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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 330, कुल 656 में से

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३२८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 चरणोंपर गिर पड़े। आनन्दके कारण अपने नेत्रोंसे आँसू गिराते हुए उन दोनोंने गद्गद वाणीमें बोलते हुए बड़ी ही प्रसन्नताके साथ उनका आलिंगन किया और हर्षनिर्भर होकर वे दोनों नाचने लगे ॥ २७-२८ ॥ उन्हें अपनी देहकी सुध-बुध नहीं रही, इस समय क्या करना चाहिये—इसे वे जान न सके। उन दोनोंके शरीरमें रोमांच हो आया और वे अपने नेत्रोंसे आँसुओंकी धारा बहाने लगे ॥ २९ ॥ मुहूर्तमात्र बीत जानेपर जब उन्हें होश आया तो उन्होंने उन जगदीश्वरको प्रणाम किया। तदनन्तर मुनि शुक्ल उन देव विनायकसे कहने लगे—आपका 'दीनानाथ' यह जो अत्यन्त कल्याणकारी तथा पापोंका हरण करनेवाला नाम तीनों लोकोंमें विख्यात है, उसे आज आपने सार्थक कर दिया है और अपने चरणोंका दर्शन कराकर हमारा जन्म लेना भी सार्थक कर दिया है ॥ ३०-३१ ॥ आप बड़े-बड़े गगनचुम्बी भवनोंको छोड़कर हमारी इस पर्णकुटीमें आये हैं। आज मेरा वंश धन्य हो गया। मेरा जीवन धन्य हो गया। मेरा ज्ञान धन्य हो गया। मेरी तपस्या धन्य हो गयी और मेरी आयु धन्य हो गयी। तदनन्तर उन मुनिने उन विनायकदेवको कुशासनमें विराजमान कराकर उनकी पूजा की। उनके युगलचरणोंका प्रक्षालन करके उस जलको अपने सिरमें धारण किया ॥ ३२-३३ ॥ तदनन्तर गन्ध, अक्षत, पुष्पमाला, धूप, दीप, दूर्वांकुर, शमीपत्र, सुगन्धित तेल तथा शुभ केतकी पुष्प अर्पित किया। इसके अनन्तर उनके सामने अल्पमात्रामें खाद्य नैवेद्य तथा वन्य फलोंको निवेदित किया। तदनन्तर मन्त्रोंसे पवित्र की गयी पुष्पांजलि देकर और उन्हें प्रणाम करके वे मुनि लज्जित हो उठे। यह सोचकर कि किस प्रकार इन्हें हम निकृष्ट अन्न भोजनके लिये प्रदान करें! ॥ ३४-३५१/२ ॥ उनके अभिप्रायको जानकर देवाधिदेव विनायकने उन ब्राह्मणकी पत्नीसे भोजनकी याचना करते हुए कहा—हे मातः! आपके घरमें कौन-सा भोजन बना है। उसे मुझे प्रदान करें। भक्तिपूर्वक दिया गया क्षुद्र अन्न भी मुझे अमृतसे बढ़कर प्रिय लगता है और जो भोजन श्रद्धारहित होकर दम्भपूर्वक दिया जाता है, वह विषके समान हो जाता है ॥ ३६-३७१/२ ॥ तदनन्तर मुनिपत्नीने अत्यन्त लज्जाके साथ पात्रमें फैला हुआ भात और बहुतसे अन्नोंके मिश्रणसे बनायी गयी सूखी पीठीको विनायकके आगे स्थापित किया। भोजनके लिये उपस्थित उस तेल (-के समान तरल पदार्थ)-को देखकर अन्य सभी बालक विनायकपर हँस पड़े ॥ ३८-३९ ॥ विनायकदेवने वह निवेदित भोजन स्वादिष्ट पक्वान्नकी भाँति बड़े ही आदरभावसे ग्रहण किया। वे प्रत्येक ग्रासके अनन्तर जल पीकर बलपूर्वक उसे निगल रहे थे। तदनन्तर मुनिने सारा गीला भात उनके भोजनपात्रमें डाल दिया। तब वह गीला भात पात्रकी चारों दिशाओंमें फैलकर बहने लगा और वे बालक विनायक उसे रोकनेमें असमर्थ हो गये ॥ ४०-४१ ॥ तब बालक विनायकने दस भुजाओंवाला बनकर उन हाथोंसे वह सारा भात ग्रहण किया। लोगोंने आश्चर्यपूर्वक उन्हें देखा और वे हँसते हुए हाथसे ताली पीटने लगे ॥ ४२ ॥ घुटनेतक पानीमें पकाया गया यह अभूतपूर्व