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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 327, कुल 656 में से

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पृष्ठ 327

क्री०ख०-अ०२२ ] * काशीवासियोंकी विनायकको अपने-अपने घर ले जानेकी राजासे प्रार्थना * ३२५ लोगोंसे बोले - ॥ १८ ॥ विनायक बोले- आप-जैसे महान् लोग मुझे ले जानेके लिये क्यों प्रार्थना कर रहे हैं ? मैं मुनिका पुत्र एक सामान्य बालक हूँ। मेरी पूजाके लिये बहुत-सा धन व्यय करनेवाले आप लोगोंको मेरी पूजासे क्या फल मिलेगा, इसे मैं नहीं जान पा रहा हूँ ॥ १९-२० ॥ जब कभी विवाह, यज्ञोपवीत, यज्ञ अथवा कोई महोत्सव होगा या देवकार्य अथवा पितृकार्य होगा, तब मैं आप लोगोंके घर चलूँगा ॥ २१ ॥ आप लोग असंख्य हैं और मैं अकेला हूँ, फिर मैं आप सबके घर कैसे जा सकता हूँ? आप-जैसे लोग दूध देनेवाली गायको छोड़कर जिस गौने दूध देना बन्द कर दिया है, ऐसी वकेशिनी गौको क्यों दुहना चाहते हैं ? जिस प्रकार माँगनेवाला कोई व्यक्ति कल्पवृक्षको छोड़कर सामान्य वृक्षसे अपनी मनोभिलषित वस्तुको माँगे अथवा कोई तुच्छ वस्तु माँगे, उसी प्रकार आपलोग भी उत्सुक हो रहे हैं ॥ २२-२३॥ ब्रह्माजी बोले- विनायकके वचनोंको सुनकर प्रधान-प्रधान नागरिक पुनः कहने लगे। राजाके पुत्रके इस विवाहके सम्पन्न हो जानेपर आप एक क्षण भी यहाँ नहीं रुकेंगे। राजाकी कृपासे हमें आपका दर्शन हुआ है, अब आप हमारी भक्तिको सफल बनायें। आप सर्वथा पूर्णकाम हैं, सृष्टि, स्थिति तथा संहार करनेवाले हैं, सर्वान्तर्यामी हैं, सबकी मनोवृत्तिको जाननेवाले हैं, कर्तुं (करनेमें) अकर्तुं (न करनेमें) एवं सर्वथा अन्यथाकर्तुं (विपरीत करनेमें) समर्थ हैं, फिर आप चिदानन्दको हमारे द्वारा की गयी पूजासे कोई प्रयोजन नहीं है। 'देव विनायक' भक्तिप्रिय हैं, वेदोंके इस वचनको आप मिथ्या न करें ॥ २४-२७ ॥ उन नागरिक जनोंके वचनोंको सुनकर विनायक उनसे बोले- 'आप लोगोंकी यदि ऐसी भक्ति है, तो मैं राजाकी आज्ञा मिलनेपर आप लोगोंके घर चलूँगा' ॥ २८ ॥ विनायककी यह बात सुनकर वे सभी नगरवासी अपने-अपने घरको चले गये। घर पहुँचकर किसीने विनायकके स्वागतके लिये मण्डपोंका निर्माण किया, किसीने वस्त्रोंसे आच्छादितकर [विशेष प्रकारके] मण्डप बनाये। उन्होंने श्रद्धा-भक्तिसे तोरणद्वार बनाये, जो दर्पणोंसे सुशोभित तथा अद्भुत थे। अत्यन्त मूल्यवान् पात्र, सुगन्धित द्रव्य, चन्दन-कस्तूरीसे युक्त सुगन्धित द्रव्य, फल तथा विभिन्न प्रकारके वस्त्र एवं आभूषण और पंचामृतसे समन्वित विविध पक्वान्न वहाँ स्थापित किये। साथ ही विविध प्रकारकी मुक्ताकी मालाओंसे विभूषित मूर्तियोंको भी वहाँ स्थापित किया। इस प्रकार सभी लोग इन सामग्रियोंको अपने घरोंमें सुसज्जितकर अत्यन्त प्रफुल्लित थे ॥ २९-३२१/२ ॥ काशीनगरीकी सीमाके पास वेद-शास्त्रोंके ज्ञाता एक ब्राह्मण निवास करते थे। उनका नाम शुक्ल था। उनकी वृत्ति - आजीविका अत्यन्त पवित्र थी। वे शान्त प्रकृतिके, इन्द्रियोंपर संयम रखनेवाले, क्षमाशील, श्रौत तथा स्मार्तकर्मोंमें परायण और ब्रह्मनिष्ठ थे, अतिथियोंका सत्कार करना उन्हें अत्यन्त प्रिय था ॥ ३३-३४ ॥ उनकी पत्नीका नाम विद्रुमा था, जो महाभाग्यशालिनी थीं, वे सब प्रकारकी इच्छाओंसे रहित और ज्ञानसे सम्पन्न थीं। उनके शरीरके सभी अंग बहुत ही सुन्दर थे ॥ ३५ ॥ धनसे हीन होनेपर भी वे ज्ञाननिष्ठ थीं। पतिव्रता थीं और पतिको प्राणोंसे भी अधिक प्रिय माननेवाली थीं। उनके घरसे ऊपरकी ओर देखनेपर ताराओंसे सुशोभित आकाशमण्डल स्पष्ट दिखलायी पड़ता था ॥ ३६ ॥ उनके गृहमें सोने, चाँदी, ताँबे तथा पीतलके पात्र नहीं थे। विद्रुमा गौरवर्णकी थीं, वे वल्कल वस्त्रोंको धारण करनेवाली तथा तेजकी दीप्तिसे अत्यन्त सुशोभित रहती थीं। उनकी देहकान्तिसे व्याप्त रहनेके कारण दृश्यमान वस्तु भी दिखलायी नहीं पड़ती थी। अपने पतिकी सामान्य-सी आजीविकासे सन्तुष्ट वे विद्रुमा घरकी शोभाको बढ़ानेवाली थीं ॥ ३७-३८ ॥ शुक्ल नामके वे ब्राह्मण अपनी पत्नीकी सन्तोषकी प्रवृत्ति तथा उसके विनयी स्वभाव और सेवासे बहुत प्रसन्न रहते थे। वे भोजनसे रहित होनेपर भी अपनी आत्मामें स्थित तथा ज्ञाननिष्ठ रहते थे ॥ ३९ ॥ एक बार जब वे भिक्षाके लिये निकले तो