श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 348, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें३४६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम्* [ श्रीगणेशपुराण- हे ब्रह्मन्! मैंने भूमि दे दी, [तब] संकल्प करवानेके | पदसे निवृत्त हो जानेके पश्चात् तुम ही उस पदको प्राप्त लिये उद्यत वामनने राजा बलिसे कहा- संकल्प कीजिये। | करोगे। तदनन्तर ब्रह्मा आदि देवता उन प्रभु भगवान् उसी समय शुक्राचार्य दूसरा रूप धारणकर संकल्पजलकी | वामनकी स्तुति करने लगे ॥ ४१-४२ ॥ धाराको रोककर वैसे ही स्थित हो गये। तब राजा बलिने | देवताओंने उनके ऊपर पुष्पवर्षा की और वे विविध उस जलपात्र (कमण्डलु)-की टोंटीके अन्दर एक | वाद्योंको बजाने लगे। उन सबने भगवान् वामनकी पूजा तिनका प्रविष्ट कराया, जिससे भग्ननेत्र होकर शुक्राचार्य | की, उनके गीत गाये तथा दूसरे देवता नृत्य करने लगे। बाहर निकल आये ॥ ३५-३६ ॥ | तदनन्तर अनन्त पराक्रमवाले वे वामन भगवान् अन्तर्धान तब उन वामनके हाथमें बलिने संकल्पजल दिया। | हो गये। प्रसन्नमन होकर देवतागण जहाँसे आये थे, आनन्दविभोर होते हुए वामनने भगवान् गणेशका स्मरण | वहाँ-वहाँ अपने-अपने स्थानोंको चले गये ॥ ४३-४४॥ किया और वे बढ़ने लगे। तदनन्तर अपने सिरसे | ब्रह्माजी बोले- इस प्रकार देव वामनद्वारा स्थापित स्वर्गलोकका अतिक्रमणकर उन्होंने एक पैरसे आकाश | की गयी भगवान् गणेशजीकी वह मूर्ति तीनों लोकोंमें और पृथ्वीको तथा दूसरे पैरसे सभी पातालोंको नापकर | विख्यात हो गयी। वह मूर्ति मनुष्योंको सब प्रकारकी तीसरा पग बलिके मस्तकपर रख दिया ॥ ३७-३८ ॥ | कामना प्रदान करनेवाली है॥ ४५ ॥ तब भगवान् वामन बलिसे बोले—तुम पाताललोकमें | इस प्रकार मैंने राजा बलिके द्वारा की गयी सभी जाओ। तदनन्तर राजा बलिने उनसे कहा- आपको छोड़कर | चेष्टाओंका प्रसंगानुसार वर्णन किया। साथ ही भगवान् मैं कैसे जाऊँ? राजा बलिका यह वचन सुनकर भगवान् | वामनके बुद्धिकौशल तथा चातुर्यका और सुमुख गजाननकी वामन उनसे पुनः बोले- तुम्हारे ऊपर अनुग्रह करनेके | महिमाका भी प्रतिपादन किया। उन महात्मा वामनने लिये तुम्हें मेरा सान्निध्य वहाँ भी प्राप्त होगा ॥ ३९-४० ॥ | रेवानदीके दक्षिण भागमें स्थित अदोष नामक नगरमें दस देवराज इन्द्र मेरी शरणमें आये थे, अतः मुझे | भुजाओंवाले उन सुमुख गजाननकी स्थापना की। अब उनका प्रिय करना था। तुम मेरे भक्त हो, अतः इसके | मैं उन भगवान् विनायकको शमीके प्रिय होनेके विषयमें अनन्तर तुम्हारा भी प्रिय होगा। देवराज इन्द्रके ऐन्द्र | स्पष्ट रूपसे आपसे वर्णन करूँगा ॥ ४६-४७ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'बलिचेष्टित' नामक इकतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३१ ॥ बत्तीसवाँ अध्याय गणेशाराधनामें शमीका माहात्म्य, राजा प्रियव्रतका आख्यान, उनकी ज्येष्ठ पत्नी कीर्तिद्वारा गणेशजीकी आराधना ब्रह्माजी बोले- हे ब्रह्मन् व्यासजी ! आप सावधान | शमीपत्रको अर्पण करनेसे होती है ॥ २-३ ॥ होकर उस प्राचीन इतिहासको सुनिये, जिसे स्वयं | 'शमी' इस नामके उच्चारणमात्रसे ही वाणीद्वारा भगवान् गणेशजीने प्रियव्रतसे कहा था ॥ १ ॥ | किया गया समस्त पाप नष्ट हो जाता है। शमीका स्मरण गजानन बोले- हे आर्य! आप शमीपत्रकी महान् | करनेसे मानस पाप तथा उसका स्पर्श कर लेनेसे फलप्रद महिमाको सुनिये। न यज्ञोंके द्वारा, न दानोंसे, न | शारीरिक पाप नष्ट हो जाता है ॥ ४ ॥ सैकड़ों-करोड़ व्रतोंसे, न जपोंसे अथवा न विविध | शमीका नित्य पूजन करनेसे, उसका ध्यान करनेसे प्रकारके पूजनोंसे, न कमलपुष्पोंके अर्पणसे और न अन्य | तथा श्रद्धाभक्तिसे उसका वन्दन करनेसे निर्विघ्नता, पुष्पोंसे मुझको वैसी सन्तुष्टि प्राप्त होती है, जैसी कि | आयुष्य तथा ज्ञानकी प्राप्ति होती है और पापका क्षय