श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 334, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें३३२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 पच्चीसवाँ अध्याय कुमार सनक तथा सनन्दनद्वारा की गयी विनायक-स्तुति, उनके द्वारा काशीमें गणेशकुण्डका निर्माण तथा मन्दिर बनाकर उसमें वरदविनायक नामक विनायक-मूर्तिका प्रतिष्ठा, भक्तिकी महिमा
सनक-सनन्दन बोले-आप सभी कारणोंके कारण और कारणोंसे अतीत हैं। आप ब्रह्मस्वरूप, ब्रह्माण्डके कारण, व्यापक और [परसे भी] परे हैं॥ १ ॥ हे अनघ! आप ही विश्वकी रचना करते हैं, इसका पालन-पोषण करते हैं और आप ही इसका संहरण करनेवाले हैं। आप विविध स्वरूपोंवाले हैं और रूपरहित भी हैं। आप विविध प्रकारके मायाबलसे समन्वित हैं। आप ही पृथ्वी आदि पंचमहाभूत, यक्ष, गन्धर्व, राक्षस हैं। आप चराचरस्वरूप हैं, अतः आपकी स्तुति करनेमें कौन समर्थ है? ॥ २-३ ॥ आपके यथार्थ स्वरूपको न जाननेके कारण वेद ‘नेति-नेति’ कहकर आपको पुकारते हैं। हम दोनों भी आपकी मायासे विमोहित होनेके कारण आपके श्रेष्ठ स्वरूपको जाननेमें समर्थ नहीं हो सके ॥ ४ ॥ हे विभो ! अनेक रूप धारण करनेवाले आपकी महिमाको हम नहीं जानते हैं। हे प्रभो! इस समय हम आपके चरणोंका दर्शन करके कृतकृत्य हो गये हैं। आप अपनी अनन्त शक्तियोंके द्वारा नाना अवतारोंको धारणकर पृथ्वीके भारका हरण करते हैं॥ ५१/२॥ ब्रह्माजी बोले-उन दोनोंके द्वारा की गयी इस प्रकारकी स्तुतिको सुनकर मायावी और अत्यन्त कौतुकी बालरूपी वे विनायक प्रसन्न होकर उनसे बोले-आप दोनों मेरी कृपासे तत्त्वका ज्ञान रखनेवाले और सर्वज्ञ हो जाओगे॥ ६-७॥ इस प्रकारका वर प्रदानकर वे विनायकदेव वहीं अन्तर्धान हो गये। तदनन्तर उन दोनों कुमारों सनक तथा सनन्दनने भलीभाँति विनायककी अतुलनीय मूर्तिका निर्माणकर तथा रत्नों एवं सुवर्णसे निर्मित एक अद्वितीय मन्दिर बनाकर उसमें उस मूर्तिकी स्थापना की ॥ ८-९ ॥ उन्होंने उस मूर्तिका ‘वरदविनायक’ यह नाम
रखा। उन दोनोंने वहींपर ‘गणेशकुण्ड’ नामसे एक सरोवर भी बनवाया॥ १०॥ इस गणेशकुण्डमें स्नानकर जो वरदविनायककी पूजा करता है। वह सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त करता है और अनेक भोगोंका भोग करता है॥ ११॥ वह पुत्र-पौत्रों, विद्या, आयु, महान् यश, धन, धान्य, कीर्ति और शाश्वत तत्त्वज्ञानको प्राप्त करता है। अन्तमें वह विनायकके धामको प्राप्त करता है, इसमें कोई संशय नहीं है ॥ १२१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले-उसी समय गन्धर्वों, यक्षों तथा अप्सराओंके साथ सभी देवता वहाँ आये और उन देवेश वरदविनायकका दर्शन तथा पूजनकर वहीं क्षणभरमें अन्तर्धान हो गये। वे दोनों कुमार सनक तथा सनन्दन भी अत्यन्त आश्चर्यान्वित होते हुए उत्तम देवलोकको चले गये ॥ १३-१४॥ काशिराज भी अपने अमात्यों तथा प्रजाजनोंके साथ वहाँ आये और उन्होंने विविध द्रव्यों, अलंकारों, विविध उत्तरीयों तथा अधोवस्त्रों, अनेक प्रकारके पक्वान्नों, नानाविध फलों, रत्नों, मोतियों, पुष्पों तथा बहुत प्रकारकी दक्षिणाओंके द्वारा ब्राह्मणोंके साथ मन्त्रोच्चारपूर्वक परम भक्तिसे उन वरदविनायकका पूजन किया। तदनन्तर उन्होंने वस्त्रों तथा स्वर्णाभूषणोंसे ब्राह्मणोंका पूजन किया ॥ १५-१७॥ आशीर्वाद ग्रहणकर वे पुनः अपने नगरको आये। राजाके समान ही उन मन्त्रियों आदिने भी उन वरदविनायकका पूजन किया। उन्होंने भी उसी प्रकार ब्राह्मणोंका भी पूजनकर उनसे उत्तम आशीर्वाद ग्रहण किया। तदनन्तर प्रजाजनोंने भी यथाशक्ति उन विनायकका पूजन किया ॥ १८-१९॥ सभीने प्रसन्नमन होकर नगरमें प्रवेश किया। [हे व्यासजी!] इस प्रकार मैंने विनायकद्वारा की गयी
Kalyana Visheshank 2021_Section_12_1_Back