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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 354, कुल 656 में से

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पृष्ठ 354

३५२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 तीनों लोकोंके भ्रमणमें निरत दिव्यदर्शन देवर्षि नारदजी स्वेच्छानुसार पर्यटन करते हुए इन्द्रके पास पहुँचे ॥ ३ ॥ हे शुभानने ! इन्द्रने उनकी पूजा की और [लोकोंके] विशेष समाचारके विषयमें पूछा। तब बुद्धिमान् नारदजीने जो कुछ कहा, उसे तुम सुनो ॥ ४ ॥ नारदजी बोले- मालव नामक देशमें औरव नामके एक ब्राह्मण निवास करते थे। वे वेद-वेदांगोंके ज्ञाता तथा साक्षात् प्रकाशमान सूर्यके समान तेजस्वी थे। वे अपने मनकी शक्तिसे इस सम्पूर्ण चराचर जगत्‌की रचना करने, उसका पालन करने तथा विनाश करनेमें समर्थ थे। वे अपनी धर्मपत्नीमें ही निष्ठा रखते थे। मिट्टीके ढेले, पत्थर तथा सोनेमें उनकी समान दृष्टि थी ॥ ५-६ ॥ वे अत्यन्त मेधावी, तपश्चर्यामें श्रेष्ठ तथा साक्षात् दूसरी अग्निके समान तेजस्वी थे। उनकी पत्नीका नाम सुमेधा था, जो परम धार्मिक थी। वह अत्यन्त लावण्यसम्पन्न, पतिको प्रिय तथा विविध प्रकारके अलंकारोंसे विभूषित रहती थी, उसने अपने रूप-सौन्दर्यसे कामदेवपत्नी रतिको भी तुच्छ बना दिया था और अप्सराओंके समूहोंको भी तिरस्कृत कर दिया था ॥ ७-८ ॥ वह अपने पतिकी सेवा-शुश्रूषामें लगी रहती थी। पतिके द्वारा भी अत्यन्त आदरके साथ उसका पालन- पोषण होता था। उन दोनोंके एक कन्या हुई, उसका भी उन दोनोंने बड़े ही स्नेहसे लालन-पालन किया ॥ ९ ॥ उन दोनोंने अपनी इच्छाके अनुसार उसका 'शमीका' यह नाम रखा। वह कन्या जिस-जिस वस्तुकी अभिलाषा करती थी, उसके सामर्थ्यवान् पिता वह-वह वस्तु उसे दे देते थे। वह रूपवती कन्या जब सात वर्षकी हो गयी, तो उसके पिता औरव उसके विवाहके लिये वरके विषयमें सोचने लगे ॥ १०-११ ॥ उन्होंने सुना कि महर्षि धौम्यका एक पुत्र है, वह मुनि वेद-शास्त्रोंमें पारंगत है, तेजकी परमराशि है और महर्षि शौनकका शिष्य है ॥ १२ ॥ वह गुरुकी आज्ञाका पालन करनेवाला, महान् संयमी, गुरुकी सेवामें तत्पर रहनेवाला, शान्त स्वभाववाला तथा श्रेष्ठ था, उस मन्दार नामवाले ब्रह्मचारीको उन्होंने एक शुभ दिनमें बुलाकर अपनी गृहोक्त विधिके अनुसार उसे अपनी कन्या समर्पित कर दी और बहुत सारा दहेज भी दिया। विवाह हो जानेके अनन्तर मन्दार अपने आश्रममें चला आया ॥ १३-१४ ॥ शमीकाको युवावस्थासे सम्पन्न जानकर वह मन्दार पुनः वहाँ आया। औरवने अत्यन्त मान-सम्मानपूर्वक उसका पूजन किया। उसे भोजन कराकर, वस्त्र आदि तथा सुवर्ण प्रदानकर शुभ मुहूर्तमें उन दोनों कन्या तथा जामाताको विदा किया। उस समय ब्राह्मण औरवने अपने जामातासे कहा- ॥ १५-१६ ॥ हे ब्रह्मन् ! यह पुत्री मैंने आपको विधानपूर्वक सौंपी है, इसका आप बहुत स्नेहपूर्वक पालन करें, जैसा कि मैंने आजतक किया है। श्वशुरको प्रणामकर 'ऐसा ही होगा' यह कहकर मन्दार चल पड़ा और अपने आश्रमस्थलपर आकर वह अपनी भार्या शमीकाके साथ आनन्द-विहार करने लगा ॥ १७-१८ ॥ एक समयकी बात है, भृशुण्डी नामक श्रेष्ठ ऋषि उस मन्दारके आश्रममें आये। वे गणेशजीके महान् भक्त थे। रुष्ट होनेपर वे साक्षात् देदीप्यमान अग्निके समान और प्रसन्न होनेपर ईश्वरके समान हो जाते थे। तपस्या करते रहनेसे उनकी भ्रू (भौंह)-से शुण्डा (सूँड़) निकल आयी थी, इसीलिये वे भृशुण्डी नामसे विख्यात हो गये ॥ १९-२० ॥ उनका उदरदेश बहुत बड़ा था, शरीरकी आकृति विशाल थी। वे विविध प्रकारके अलंकरणोंसे मण्डित थे। मन्दार तथा शमीकाने उन्हें देखा। उनका वैसा विकृत रूप देखकर आनन्दित होकर उस समय वे दोनों हँसने लगे। तब वे अपने अपमानके भयसे दुखी होकर क्रुद्ध हो गये, उनकी आँखें लाल-लाल हो गयीं ॥ २१-२२ ॥ वे बोले-अरे मन्दबुद्धि! तुम मतवाले होकर मुझे नहीं जान रहे हो, इसी कारण दाँत खोलकर पत्नीसहित तुम मुझपर हँस रहे हो, अतः तुम दोनों सभी प्राणियोंद्वारा वर्जित वृक्षकी योनिको प्राप्त करो ॥ २३ ॥ ब्रह्माजी बोले-शाप सुनकर वे दोनों अत्यन्त दुखी हो गये। प्रणाम करके वे दोनों बोले- हे ब्रह्मन् ! शापसे

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