श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 349, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्री०ख०-अ०३२ ] * गणेशाराधनामें शमीका माहात्म्य * ३४७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
भी हो जाता है। समस्त इच्छाओंकी पूर्ति हो जाती है और मनकी चंचलता दूर हो जाती है, इसमें कोई संशय नहीं है ॥ ५ १/२ ॥ मुनि व्यासजी बोले—हे ब्रह्मन्! राजा प्रियव्रत कौन थे ? उनका कैसा स्वभाव था ? वे कहाँ उत्पन्न हुए थे ? महात्मा गजाननने उनसे शमीके गुणोंका किस प्रकार वर्णन किया था ? हे सुव्रत ! मेरे इस संशयको दूर करनेकी कृपा करें ॥ ६-७ ॥ ब्रह्माजी बोले—हे पुत्र! इस विषयमें भी एक प्राचीन इतिहास कहा जाता है, जो भगवान् शंकर तथा पार्वतीजीके संवादके रूपमें है ॥ ८ ॥
पार्वतीजी बोलीं—हे देव ! हे सर्वज्ञ ! हे जगदीश्वर ! यदि आपका मुझपर अनुग्रह है, तो यह बतायें कि गजाननको शमी किस प्रकार प्रिय हुई ? ॥ ९ ॥ भगवान् शंकर बोले—हे प्रिये ! हे पवित्र मुस्कानवाली ! सुनो, मैं एक कथा कहूँगा, जिससे तुमको पता चलेगा कि गणेशजीको शमी कैसे प्रिय हुई ॥ १० ॥ पूर्वकालकी बात है, प्रियव्रत नामके एक महान् बुद्धिशाली राजा थे। वे सत्यवादी, धर्मपरायण, धर्मात्मा, प्रशंसनीय आचरणवाले, तेजस्वी, दान देनेवाले तथा वेद-शास्त्रोंके अर्थतत्त्वको जाननेवाले थे। वे सभी शुभ
लक्षणोंसे सम्पन्न और सर्वाधिक बलशाली चतुरङ्गिणी सेनासे समन्वित थे ॥ ११-१२ ॥ राजा प्रियव्रत अपने औरस पुत्रोंकी भाँति प्रजाका पालन करते थे। उनकी पहली भार्याका नाम कीर्ति था तथा दूसरी भार्याका नाम प्रभा था। उनके धूर्त तथा कुशल नामक दो मन्त्री थे। वे दोनों नीतिशास्त्रमें अत्यन्त कुशल तथा कार्तिकेयके समान पराक्रमवाले थे ॥ १३-१४ ॥ उन्होंने अपनी बुद्धि तथा पराक्रमके बलपर सम्पूर्ण पृथ्वीको अपने अधीन कर लिया। राजा प्रियव्रतको उनकी भार्या प्रभाने अपने वशमें कर लिया था ॥ १५ ॥ राजा प्रियव्रत नाना प्रकारके अलंकारोंसे सुशोभित, युवावस्थाके द्वारा आक्रान्त शरीरवाली तथा रम्भा आदि अप्सराओंसे भी अत्यन्त रमणीय उस प्रभाके साथ रात- दिन नाना प्रकारकी क्रीड़ाएँ करते रहते थे ॥ १६ ॥ वे क्षणभरके लिये भी उसका वियोग सह नहीं पाते थे। राजा प्रियव्रत अपनी ज्येष्ठ भार्या कीर्तिको सदा धिक्कारते रहते थे और यहाँतक कि उसकी कोई भी बात नहीं सुनते थे ॥ १७ ॥ वे क्रोधपूर्वक उसे देखते थे और उसकी मृत्युके बारेमें सोचा करते थे। वे न तो उससे कुछ बोलते थे और न कुछ उसका दिया हुआ ग्रहण करते थे ॥ १८ ॥ यथासमय उस प्रभाका एक पुत्र उत्पन्न हुआ, जो प्रभाके पति अर्थात् राजा प्रियव्रतके समान ही था। राजाने उसका जातकर्म-संस्कार करके अनेक प्रकारके दान- धर्मका आचरण किया ॥ १९ ॥ राजाने ब्राह्मणोंद्वारा बताया गया 'पद्मनाभि' यह नाम उस शिशुका रखा। वह बालक उसी प्रकार बढ़ने लगा, जैसे शुक्लपक्षका चन्द्रमा बढ़ता है ॥ २० ॥ वह अपने पितासे भी अधिक बुद्धिमान् तथा युद्धमें अधिक कुशल था। तदनन्तर पाँचवें वर्षमें पिता प्रियव्रतने उसका यज्ञोपवीत-संस्कार कर दिया ॥ २१ ॥ मद्रदेशके अत्यन्त बुद्धिमान् तथा बलशाली राजा प्रियव्रतने पांचालनरेशकी कन्याको अपने पुत्रकी भार्या बनानेका निश्चय किया ॥ २२ ॥