भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 329, कुल 656 में से

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पृष्ठ 329

क्री०ख०-अ०२३ ] * कुमार सनक तथा सनन्दनका विनायक-दर्शनहेतु काशीनरेशके पास आना * ३२७ मेरा राज्य, ज्ञान, देह, पत्नी तथा पुत्र आदि जो कुछ भी है, वह सब धन्य हो गया। ऐसा कहकर राजाने हाथ पकड़कर उन दोनोंको अपने आसनपर बैठाया ॥ ४-५ ॥ तदनन्तर राजाने सोलह उपचारोंके द्वारा भक्तिपूर्वक उनका पूजन किया और उनके चरणोंको दबाना आदि सेवाओंके द्वारा उन्हें विश्राम कराया। वे बार-बार उन्हें प्रणाम करके इस प्रकार कहने लगे ॥ ६ १/२ ॥ राजा बोले—दण्डका त्याग किये हुए तथा नित्य निष्काम मुनियोंको कभी भी कोई कामना नहीं होती, तथापि मैं अपने तप, राज्य, कुल तथा शीलको सार्थक बनानेके लिये आप लोगोंकी सेवाकी इच्छा करता हूँ ॥ ७-८ ॥ वे दोनों बोले—महर्षि कश्यपके पुत्र विनायक जो आप्तकाम, परब्रह्मस्वरूप, लीलावतारी भगवान् आपके घरमें स्थित हैं, वे अद्भुत पराक्रमशाली हैं और नाना प्रकारके कौतुक करनेवाले हैं। उनके अद्भुत कर्मोंके विषयमें सुनकर हम दोनों उनका दर्शन करनेके लिये यहाँ आये हैं ॥ ९-१० ॥ इसके अतिरिक्त इन्द्रभवनसे यहाँ आनेका हमारा दूसरा कोई प्रयोजन नहीं है। जिसके घरमें ही कल्पवृक्ष है, वह दूसरोंसे क्या याचना करेगा ? ॥ ११ ॥ हे राजन् ! उनके चरणकमलोंमें प्रणाम करके हम अपने स्थानको चले जायँगे। उनके वहाँ आकर इस प्रकारके कहे गये वचनोंको सुनकर बालक विनायक खेल छोड़कर हाथमें मोदक लेकर वहाँ आ पहुँचे। उन्होंने अपने हाथमें पाँच खाद्य पदार्थोंसे बना हुआ भक्षणीय मोदक लीलापूर्वक धारण किया हुआ था ॥ १२-१३ ॥ राजाने उन दोनोंको मधुर हास्य करते हुए बालक विनायकको दिखाया और कहा—वे ये देव विनायक आ गये हैं, जिनके दर्शनोंके लिये आप लोग उत्सुक हैं। वे आ गये हैं, अब आप लोगोंका जो अभीष्ट करणीय है, उसे सम्पन्न करें। उनका दर्शन करके वे दोनों मुनि सनक तथा सनन्दन आपसमें कहने लगे ॥ १४-१५ ॥ इसने निश्चित ही मुनिश्रेष्ठ कश्यपजीको भी दूषित कर डाला है; क्योंकि उनका पुत्र होते हुए भी इसने अपने सदाचारका परित्याग कर दिया है ॥ १६ ॥ स्पृश्य तथा अस्पृश्यके विषयमें इसका कोई विचार नहीं है और न इसे भक्ष्याभक्ष्यकी विधि ही ज्ञात है। इसके दर्शन करने तथा इसका स्पर्श करनेमें भी निश्चित ही महान् दोष है ॥ १७ ॥ यह अपने ब्राह्मणवर्णोचित नियमोंका परित्यागकर क्षत्रियके घरमें किसलिये रह रहा है ? स्वधर्ममें स्थित हम लोगोंका इसके दर्शनसे क्या फल है ? ॥ १८ ॥ उस समय राजाके समीप स्थित उन विनायकदेवने उन दोनोंके वचनोंको सुना। तब वाक्यार्थको जाननेवाले साक्षात् दूसरे बृहस्पतिके समान वे विनायक बोल पड़े। हे मुनियो ! व्यर्थ ही श्रम करनेवाले आप लोगोंका ज्ञान कहाँ चला गया ? आप लोग स्वर्गलोकका परित्यागकर एक सामान्य व्यक्तिकी भाँति यहाँ कैसे आये हैं ? ॥ १९-२० ॥ तदनन्तर मायामय देव विनायककी मायासे अत्यन्त मोहित वे दोनों कुमार विनायकका इस प्रकारका वचन सुनकर राजासे कहने लगे— ॥ २१ ॥ हमें अनुज्ञा प्रदान कीजिये, हम अपने आश्रम- मण्डलको जाते हैं। तब नृपश्रेष्ठ काशीनरेश उन दोनोंके प्रति दृढ़ भक्तिसे प्रेरित होकर उन दोनोंसे बोले—आप मेरी बात सुनें और कुछ देरके लिये ठहर जायँ। पुनः उन्होंने भक्तिपूर्वक प्रार्थना की कि आपलोग स्नान करके भोजन करें, तदनन्तर ही जायँ ॥ २२-२३ ॥ राजाकी प्रार्थना सुनकर वे दोनों मुनिश्रेष्ठ बोले— राजाका अन्न भक्षण करना वर्जित है, अतः हम दोनों यहाँसे जा रहे हैं ॥ २४ ॥ तदनन्तर राजाकी अनुमति प्राप्तकर वे दोनों मणिकर्णिकातीर्थमें गये। इधर बालक विनायक अपने साथ आ रहे सभी बालकोंके साथ प्रसन्नतापूर्वक क्रीडा करते हुए स्नान करनेके अनन्तर उन शुक्ल नामक ब्राह्मणकी भक्तिका आदर करके उनके घरमें उसी प्रकार प्रविष्ट हुए, जैसे कि कोई गौ अपने बछड़ेके पीछे दौड़ती है, जैसे माता रोते हुए शिशुके समीप जाती है और जैसे कौरवोंकी सभाके मध्यमें स्थित शरणागत द्रौपदीके पास भगवान् कृष्ण गये थे ॥ २५-२६ १/२ ॥ उन विनायकदेवका दर्शन करके वे दम्पती उनके

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