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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 335, कुल 656 में से

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पृष्ठ 335

क्री०ख०-अ०२६ ] * व्याध तथा राक्षसद्वारा अनजानेमें ही गणेशजीपर शमीपत्रका गिर जाना * ३३३ चेष्टाओंको पूर्णरूपसे आपको बतलाया, इसका श्रवण करनेसे सभी पापोंका विनाश तथा पुण्यकी प्राप्ति होती है। अब आप और क्या सुनना चाहते हैं? ॥ २०१/२ ॥ मुनि व्यासजी बोले- [हे ब्रह्मन् !] मैंने न्यायोचित वृत्तिवाले शुक्ल नामक ब्राह्मणके चरित्रका श्रवण किया। वे अपने घरमें धातुके किसी भी पात्रके न होनेके कारण धातुके स्पर्शसे रहित थे। उनके घरमें देव विनायक गये। उन्होंने गीले भातको बहनेसे रोकनेके लिये अपने दसों हाथोंसे उसे उठाकर जलके साथ ग्रहण करके अपनी थकान दूर की और पूर्ण संतृप्त होकर उनकी दरिद्रता दूर कर दी ॥ २१-२२१/२ ॥ उन्होंने उन शुक्ल ब्राह्मणको इन्द्रके भवनसे भी श्रेष्ठ भवन प्रदान किया और जो सम्पदाएँ अलकाधिपति कुबेरके पास नहीं थीं, उन्हें उनको प्रदान किया। मकरध्वज कामदेवके पास भी जो सौन्दर्य नहीं था, वह उन्हें प्रदान किया। चतुर्मुख ब्रह्माजीके पास भी जो ज्ञान नहीं था, वह उन्हें दिया। हे ब्रह्मन् ! इसमें क्या कारण है, उसे मुझको आप बतानेकी कृपा करें ? ॥ २३-२५ ॥ ब्रह्माजी बोले- हे व्यासजी! आपने बहुत अच्छी बात पूछी है; क्योंकि परमेश्वर विनायकदेवकी कथाको भक्तिपूर्वक सुननेसे वह प्रश्न करनेवाले, सुननेवाले तथा बतानेवाले कथावाचकको भी पवित्र कर देती है ॥ २६ ॥ हे मुने ! आपने जो कुछ पूछा है, उसे बतानेके लिये मेरा मन भी उत्सुक हो रहा है। भक्तिभावसे प्राप्त होनेवाले विनायकदेवके चरित्रको मैं सम्यक् रूपसे आपको बताऊँगा। वे विनायकदेव सर्वज्ञ, सर्वदर्शी, सर्वत्र व्याप्त तथा सभीके चित्तकी वृत्तिको जाननेवाले हैं। वे देव भक्तिके द्वारा ही प्रसन्न होते हैं; क्योंकि भक्तिभाव ही उनकी सन्तुष्टिका कारण है ॥ २७-२८ ॥ भक्तिपूर्वक समर्पित किये गये पत्र, जल, मनोहर पुष्पसे भी वे परम प्रसन्न होकर स्वयं अपनेको ही भक्तको समर्पित कर देते हैं ॥ २९ ॥ दम्भपूर्वक, अवहेलनापूर्वक अथवा दूसरेको देखकर लज्जापूर्वक समर्पित की गयी महान् सम्पत्ति अथवा महान् वस्तु या विविध रत्न, स्वर्ण, चाँदी या मोती आदि सब व्यर्थ होता है, केवल शमीपत्रमात्र समर्पित करनेवाले व्याधको उन्होंने अपना सालोक्य प्रदान कर दिया। हृदयमें दृढ़ भक्तिभाव रखकर किसी प्रसंगवश अनायास उपलब्ध पत्र-पुष्पादि अर्पित करनेसे भी वे प्रसन्न हो जाते हैं, अतः भक्ति श्रेष्ठ है ॥ ३०-३२॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'बालचरितके अन्तर्गत सनक-सनन्दनद्वारा की गयी विनायक-स्तुति एवं भक्तिकी प्रशंसाका वर्णन' नामक पच्चीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २५ ॥ छब्बीसवाँ अध्याय व्याध तथा राक्षसद्वारा अनजानेमें ही गणेशजीके ऊपर शमीपत्रके गिर जानेसे प्रसन्न विनायकद्वारा उन दोनोंको अपने लोककी प्राप्ति कराना मुनि व्यासजी बोले- [हे ब्रह्मन् !] व्याधने कौन-सा कर्म किया था? उसने कैसे शमीपत्र चढ़ाया ? उसका क्या नाम था और कैसे उसने विनायकके सालोक्यको प्राप्त किया? यह सब आप मुझे बतलाइये ॥ १ ॥ ब्रह्माजी बोले- विदर्भ नामक देशमें मदिष नामवाला एक नगर था। वह नगर तीनों लोकोंमें विख्यात था और कुबेरकी नगरी अलकापुरीके समान था ॥ २ ॥ उस नगरमें भीम नामका एक व्याध था, जो मांसका विक्रय करता था। यद्यपि दूसरेके दोषोंका कथन करनेमें दोष होता है, तथापि पूछे जानेपर यथार्थरूपसे उसका वर्णन करना चाहिये, ईर्ष्या-द्वेषवश नहीं ॥ ३१/२ ॥ बहुत-से दोषोंसे व्याप्त वह भीम नामक व्याध बाण, धनुष, बाणोंसे भरा तरकश, खड्ग, चाप तथा छूरी लेकर नित्य वनमें जाता था और प्राणियोंका वधकर अपने कुटुम्बके भरणमें परायण रहता था ॥ ४-५ ॥ वह निर्दयी व्याध निर्जन वनमें पथिकों तथा ब्राह्मणोंका भी वध कर डालता था। किसी समयकी बात है, उस मदिष नामक नगरमें एक महोत्सव प्रारम्भ हुआ। Kalyana Visheshank 2021_Section_12_2_Front