श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 326, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें३२४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
बाईसवाँ अध्याय
काशीनगरीके निवासियों तथा शुक्ल नामक ब्राह्मणद्वारा विनायकको अपने-अपने घर ले जानेके लिये राजासे प्रार्थना करना और स्वीकृति प्राप्तकर विनायकके स्वागतकी तैयारी करना
ब्रह्माजी बोले—दूसरे दिनकी बात है, जब | है, वह इन्हें अपने घर ले जाकर इनकी पूजा करे और काशीनरेश प्रातःकालीन स्नान-सन्ध्या आदि नित्यकर्मोंमें | इन्हें भोजन भी कराये ॥ ८-९१/२ ॥ लगे हुए थे, उस समय सभी नगरवासी आपसमें यह | हे नागरिको ! सत्त्व, रज तथा तम—इन तीनों तर्क-वितर्क करने लगे कि ये विनायक न तो देवता हैं | गुणोंके आधारपर लोग सात्त्विक, राजस तथा तामस तीन और न मनुष्य ही हैं अथवा यदि ये देवता न होते तो | प्रकारके होते हैं। जो दुष्ट लोग हैं, वे देवताओंकी परीक्षा इन्होंने इन्द्र तथा विष्णुके द्वारा भी अजेय तथा अन्य | लेते हैं और जो पुण्यात्मा होते हैं, वे उनकी पूजा करते देवताओंके लिये भी सर्वथा अपराजेय पाँच महान् बल- | हैं। कुछ लोग इन विनायककी निन्दा करते हैं और कुछ शाली एवं पराक्रमी दैत्योंका वध कैसे किया ? ॥ १-२ ॥ | इनकी प्रशंसा करते हैं ॥ १०-११ ॥ यदि ये देवता ही हैं, तो [बालक बनकर] | जिस व्यक्तिका जैसा स्वभाव होता है, वह वैसा बालकोंके मध्य क्रीडा कैसे कर रहे हैं? इस प्रकार तर्क- | ही व्यवहार करता है। जैसे घिसे जानेपर भी चन्दन वितर्क करके वे सभी पुरवासी राजाके दर्शनके लिये | अपने सुगन्धरूपी स्वभावको नहीं छोड़ता है और आये। राजाने भी भद्रासनमें विराजमान होकर उन सभीसे | कस्तूरीपंकसे सना होनेपर भी प्याज अपने स्वाभाविक कहा—'आप लोगोंका जो कार्य हो, उसे बतायें, वह | गुण दुर्गन्धको नहीं छोड़ता। इन मुनिपुत्रपर यदि आपकी निश्चित ही पूर्ण होगा ॥ ३-४ ॥ | अनन्य भक्ति हो तो अपनी प्रसन्नताके लिये तथा इन्हें हे नगरनिवासियो ! आप लोग प्रातःकाल ही किस | भोजन करानेके लिये शीघ्र ही अपने घर ले जायें और प्रयोजनसे यहाँ आये हैं?' इसपर वे बोले—'हमारे | इनकी पूजा करें। इन्हें शक्ति-परीक्षणके लिये अपने घर निवेदनयोग्य अभीष्टके अतिरिक्त और अन्य कारण | न ले जायें, ये मेरे माता-पिताके समान हैं ॥ १२-१४ ॥ आनेका नहीं है। आप जिन मुनिपुत्र विनायकको यहाँ | मैं लोगोंसे कैसे कहूँ कि वे इन्हें अपने घर ले जाकर लाये हैं, हमारे द्वारा कहीं भी, कभी भी कुछ भी उनकी | इनकी पूजा करें। इनकी दृढ़ शक्ति देखकर मेरी इनपर सेवा-शुश्रूषा नहीं हो सकी है ॥ ५-६ ॥ | विशेष भक्ति हो गयी है। यदि इन्होंने मेरे नगरकी रक्षा न आपने तो अपने घरमें स्थित उनकी अनेक बार | की होती तो कहाँ आप होते और कहाँ मैं ? ॥ १५१/२ ॥ पूजा की है, आपके घरमें जो कुछ भी आता है, उसे | राजाके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर नगरके आप हमारे घर [भी] भेज देते हैं, किंतु बड़े आश्चर्यकी | लोग पुनः बोले—हे कल्याणकर्ता राजन् ! आप जैसा बात है कि हे राजन् ! फिर आपने इन विनायकको क्यों | कह रहे हैं, वह ठीक ही है, अनुचित नहीं है। हे नहीं हमारे पास भेजा ?' ॥ ७१/२ ॥ | राजन् ! हमारी कार्यसिद्धि जिस प्रकार हो, आप वैसा राजा बोले—हे नागरिको ! आप लोगोंने ठीक ही | ही करें ॥ १६-१७ ॥ कहा है कि जो वस्तु आपसमें बाँटकर खायी जाती है, | हम लोग इस बालकको अपने घर ले जाकर वह यदि विष भी हो तो अमृतके समान हो जाती है। | इसकी यथायोग्य पूजा करेंगे। इसी बीच संसारके इसके विपरीत अकेले खानेपर अमृत भी विष हो जाता | गुरुरूप सबके साक्षीस्वरूप वे बालक विनायक उन है। ये चाहे देवता हों या मनुष्य, इनपर जिसकी भक्ति | सबके अन्तर्भावको जानते हुए सभामें स्थित उन