भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 332, कुल 656 में से

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पृष्ठ 332

३३० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- देखा। कुछने क्रोधित होकर उनकी निन्दा करते हुए कहा-यह तुच्छ बालक पिशाचके समान उस दरिद्र ब्राह्मणके घरमें क्यों गया? यदि यह ईश्वर है और सभीके मनोभावोंको जाननेवाला है, तो इसे सभीका प्रिय करना चाहिये। तदनन्तर उन (विनायक)-को उठाकर हाथमें पकड़कर उन्होंने कहा- हमारे शुभ भवनमें चलें और हमने आपके लिये जो सामग्री एकत्रित की है, उसे सफल करें ॥ ७-९॥ आपके चरणकमलोंका दर्शन करके हमें जो आपको ढूँढ़नेमें कष्ट हुआ था, वह दूर हो गया है। अब आप बालकोंके साथ भोजन करनेके लिये हमारे घरोंको चलें। उन्होंने कहा-इस समय तो मैंने भोजन कर लिया है, तब उन लोगोंने पुनः उनसे कहा- उस भिक्षा माँगनेवाले ब्राह्मणके घरमें आपने क्या खाया होगा? हे विभो! ऐसे व्यक्तिके घरमें तो जलतक नहीं पिया जाता, फिर आपने वहाँ भोजन क्यों किया? ॥ १०-१११/२॥ गणेशजी बोले- मेरा पेट बहुत भरा हुआ है, इस समय मुझमें चलनेकी भी शक्ति नहीं है ॥ १२ ॥ ब्रह्माजी बोले- तदनन्तर यह जानकर कि इन्होंने शुक्ल ब्राह्मणके घरमें भोजन किया है, वे सभी निराश, भग्न- मनोरथ, रुष्ट, अनाथ तथा चेतनाहीन-से हो गये ॥ १३ ॥ हमारे द्वारा बड़े कष्टपूर्वक तथा धन व्यय करके संग्रह की गयी सब सामग्री व्यर्थ चली गयी। ऐसा कहते हुए उन दुष्टजनोंने; जो कि दाम्भिक थे और भक्तिसे रहित थे, सब सामग्री स्वयं खा ली ॥ १४ ॥ जो लोग विनायकके वास्तविक भक्त थे, वे निराहार रहकर और उनके ध्यानमें निरत हो गये। इस प्रकार सभी लोगोंको ध्यानपरायण जानकर वे विनायक एक होते हुए भी उसी प्रकार नाना स्वरूपवाले हो गये, जैसे कि एक ही आकाश विभिन्न घटोंमें विभिन्न स्वरूपोंवाला हो जाता है और जैसे एक ही सूर्य जलसे भरे अनेक कलशोंमें अनेकविध दिखायी देता है ॥ १५-१६ ॥ वे विनायक कहीं पलंगपर सो रहे थे, कहीं जपमें तल्लीन थे, कहीं दान देनेमें निरत दिखायी दे रहे थे, तो कहीं भोजन करनेके लिये उत्सुक दिखायी दे रहे थे। कहीं वे शिष्योंको शिक्षा, कल्प आदि वेदांगोंके सहित वेदोंके अर्थको पढ़ा रहे थे, कहीं शास्त्रकी व्याख्या करते दिखायी दे रहे थे, तो कहीं स्वयं अध्ययनमें निरत दिखायी दे रहे थे ॥ १७-१८॥ इस प्रकार वे विविध स्वरूपोंके द्वारा विभिन्न घरोंमें स्थित हुए। सभी लोग यही समझ रहे थे कि ये विनायक सबसे पहले हमारे ही घर आये ॥ १९ ॥ उन्होंने उन विनायकको तेल, उबटन, स्नानकी सामग्री तथा भोजन प्रदान किया। इस प्रकार काशिराज- सहित समस्त नगरवासी अत्यन्त प्रसन्न हुए ॥ २० ॥ उन विनायकदेवका दर्शनकर लोगोंने परम प्रसन्नताके साथ उनका पूजन किया। उन्हें भोजन कराया, साथ ही ब्राह्मणों तथा बन्धु-बान्धवोंको भी भोजन कराया ॥ २१ ॥ सभी लोगोंने अपनी-अपनी रुचिके अनुसार पंचामृत, पक्वान्न, विविध व्यंजन, खीर और ओदन तथा जो-जो भी अच्छा लगा, उसका भोजन किया। इस प्रकार ब्राह्मणों, देवताओं, काशिराज तथा मित्रगणोंके भी भोजन कर चुकनेपर सभामें विराजमान काशिराज अनेक स्वरूप धारण करनेवाले मुनि कश्यपके पुत्र उन विनायककी मायासे मोहित होकर इस प्रकार पूछने लगे - ॥ २२- २३१/२ ॥ राजा बोले- वे विनायकदेव भोजन करनेके लिये अनेक घरोंमें गये हैं - यह तो स्पष्ट है, किंतु ये तो मेरे समीपमें ही स्थित हैं। फिर घर-घरमें जाकर कौन भोजन कर रहा है? कहीं ये विनायक डोलीमें चढ़कर भोजन करनेके लिये जा रहे हैं, तो कहीं हाथीमें आरूढ़ होकर जा रहे हैं और कहीं घोड़ेपर सवार होकर जा रहे हैं। इस प्रकारसे जब [काशिराज ऊहापोहमें पड़े थे और] सभी लोग बालक विनायककी पूजामें संलग्न थे, उसी समय दोनों कुमार सनक और सनन्दन स्नान करनेके अनन्तर सम्पूर्ण नित्यकर्म सम्पन्न करके भिक्षाके लिये उस काशीनगरीमें भ्रमण करने लगे ॥ २४-२७ ॥ वे दोनों सनक तथा सनन्दन जिस-जिस घरमें भिक्षा माँगने गये, वहाँ-वहाँ उन्होंने विनायकको भोजन

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