श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 328, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें३२६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- विनायकके निमित्त महोत्सवमें संलग्न रहनेके कारण लोगोंने उन्हें अपने-अपने घरसे वापस लौटा दिया ॥ ४० ॥ उन्हें भिक्षामें जो कुछ भी मिला, उसीसे सन्तुष्ट हुए उन्होंने अपनी भार्यासे आकर कहा—'हे धर्मपत्नी ! सुनो, आज नगरीके प्रत्येक घरमें मैं भिक्षा दिये बिना ही लौटा दिया गया ॥ ४१ ॥ पृथ्वीका भार हरण करनेके लिये उद्यत जो विनायक मुनि कश्यपके घरमें अवतरित हुए हैं, वे ही आज पूजा ग्रहण करनेके लिये प्रत्येक घरमें आयेंगे ॥ ४२ ॥ यदि वे पूजा ग्रहण करनेके लिये हमारे घर भी आयेंगे तो तुम उनकी पूजाकी व्यवस्था करो।' इसपर विद्रुमा बोली—'दूसरे घरोंमें महान् पूजाको छोड़कर वे आपके घरमें अन्न ग्रहण करने कैसे आयेंगे ? ॥ ४३ ॥ अथवा आप-जैसे नितान्त निर्धनोंके घरमें वे कैसे आयेंगे, हे मुने ! गन्ध, पुष्प, बासी पक्वान्न, कन्दमूल, फल आदि जो कुछ भी अल्प मात्रामें उचित-अनुचित होगा, उसीसे उनका सत्कार किया जायगा अथवा हे प्रभो ! उनका आपके घरमें आनेका क्या प्रयोजन हो सकता है ?' ॥ ४४-४५ ॥ अपनी प्रिय पत्नी विद्रुमाके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर वे मुनि पुनः अपनी पत्नीसे बोले—'दीनों तथा अनाथोंके स्वामी वे प्रभु विनायक मुझे अपना भक्त समझते हैं। वे देव विनायक भक्तिप्रिय हैं, वे प्रभु तनिक भी लोभके वशीभूत नहीं होते। वे जल, पत्र-पुष्पसे ही प्रसन्न हो जाते हैं ॥ ४६-४७ ॥ दम्भपूर्वक समर्पित की गयी सुवर्णकी अकूत धनराशिसे भी वे प्रसन्न नहीं होते।' पतिके ऐसे वचन सुनकर विद्रुमाने पुनः कहा— ॥ ४८ ॥ यदि ऐसी बात है तो जो कुछ पकाया गया अन्न है, वही उन्हें निवेदित करें। तब विद्रुमाने अठारह प्रकारके धान्योंको पीसकर उसे पकाया ॥ ४९ ॥ पुराने चावलोंका अधिक जलवाला भात बनाया। वे प्रतिदिन एक मुट्ठीभर आटेको दोनेमें रखकर शेषका भोजन बनाकर उसे ग्रहण करती थीं ॥ ५० ॥ प्रतिदिन मुट्ठीभर बचाये गये उस आटेको बेचकर प्राप्त धनसे वे वस्त्र खरीदकर लायीं। गन्ध, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप, महाआरती, वन्य फल तथा वल्कल वस्त्रोंको उन्होंने एक स्थानपर स्थापित किया। भोजनके अनन्तर मुखको सुगन्धित करनेके लिये उन्होंने सूखे आँवलेके टुकड़ोंको भी रखा ॥ ५१-५२ ॥ जलसे अच्छी प्रकार सींचे गये अपने आँगनमें उन्होंने कुशोंको फैलाकर ध्वजकी स्थापना की और आसनको बिछाया। तदनन्तर वे मुनि सर्वप्रथम नैवेद्यको स्थापित करके बलिवैश्वदेव करनेके अनन्तर ध्याननिष्ठ हो गये ॥ ५३ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें बालचरितके अन्तर्गत बाईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २२ ॥ तेईसवाँ अध्याय कुमार सनक तथा सनन्दनका बालक विनायकके दर्शनके लिये काशीनरेशकी सभामें आना, बालक विनायकका शुक्ल नामक ब्राह्मणके घरमें उसका आतिथ्य स्वीकार करने जाना तथा शुक्ल-दम्पतीको विविध वरोंकी प्राप्ति ब्रह्माजी बोले—वे बालक विनायक बालकोंके साथ बड़े ही कौतूहलके साथ खेल खेलने लगे। राजा भद्रासनपर आसीन होकर सभी जनोंके साथ वारांगनाओंका नृत्य देखने लगे। उसी समय देवलोकसे सनक तथा सनन्दन दो कुमार राजाकी उस रमणीय सभामें आये ॥ १-२ ॥ उन दोनोंकी सूर्य एवं अग्निके समान दीप्तिसे वह सम्पूर्ण सभा दीप्तिमान् हो उठी। अकस्मात् उन दोनों कुमारोंको आया हुआ देखकर वे राजा अपने आसनसे उठ खड़े हुए ॥ ३ ॥ उन दोनोंके चरणकमलोंमें अपना सिर रखकर राजाने उन्हें साष्टांग प्रणाम किया और वे दोनों हाथ जोड़कर कहने लगे—आज मेरा कुल धन्य हो गया।