भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 351, कुल 656 में से

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पृष्ठ 351

क्री०ख०-अ०३३ ] * प्रियव्रतकी पत्नी कीर्तिद्वारा शमीपत्रोंसे विनायकका पूजन * ३४९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 तैंतीसवाँ अध्याय प्रियव्रतकी पत्नी कीर्तिद्वारा शमीपत्रोंसे विनायकका पूजन, स्वप्नमें कीर्तिको अनेक वरदानोंकी प्राप्ति, वरदानके प्रभावसे राजा प्रियव्रतका कीर्तिको धर्मपत्नीरूपमें स्वीकार कर लेना, यथासमय कीर्तिको 'क्षिप्रप्रसादन' नामक पुत्रकी प्राप्ति और सपत्नीद्वारा उसे विष देना, महर्षि गृत्समदद्वारा पुत्रको जिला देना, शमीका माहात्म्य ब्रह्माजी बोले—इस प्रकारसे राजा प्रियव्रतकी वह ज्येष्ठ भार्या कीर्ति प्रतिदिन उन विनायककी पूजाकर उनकी स्तुति करने लगी। एक दिनकी बात है, उसकी सखियाँ दूर्वा लेनेके लिये वहाँ आयीं ॥ १ ॥ ज्येष्ठमास होनेके कारण उन्होंने कहीं भी शुभ दूर्वांकुरोंको प्राप्त नहीं किया। अतः वे बहुत-से शमीपत्रोंको लेकर उसके पास आयीं। वे बहुत थककर लौटी थीं, उन्होंने कीर्तिको बतलाया कि दूर्वा कहीं भी नहीं मिल पायी, अतः तुम सभी उपचारोंके साथ इन शमीपत्रोंसे विनायककी पूजा करो ॥ २-३ ॥ दूर्वा न मिलनेसे उस दिन वह निराहार रहकर अपने नियम-परायण रही। शमीपत्रोंके अर्पण करनेसे उन विनायकको परम सन्तुष्टि प्राप्त हुई ॥ ४ ॥ उस दिन वह कीर्ति विनायकदेवके समक्ष ही सो गयी। इसी प्रकार पूजन करते हुए जब उसे एक वर्ष व्यतीत हो चुका तो वर्षके पूरा होनेपर उसने एक अत्यन्त अद्भुत स्वप्न देखा कि वही विनायककी मूर्ति उससे इस प्रकार बोली—हे सुभ्रू ! तुम्हारे द्वारा शमीपत्रोंसे पूजित होनेके कारण मैं अत्यन्त सन्तुष्ट हूँ, मैं तुम्हें वर प्रदान करती हूँ। जब वह कीर्ति कुछ नहीं बोली तो वही विनायकमूर्ति पुनः उससे बोली— ॥ ५-६ ॥ मूर्ति बोली—तुम्हारा पति तुम्हारे अनुकूल हो जायगा, तुम अत्यन्त शुभ भोगोंको प्राप्त करोगी। तुम्हारा एक महाबलशाली पुत्र होगा, जो मुझमें भक्ति रखनेवाला होगा। तुम उसका 'क्षिप्रप्रसादन' यह सुन्दर नाम रखना। चौथे वर्षमें विषके द्वारा उसकी मृत्यु हो जायगी, किंतु तत्क्षण ही गृत्समद नामक द्विज वहाँ उपस्थित होकर उसे पुनः जीवित कर देंगे। क्षिप्रप्रसादन नामक वह पुत्र राज्यकर्ता, धर्मपरायण तथा चिरायु होगा। मुझे सन्तोष प्रदान करनेवाले इस (तुम्हारे द्वारा किये गये) स्तोत्रका जो पाठ करेगा, राजा भी उसके वशमें हो जायगा, फिर दूसरे किसी सामान्य जनकी क्या बात है ! ॥ ७-१० ॥ इस स्तोत्रका पाठ करनेवाला पुत्रवान्, धनसम्पन्न और वेद-वेदांगका पारगामी विद्वान् हो जायगा। उसकी बुद्धि बढ़ेगी और मेधाशक्ति भी वृद्धिको प्राप्त होकर अत्यन्त दृढ़ हो जायगी। जो तीनों सन्ध्याकालोंमें इस स्तोत्रका पाठ करेगा, वह अपने सभी अभिलषित पदार्थोंको प्राप्त कर लेगा, उसकी मुझमें दृढ़भक्ति हो जायगी और वह अन्तमें मोक्षको प्राप्त करेगा ॥ ११-१२ ॥ स्वप्नमें इस प्रकारके वरोंको प्रदान करके देव विनायक क्षणभरमें अन्तर्धान हो गये। कीर्ति जग पड़ी और उसकी आँखोंमें आँसू भर गये। आश्चर्यचकित हो वह मन-ही- मन कहने लगी कि दीनानाथ भगवान् विनायकने मेरे ऊपर महान् कृपा की है। उन्होंने जो मुझे साक्षात् दर्शन दिया, यह मुझपर महान् अनुग्रह है ॥ १३-१४ ॥ सभी प्राणियोंपर कृपा करनेवाले उन देव विनायकने अत्यन्त आदरके साथ आज मेरी रक्षा की है ॥ १५ ॥ यही परम सिद्धि है, यही परम तप है, यही परम लाभ है, जो कि उन देवने मेरे साथ वार्ता की है ॥ १६ ॥ ब्रह्माजी बोले—तदनन्तर प्रभातकालमें उसने स्नान किया। वह परम आनन्दमें भरी हुई थी। उसने अत्यन्त श्रद्धाभक्तिके साथ वरदायी शुभ भगवान् गणेशका पूजन किया। उसने अपना व्रत पूर्णकर गणेशजीकी मूर्तिको पूर्ववाले स्थानपर स्थापित किया और पुरोहितको बुलाकर भक्तिपूर्वक गणेशजीका पूजन किया ॥ १७-१८ ॥ गणेशजीका मनसे ध्यान करते हुए कीर्ति उनके नाममन्त्रका जप करने लगी और वह उनके द्वारा प्रदत्त वरोंका स्मरण करते हुए समयकी प्रतीक्षा करने लगी ॥ १९ ॥ तदनन्तर बहुत समय बीत जानेपर प्रारब्धानुसार एवं ईश्वरकी इच्छासे प्रभा नामवाली राजाकी वह छोटी रानी