भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 336, कुल 656 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 336

३३४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-


वह व्याध बहुत अधिक मांसकी प्राप्तिकी इच्छासे प्रातःकाल ही वनमें चला गया। वह धनका लोभी व्याध उस मांसको बेचनेकी इच्छा रखनेवाला था और उसीसे अपने कुटुम्बका पोषण करना चाहता था॥ ६-७॥ उसने अनेक मृगसमूहोंका वध किया और उनके मांसके भारसे लदा हुआ ज्यों ही वह नगरमें प्रविष्ट होना चाहता था, उसी समय एक महान् राक्षस वहाँ आ पहुँचा। मनुष्यकी गन्ध पाकर वह राक्षस अत्यन्त प्रसन्न होकर क्षणभरमें ही उस व्याधके पास आ पहुँचा। उस राक्षसका नाम पिंगाक्ष था। उसके नेत्र पीले थे और वह सबके लिये महाभयंकर था॥ ८-९॥ मनुष्यों तथा हिंसक पशुओंका भी भक्षण करनेवाला वह व्याध कभी तृप्त न होनेवाली अग्निके समान सदा अतृप्त रहता था, किंतु उस राक्षसको देखकर वह व्याध काँप उठा और भूमिपर गिर पड़ा॥ १०॥ उस व्याधके सभी शस्त्र गिर पड़े और आँखें भी बन्द हो गयीं। जब बलपूर्वक उसने आँखोंको खोला तो उसे समीपमें एक शमीका वृक्ष दिखायी दिया॥ ११॥ वह भीम नामक व्याध उस वृक्षपर चढ़ गया। उसीके पीछे वह राक्षस भी वृक्षमें चढ़ गया। तभी उस व्याधने शमीवृक्षकी एक शाखाको राक्षसपर फेंका। उस शाखासे एक पत्र वायुद्वारा उड़कर गणनाथके मस्तकके ऊपर गिर पड़ा। उस गणनाथ-विग्रहको वामनने स्थापित किया था। पत्रके मस्तकपर गिरनेसे गणनाथ प्रसन्न हो गये; क्योंकि वे गणनाथ उन दोनों व्याध तथा राक्षसद्वारा स्पष्ट रूपसे पूजित हो गये थे॥ १२-१३॥ बलिपर विजय प्राप्त करनेकी इच्छावाले महर्षि कश्यपके पुत्र वामनको वर प्रदान करनेके लिये जो गजानन स्पष्ट रूपसे प्रकट हुए थे, वे देव दूर्वा तथा शमीपत्रोंसे ही अत्यन्त सन्तुष्ट हो जाते हैं। मनुष्योंद्वारा अनेक प्रकारके रत्नों, सुवर्ण तथा दिव्य वस्त्रोंसे समन्वित की गयी पूजा भी यदि दूर्वांकुरोंसे रहित होती है, तो वह निष्फल हो जाती है। वह पूजा जब दूर्वांकुरों अथवा शमीपत्रके द्वारा की जाती है तो सफल, अन्यथा निष्फल ही रहती है॥ १४-१६॥ वे प्रभु विनायकदेव, यज्ञ, दान, व्रतोपवास, तप, नियम अथवा सुवर्ण तथा रत्नोंके समूहोंके समर्पित करनेसे वैसे प्रसन्न नहीं होते, जैसे कि दूर्वा और शमीपत्रके चढ़ानेसे प्रसन्न होते हैं। उन दोनों भीम नामक व्याध तथा राक्षसपर प्रसन्न देवाधिदेव विनायकने उन दोनोंको अपने धाम पहुँचानेके लिये अपने ही समान स्वरूप धारण करनेवाले पार्षदोंको उत्तम विमानके साथ अपने लोकसे भेजा। उन पार्षदोंका दर्शन करनेसे उन दोनोंकी पर्वतके समान पापराशि नष्ट हो गयी॥ १७-१९॥ भगवान् गणेशजीके कृपाप्रसादसे राक्षस तथा भीम नामक व्याध दोनोंकी पापराशियाँ उसी प्रकार नष्ट हो गयीं, जैसे अग्निकणोंके सम्पर्कसे तृणोंके पर्वत जलकर नष्ट हो जाते हैं। वे दोनों अपना शरीर त्यागकर दिव्य देह धारणकर उस विमानमें आरूढ़ हुए और गणेशजीके पार्षदोंद्वारा विविध प्रकारके वस्त्रों, आभूषणों तथा विलेपनोंद्वारा पूजित हुए॥ २०-२१॥ अप्सराओं तथा गन्धर्वोंसे समन्वित उस महान् यानमें हो रही नाना प्रकारके वाद्योंकी ध्वनिके साथ उन दोनोंको देव विनायकके समीप ले जाया गया और उन दोनोंने विनायकको प्रणाम किया। वे दोनों सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो गये और उन्होंने भगवान् गणपतिके सारूप्यको प्राप्त किया। उन गणपतिने उन्हें एक कल्पतकके लिये अपने धाममें प्रतिष्ठित कर दिया॥ २२-२३॥ इस प्रकार वे गणेश भावनाप्रिय हैं और भक्तिभावसे प्रसन्न होनेवाले हैं। इसी प्रकारके भक्तिभावसे सन्तुष्ट होनेवाले वे विनायक शुक्ल नामक ब्राह्मणके द्वारा प्रदत्त एक मुट्ठीभर अन्नसे उसपर अत्यन्त प्रसन्न हो गये और उन शुक्ल नामक ब्राह्मणको उन्होंने अलकापुरीके सदृश दिव्य भवन प्रदान किया॥ २४ १/२ ॥ अतः दूर्वा तथा शमीपत्रोंके बिना की गयी पूजा निष्फल हो जाती है। वे गजानन दम्भपूर्वक की गयी महान् पूजासे वैसे प्रसन्न नहीं होते, जैसे कि भक्तिभावपूर्वक की गयी स्वल्प पूजासे ही प्रसन्न हो जाते हैं॥ २५-२६॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'भीम और राक्षसके मोक्षका वर्णन' नामक छब्बीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ २६॥