भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 346, कुल 656 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 346

यहाँ पृष्ठ का सम्पूर्ण पाठ प्रस्तुत है:

[शीर्षक एवं पृष्ठ संख्या] ३४४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐


[बायाँ स्तम्भ]

कारणके महाकारणरूप उन विघ्नेश्वर गणेशजीके प्रसन्न हो जानेपर सभी मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं, अतः तुम उन्हें प्रसन्न करनेका यत्न करो ॥ ३-४ १/२ ॥ **ब्रह्माजी बोले—**ऐसा कहकर मुनि कश्यपने उन्हें शुभ मुहूर्तमें गणेशजीका महामन्त्र प्रदान किया ॥ ५ ॥ उसी समय वे बालक वामन मुनि कश्यपको प्रणामकर तथा उनसे आज्ञा प्राप्तकर अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक तपस्याहेतु उस आश्रमसे चल पड़े ॥ ६ ॥ इधर-उधर भ्रमण करते हुए उन्होंने विदर्भदेशमें एक उत्तम स्थान देखा, जो लताओं तथा वृक्षोंसे घिरा हुआ था और सरोवरसे सुशोभित था ॥ ७ ॥ वहाँ पद्मासनमें स्थित होकर बालक वामनने निराहार तथा जितेन्द्रिय होकर संवत्सरपर्यन्त उस शुभ षडक्षर मन्त्रका जप किया। उन बालक वामनकी वैसी निर्वाणावस्था (मनोयोग) देखकर भगवान् गणेश सिद्धि- बुद्धिके साथ प्रकट हुए। वे मयूरपर आरूढ़ थे तथा लम्बी सूँड़से सुशोभित हो रहे थे ॥ ८-९ ॥ उनकी दस भुजाएँ शोभित हो रही थीं, वे रत्नोंकी मालाओंसे विभूषित थे। उनकी नाभि विषधर सर्पसे सुशोभित हो रही थी। वे नाना प्रकारके अलंकारोंसे विभूषित थे ॥ १० ॥ दृढ़ निष्ठावाले अपने भक्तके पास वे उसी प्रकार आये, जैसे कोई धेनु अपने बछड़ेके समीप आती है। वामन अपने समक्ष अपने तेजसे सभी तेजोंको निष्प्रभ बना देनेवाले, सभी सिद्धियोंको प्रदान करनेवाले तथा सभी प्रकारके विघ्नोंका निवारण कर देनेवाले देवाधिदेव भगवान् गजाननका दर्शनकर अत्यन्त भक्तिभावसे उनकी स्तुति करने लगे ॥ ११-१२ ॥ **वामन बोले—**मैं उन विघ्नराजकी वन्दना करता हूँ, जो स्वयं अव्यक्त हैं, किंतु (दृश्यमान जगत्‌के) कारणरूप हैं, जिनके स्वरूपकी वेदोंद्वारा वन्दना की गयी


[दायाँ स्तम्भ]

है, जो सभी देवोंके अधिदेव हैं, अनन्त ब्रह्माण्डोंके अधीश्वर हैं, जगत्‌की सृष्टि करनेवाले हैं, सभी वेदान्तोंके द्वारा वेद्य हैं, मायासे परे हैं, स्वसंवेद्य हैं, जगत्‌का पालन तथा लय करनेवाले हैं, सभी विद्याओंके निधान हैं, सर्वेश्वर हैं, सर्वरूप हैं, सभी प्रकारके भयोंका निवारण करनेवाले हैं तथा जो सभी मनोरथोंको पूर्ण करनेवाले हैं, जिनका स्वरूप अत्यन्त कमनीय है। नागोंके सहित ब्रह्मा, शंकर तथा मुनिजनोंद्वारा जो नित्य सेवित होते रहते हैं, जो तेजकी राशि हैं, तीनों कालोंमें विद्यमान रहनेवाले सत्स्वरूप हैं, तीनों गुणोंसे रहित अर्थात् गुणातीत हैं, तत्त्वमसि आदि महावाक्योंद्वारा बोध्य हैं, अपने भक्तोंके इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले हैं, अपने भक्तोंको सुख प्रदान करनेवाले हैं, तत्त्वज्ञानके प्रकाशक हैं, साम्ब आदिके द्वारा स्तूयमान हैं और जो सभी जीवोंके देहमें स्थित रहनेवाले तथा भुक्ति एवं मुक्तिको प्रदान करनेवाले हैं* ॥ १३-१४ ॥ इस प्रकारसे स्तुति किये गये वे देवाधिदेव गजानन प्रसन्न होकर वामनसे बोले—मैं तुमपर प्रसन्न हूँ, तुम्हारे मनमें जो भी कामना हो, वैसा तुम वर माँगो। मैं तुम्हारी तपस्या तथा इस स्तुतिसे प्रसन्न होकर वह तुम्हें प्रदान करूँगा ॥ १५ ॥ **वामन बोले—**हे जगदीश्वर! आपके यथार्थ स्वरूपको ब्रह्मा आदि देवता तथा सनक-सनन्दन आदि ब्रह्मर्षिगण भी नहीं जानते हैं, आज आपके उसी स्वरूपका मुझे दर्शन हुआ है, फिर आपसे मैं अन्य किसी दूसरे वरकी क्या याचना करूँ? ॥ १६ ॥ फिर भी आपका वचन भंग न हो, इस भयसे मैं आपसे वर माँगता हूँ। हे नाथ! उसे आप मुझे प्रदान करें। मुझे कभी भी पराजय प्राप्त न हो और सम्पूर्ण कार्योंमें मुझे विघ्नका कोई भय न हो ॥ १७ ॥ राजा बलि यज्ञके प्रभावसे इन्द्रके पदको प्राप्त


[पाद-टिप्पणी (मूल संस्कृत श्लोक)]

* अव्यक्तं व्यक्तहेतुं निगमनुततनुं सर्वदेवाधिदेवं ब्रह्माण्डानांमधीशं जगदुदयकरं सर्ववेदान्तवेद्यम्। मायातीतं स्ववेद्यं स्थितिविलयकरं सर्वविद्यानिधानं सर्वेशं सर्वरूपं सकलभयहरं कामदं कान्तरूपम् ॥ तं वन्दे विघ्नराजं विधिवरमुनिभिः सेव्यमानं सनागैः तेजोरार्शि त्रिसत्यं त्रिगुणविरहितं तत्त्वमस्यादिबोध्यम्। भक्तेच्छोपात्तदेहं निजजनसुखदं तत्त्वबुद्धिप्रकाशं साम्बाद्यैः स्तूयमानं सकलतनुगतं भुक्तिमुक्तिप्रदं तम् ॥ (श्रीगणेशपुराण, क्रीडाखण्ड ३१।१३-१४)