भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 331, कुल 656 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 331

क्री०ख०-अ०२४] * काशीमें विनायकद्वारा एक ही समयमें अनेक घरोंमें भोजन करना * ३२९ भोजन है—ऐसा कहते हुए वे बालक बड़ी ही रुचिसे उस भोजनको खीरके समान समझते हुए खाने लगे॥ ४३ ॥ जिन बालकोंने उन विनायकके साथ वह भोजन किया, वे देवोंके समान (तेजोमय) हो गये थे और दूसरे जिन्होंने भोजन नहीं किया और जो दाँत खोलकर उन विनायककी हँसी उड़ा रहे थे, वे बादमें पश्चात्ताप करने लगे। उस समय काशीनगरीमें यह कोलाहल होने लगा कि 'बालक विनायक कहाँ चला गया?' कुछ लोगोंने बताया कि वे विनायक शुक्ल नामक ब्राह्मणके घरमें शीर्ण भात खा रहे हैं॥ ४४-४५ ॥ उन्होंने उस गीले भातको बहनेसे रोकनेके लिये अपने दस हाथ बना लिये और उन्हीं हाथोंसे वे भोजन कर रहे हैं। बालक विनायकद्वारा भोजन कर लिये जानेके अनन्तर मुखशुद्धिके लिये ब्राह्मण शुक्लने उन्हें सूखे आँवलेके टुकड़े दिये॥ ४६॥ तब जगदात्मा विनायकने उनके द्वारा मुखशुद्धि की। तदनन्तर प्रसन्न होकर उन्होंने ब्राह्मण शुक्लसे कहा—हे अनघ! मैं आपके प्रीतिभावसे अत्यन्त प्रसन्न हुआ हूँ। हे महाभाग! आप जो भी वर चाहते हैं, वह मुझसे माँग लें॥ ४७१/२ ॥ शुक्ल बोले—आप सभी नगरनिवासियोंको छोड़कर मेरे यहाँ रूखा-सूखा भोजन करनेके लिये आये। मेरे लिये यही वरदान है, जो कि मुझे आपका दर्शन प्राप्त हुआ है। तथापि आपके कथनानुसार मैं आपकी अखण्ड भक्तिकी अभिलाषा करता हूँ॥ ४८-४९॥ हे विनायक! अन्तमें मुझे मोक्ष प्राप्त हो, जिससे कि पुनः इस संसारमें मुझे आना न पड़े। मेरा मन सांसारिक सुखोंमें नहीं लगता है॥ ५०॥ ब्रह्माजी बोले—'ऐसा ही होगा' कहकर वे विनायक पहलेकी भाँति दो हाथोंवाले बालक बन गये। उन्होंने उनके घरको इन्द्रके भवनसे भी सुन्दर, उत्तम रत्नोंसे युक्त तथा सुवर्णमय बना दिया। उन्हें उत्तमोत्तम स्वरूप, ज्ञान तथा धन-वैभव प्रदान किया। तदनन्तर उन ब्राह्मण-दम्पतीसे अनुमति लेकर बालकोंसे घिरे हुए वे विनायक अन्यत्र चले गये॥ ५१-५२॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'बालचरित्रके अन्तर्गत शुक्ल ब्राह्मणको वर प्रदान करनेका वर्णन' नामक तेईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ २३॥ चौबीसवाँ अध्याय काशीनगरीमें विनायकके द्वारा एक ही समयमें अनेक घरोंमें भोजनादि सम्पन्न करना तथा सनक-सनन्दनको अपने विविध स्वरूपोंका दर्शन कराकर विवेकज्ञानकी प्राप्ति कराना ब्रह्माजी बोले—काशीनगरीके समस्त लोग पूजाकी सामग्री तथा अनेक प्रकारकी भोजन-सामग्रीको एकत्रित करके उन विनायककी प्रतीक्षा करने लगे॥ १॥ वे लोग उस समय प्रत्येक घरमें, राजभवनमें तथा सभी अमात्योंके घरोंमें भी कश्यपनन्दन उन विनायकको ढूँढ़ने लगे॥ २॥ वे सभी लोग यही पूछ रहे थे कि क्या विनायकको कहीं देखा है? जिनके विषयमें वेद भी 'नेति-नेति' कहते हैं, क्या किसीने उन्हें देखा है? वहाँ उपस्थित सभी लोग कहने लगे कि हमने उन्हें नहीं देखा है। उस काशीनगरीकी सीमामें स्थित लोगोंने जब यह बात सुनी तो उन्होंने बताया कि वे विनायक शुक्ल नामक ब्राह्मणके घरमें आये हुए हैं। तदनन्तर सब लोग उनके घर गये। जब उन्होंने वहाँ भी विनायकको नहीं देखा तो उन्होंने उन ब्राह्मणसे पूछा, तो उन्होंने बताया कि वे यहाँसे चले गये हैं॥ ३-५॥ वे मायामय विनायक वहाँके लोगोंको वंचित करनेके लिये उत्सुक होकर साथके बालकोंको छोड़कर पीछेके दरवाजेसे आकर घरमें सो गये॥ ६॥ किसीने उन्हें गुफामें सिंहकी भाँति सोया हुआ

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क) · पृष्ठ 331, कुल 656 में से · BharatKosha