अब यह बालक मृत्युको प्राप्त हो गया है, इसे आप अपनी तपस्याके बलसे जीवित करनेकी कृपा करें॥ ४०॥ मैंने उन्हीं गणेश भगवान्‌की आज्ञासे इसका ‘क्षिप्रप्रसादन’ यह नाम रखा। किंतु मेरी सपत्नीने दुष्ट भावसे भावित होकर इसे विष दे दिया॥ ४१॥ हे मुने! उसी कारण इसने ऐसी मृत्यु प्राप्त की है। हे तपोधन! सत्पुरुषोंका दर्शन विफल नहीं होता है, इसलिये मैं [आपसे इसका जीवन] माँग रही हूँ॥ ४२॥ साधुपुरुष शरणमें आये हुएके परित्यागकी इच्छा नहीं करते। कीर्तिका उस प्रकारका वचन सुनकर मुनिश्रेष्ठ वे गृत्समद क्षणभरके लिये ध्यानमें स्थित हो गये, तदनन्तर बोले-हे देवि! सुनो, मैं इस पुत्रको जीवित