श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 333, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्री०ख०-अ०२४ ] * काशीमें विनायकद्वारा एक ही समयमें अनेक घरोंमें भोजन करना * ३३१ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ] करते हुए देखा ॥ २८ ॥ किसी घरमें वे आसनपर शयन करते हुए दिखायी पड़े। कहीं फलोंका भक्षण करते हुए दिखायी दिये। कहीं ताम्बूलका सेवन करते हुए तो कहीं गन्ध आदि द्रव्योंसे अनुलेपित दिखायी दिये ॥ २९ ॥ कहीं अपने गणोंके साथ गणिकाओंका नृत्य देखते हुए दिखायी दिये। कहीं अपने बुद्धि-कौशलसे अक्षक्रीडा करते हुए दिखायी दिये ॥ ३० ॥ कहींपर वे विविध प्रकारके अलंकारोंसे अलंकृत तो कहीं दिव्य वस्त्रोंको धारण किये हुए दिखायी दिये। कहींपर वे स्वयं अध्ययन करते हुए, कहींपर जप करते हुए तो कहींपर ध्यानपरायण दिखायी दिये ॥ ३१ ॥ कहींपर भक्तोंद्वारा उनकी स्तुति की जा रही थी। कहींपर वे विनायक जगदीश्वरकी स्तुति कर रहे थे। कहींपर अपने भक्तोंको अपनी विविध विभूतियोंका दर्शन कराते हुए वे दिखलायी पड़े ॥ ३२ ॥ उन सनक-सनन्दनाने कहींपर अपनी मनोरम पत्नियोंके साथ रमण करते हुए युवा पुरुषके रूपमें उनको देखा। कहींपर वे वृद्धजनोंकी चिकित्सा करते हुए चिकित्सकके रूपमें तो कहीं-कहीं उत्तम रसायनोंका सेवन करते हुए उन्होंने विनायकको देखा ॥ ३३ ॥ कहींपर वे विनायक आँगनमें रेंगते हुए मिट्टी खाते हुए दिखायी दिये, तो कहीं वे गेंद आदिकी क्रीड़ासे थककर जल पीते हुए दिखायी दिये ॥ ३४ ॥ इस प्रकार वे दोनों कुमार सनक और सनन्दन घर- घर घूमते हुए अत्यन्त थकित तथा भूखे हो गये थे। सभी घरोंमें उन विनायकको देखकर वे आपसमें ही इस प्रकार कहने लगे— ॥ ३५ ॥ इस काशीनगरीमें शुक्ल नामक ब्राह्मण अत्यन्त पवित्र तथा निर्मल हैं, अतः हम लोग भोजनके लिये वहाँ चलें, ऐसा कहकर वे दोनों उनके घर गये ॥ ३६ ॥ वहाँ भी उन दोनोंने उनके आँगनमें स्थित उन
[दायाँ स्तम्भ] विनायकको देखा, यहाँ विनायकके बिना कोई घर बचा नहीं है, अतः इस नगरमें भोजन नहीं करना चाहिये ॥ ३७ ॥ ऐसा कहकर जब वे बाहर आये तो अपने सामने विनायकको स्थित देखकर वे दोनों तिरछे चलने लगे, वहाँ भी उन्होंने अपने सामने उन विनायकको देखा ॥ ३८ ॥ उन्होंने पूर्व, पश्चिम आदि चारों दिशाओंमें तथा ऊपर और नीचे सर्वत्र विनायकको ही व्याप्त देखा ॥ ३९ ॥ तदनन्तर उन्होंने विनायकके विश्वरूपको देखा। उन्होंने जगत्की समस्त वस्तुओंको विनायकमय देखा ॥ ४० ॥ अत्यन्त आश्चर्यचकित होकर जब उन्होंने विष्णु तथा शंकरका ध्यान किया तो अपने हृदयमें भी उस समय उन विनायकको ही स्थित देखा ॥ ४१ ॥ फिर उन मुनिश्रेष्ठोंने जब अपने नेत्रोंको बन्द किया तो अपने हृदयमें वे ही विनायक स्थित दिखायी दिये और नेत्रोंको खोलनेपर भी अपने हृदयके भीतर उन विनायकको ही स्थित देखा ॥ ४२ ॥ उस समय वे विनायक मुकुट, कुण्डल तथा मोतियोंकी मालाको धारण किये हुए थे। श्रेष्ठ बाजूबन्द, सुवर्णमय कटिसूत्र तथा मुद्रिकाओंसे वे विभूषित थे। वे सिंहपर विराजमान थे। उनकी दस भुजाएँ थीं। वे सिद्धि तथा बुद्धि नामक पत्नियोंसे समन्वित थे। उनका स्वरूप अत्यन्त मंगलमय था। उन्होंने अपने मस्तकपर चन्द्रमाको धारण कर रखा था और कस्तूरीका तिलक लगाया हुआ था। उन विनायकने सर्पको आभूषणके रूपमें धारण किया हुआ था। करोड़ों सूर्योंके समान उनकी आभा थी। वे सृष्टि, स्थिति तथा संहारके कारणरूप थे ॥ ४३-४४१/२ ॥ उन्हींकी कृपासे उन दोनों मुनीश्वरों सनक तथा सनन्दनने विवेक-ज्ञान प्राप्त किया। तदनन्तर उन दोनों तत्त्वज्ञानियोंने भेददृष्टिका परित्यागकर उन विनायकदेवके चरण-कमलोंमें प्रणाम किया और अत्यन्त भक्तिभावसे उन देवदेव विनायककी स्तुति की ॥ ४५-४६ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'काशीमें विनायकके [द्वारा एक ही समयमें अनेक गृहोंमें] भोजनादि [क्रियाओंको सम्पन्न करना तथा सनक-सनन्दनको बोधकी प्राप्ति]-का वर्णन' नामक चौबीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २४ ॥ ❖ ─── ❖
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