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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 353, कुल 656 में से

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पृष्ठ 353

क्री०ख०-अ०३४ ] * भृशुण्डीके शापसे औरव-पुत्रीका शमीवृक्षकी योनि-प्राप्तिका आख्यान * ३५१ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 करनेका उपाय बताता हूँ। तुमने अज्ञानमें शमीपत्रोंके द्वारा | जिस पुण्यके प्रभावसे मेरा बालक विषके प्रभावका विनायककी जो पूजा की है, उससे प्राप्त पुण्यफलको तुम | परित्यागकर पुनः सुखी हो गया और शीघ्र ही जीवन मेरी आज्ञासे इसके हाथमें अर्पित करो ॥ ४३-४५ ॥ | प्राप्तकर उसी प्रकार उठ खड़ा हुआ, जैसे कि कोई सोया उस पुण्यके प्रभावसे इस समय शीघ्र ही तुम्हारा | हुआ उठ खड़ा होता है। इसी कारण मैं शमीपत्रके द्वारा पुत्र उठ खड़ा होगा। मुनि गृत्समदजीके इस प्रकारके | की गयी पूजाकी महिमाको आपसे पूछती हूँ ॥ ५२१/२ ॥ वचन सुनते ही वह कीर्ति आनन्दमें निमग्न हो गयी ॥ ४६ ॥ | ब्रह्माजी बोले—उसका वह वचन सुनकर महर्षि उसने शमीपत्रोंद्वारा की गयी गणेशपूजाका उत्कट | गृत्समद उससे बोले— ॥ ५३ ॥ पुण्यफल अपने पुत्रको समर्पित कर दिया। उसी समय | गृत्समद बोले—जिसके नामका उच्चारण वह कीर्तिका पुत्र वैसे ही उठ खड़ा हो गया, जैसे कि | करनेमात्रसे करोड़ों पातक विनष्ट हो जाते हैं, उस उसपर अमृतकी वर्षा की गयी हो ॥ ४७ ॥ | शमीकी महिमाको सम्पूर्ण रूपसे बतानेमें इस पृथ्वीपर कीर्तिने अत्यन्त हर्षित होकर मुनिके चरणोंमें | कौन समर्थ है ? ॥ ५४ ॥ बार-बार सिर रखकर प्रणाम किया। वह उन मुनि | मैं अपनी बुद्धिके अनुसार संक्षेपमें उसे बताता हूँ। गृत्समदसे कहने लगी कि आपने यह कैसे जाना कि मैंने | व्रत, दान, तपस्या, विविध तीर्थोंके सेवन, ग्रीष्ममें शमीपत्रोंद्वारा गणेशजीका पूजन किया है ? ॥ ४८ ॥ | पंचाग्निसाधना और हेमन्त ऋतुमें जलमें निवास करनेसे हे मुने! शमीपत्रद्वारा किये गये गणेशजीके पूजनके | वह फल प्राप्त नहीं होता, जो कि शमीपत्रोंके द्वारा उस पुण्य प्रभाव तथा उसकी महिमाको बतलानेकी कृपा | गणेशजीका पूजन करनेसे प्राप्त होता है ॥ ५५-५६ ॥ करें, जिसके प्रभावसे मेरा बालक जी उठा और | प्रातःकालमें अथवा तीनों सन्ध्याकालोंमें जो भगवान् यमकिंकरोंद्वारा मुक्त हो गया ॥ ४९ ॥ | गणेशजीका ध्यान करके भक्तिभावपूर्वक शमीका स्मरण ताकि शमीपत्रद्वारा की गयी गणेश-पूजाकी महिमाको | करता है, उसकी वन्दना करता है अथवा पूजन करता जानकर मैं नित्य उनका शमीपत्रोंद्वारा पूजन किया | है, भगवान् विनायक उसपर प्रसन्न हो जाते हैं, उसे करूँगी। जिस शमीपूजनके प्रभावसे अत्यन्त क्रूर, न रोके | मनोभिलषित पदार्थोंको देते हैं और अन्तमें मोक्ष प्राप्त करा जानेयोग्य भी यमदूतोंको गणनायके दूतोंने रणांगणमें बहुत | देते हैं, इसमें कोई संशय नहीं है। इस विषयमें भी इस युद्ध करके परास्त कर दिया और फिर वे दूत मेरे पुत्रको | प्राचीन इतिहासका दृष्टान्त दिया जाता है, जो देवर्षि नारदजी जीवित करके गजाननके धामको चले गये ॥ ५०-५१ ॥ | और महात्मा इन्द्रके बीच हुआ था ॥ ५७–५९ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'बालकके पुनः जीवित होनेका वर्णन' नामक तैंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३३ ॥ ❖————❖ चौंतीसवाँ अध्याय महर्षि भृशुण्डीके शापसे ब्राह्मण औरवकी पुत्री शमीकाका शमीवृक्षकी तथा महर्षि शौनकके शिष्य धौम्यपुत्र मन्दारका मन्दारवृक्षकी योनि प्राप्त करनेका आख्यान कीर्ति बोली—हे ब्रह्मन् ! देवर्षि नारदजी और | ब्रह्माजी बोले—उसका इस प्रकारका वचन देवराज इन्द्रके बीच जो संवाद हुआ था, उसे आप | सुनकर वे मुनि गृत्समद देवर्षि नारद तथा इन्द्रके बीच पूर्णरूपसे बताइये, उसे सुनकर मैं समस्त संशयोंको | जो संवाद हुआ था, उस इतिहासका वर्णन करने भुलाकर वैसे ही सन्तुप्त हो जाऊँगी, जैसी तृप्ति अमृत | लगे ॥ २ ॥ पीनेसे होती है ॥ १ ॥ | गृत्समद बोले—हे सुभ्रू ! एक बारकी बात है,