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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 337, कुल 656 में से

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पृष्ठ 337

क्री०ख०-अ०२७] * भीम नामक व्याध और राक्षसके पूर्वजन्मका वृत्तान्त * ३३५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

सत्ताईसवाँ अध्याय भीम नामक व्याध और राक्षसके पूर्वजन्मका वृत्तान्त

व्यासजी बोले—भगवान् विष्णुके नाभिकमलसे प्रादुर्भूत हे ब्रह्मन्! आप मुझे यह बतानेकी कृपा करें कि पूर्वजन्ममें वह व्याध कौन था और वह पिंगाक्ष नामक राक्षस कौन था? उनका कैसा शील था और कैसा आचरण था? हे प्रभो! उन वामनभगवान्ने अनुष्ठान क्यों किया और गजाननरूपधारी भगवान्ने उन्हें कैसे वर प्रदान किया ? ॥ १-२ ॥

गणेशजीका गणेशलोक पृथक् रूपसे अन्यत्र कैसे प्रतिष्ठित है? और क्यों उन्हें शमी प्रिय है? यह सब आप मुझे शीघ्र ही बतायें ॥ ३ ॥

ब्रह्माजी बोले—मुने ! आपने जो कुछ पूछा है, वह सब मैं आपको बताता हूँ। वह व्याध (भीम) पूर्वजन्ममें [साम्ब नामक] एक राजा था। [उसे वह राजपद कैसे प्राप्त हुआ, इस इतिहासका श्रवण करो— प्राचीनकालकी बात है, ] सभी शुभ (राजोचित) लक्षणोंसे समन्वित एक राजा हुए। वे सभी शास्त्रोंके प्रवक्ता, यज्ञ करनेवाले, विनयी, लज्जाशील और देवताओं एवं अतिथियोंकी पूजा करनेवाले थे ॥ ४-५ ॥

उनके गजारोही, अश्वारोही, रथारोही तथा पैदल सैनिकोंकी गणना नहीं की जा सकती थी। वे बड़े ही दानी, शूरवीर, मेधावी एवं इन्द्रके समान वैभवसे समृद्ध थे। उनके ध्वज तथा शत्रुजित् नामक दो प्रधान अमात्य थे। जो बड़े ही बुद्धिमान् थे। उन्होंने अपनी प्रतिभासे शुक्राचार्य तथा वाणीके अधिपति बृहस्पतिको भी पराजित कर दिया था ॥ ६-७ ॥

वे दोनों अपने शस्त्रके तेजसे सम्पूर्ण पृथ्वीको जीतनेमें समर्थ थे। उन राजाकी मदनावती नामकी सुलक्षणा पत्नी थी। वह मदनावती पतिव्रता, धर्मशीला, सुन्दर मुखवाली तथा सब कुछ जाननेवाली थी। तीनों लोकोंमें उसके समान अन्य कोई कामिनी नहीं थी ॥ ८-९ ॥

वह दीनों, अनाथों, वृद्धजनों तथा अतिथियोंपर दया करनेवाली थी। इस प्रकार वे दोनों पति-पत्नी यज्ञ, दान एवं साधुजनोंकी पूजामें निरत रहते थे ॥ १० ॥

उनके सद्व्यवहारसे नगरमें निवास करनेवाले तथा जनपदोंमें रहनेवाले सभी नागरिक सन्तुष्ट रहते थे। जो उनके शत्रु थे, वे भी राजाके सज्जनोंद्वारा प्रशंसित सन्धि, यान आदि छः गुणोंका अनुकरण करते थे ॥ ११ ॥

इस प्रकार उन पुण्यकीर्ति राजाने इस पृथिवीपर बहुत वर्षोंतक भलीभाँति शासन किया। कालयोगसे एक दिन राजाकी मृत्यु हो गयी। उन्होंने मरणासन्न-अवस्थामें विधि- पूर्वक सहस्रों गौओंका दान किया। साथ ही दस महादान तथा अन्य अष्टदानोंको भी प्रदान किया ॥ १२-१३ ॥

राजाके मृत हो जानेपर सम्पूर्ण नगरी उनके लिये शोक करने लगी। पुत्र न होनेके कारण उनकी धर्मपत्नीने भी उन्हींके साथ सहगति प्राप्त की ॥ १४ ॥

मन्त्रियोंने ब्राह्मणोंके द्वारा उनके सभी और्ध्वदैहिक संस्कार सम्पन्न कराये और एकादशाहके दिन भक्तिपूर्वक विविध दान प्रदान किये ॥ १५ ॥

राजाकी मृत्युके एक मास बीत जानेपर उन दोनों मन्त्रियोंने राजाके उत्तराधिकारीके रूपमें किसी कुलीन, राज्य चलानेयोग्य, बुद्धिमान्, सत्त्वसम्पन्न, शूरवीर, सत्यशाली तथा पराक्रमी व्यक्तिके विषयमें आपसमें मन्त्रणा की। तब उन्होंने राजाके द्वारा पहलेसे निश्चित किये गये राजाके दायाद अर्थात् रक्तसम्बन्धसे उत्तराधिकारी बान्धव दुर्धर्षके महान् बलसम्पन्न साम्ब नामक क्षेत्रज पुत्रको राजगद्दीपर बैठानेका निश्चय करके सभी पुरवासियों तथा जनपदनिवासियों एवं ब्राह्मणोंसे पूछकर और उनकी आज्ञा प्राप्तकर शुभ मुहूर्त तथा शुभ लग्नमें नाना प्रकारकी सामग्रियोंद्वारा ब्राह्मणोंके साथ उसका राज्याभिषेक कर दिया ॥ १६-१९ ॥

व्यासमुनि बोले—हे पितामह ! हे कृपानिधे ! आप सर्वज्ञ हैं, अतः आप बतलायें कि साम्ब क्षेत्रज पुत्रके रूपमें कैसे उत्पन्न हुआ और वह किस जातिका था ? ॥ २० ॥