भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 325, कुल 656 में से

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पृष्ठ 325

क्री०ख०-अ०२१] * भ्रमरा राक्षसीका अदितिका रूप धारणकर बालक विनायकके पास आना * ३२३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 लोगोंने दया करके उस बालकको अन्यत्र सुलानेके लिये उठानेका निश्चय किया। उस समय कोई भी उस बालकको न उठानेमें समर्थ हुआ, न हिलाने-डुलानेमें ही। कुछ दूसरे लोग उस कमललोचन बालक विनायककी प्रार्थना करने लगे ॥ ५०-५१ ॥ 'अरे बालक! दया करो, तुम्हारी ये माता मर जायगी।' वह स्त्री अपने पैरों, हाथों तथा गर्दनको हिलाने लगी। लोग बोल उठे—'अरे बालक! यह तुम क्या कर रहे हो, अपने पितासे तुम क्या कहोगे?' लोग ऐसा कह ही रहे थे कि वह निशाचरी मृत्युको प्राप्त हो गयी ॥ ५२-५३ ॥ उसकी देहने दस योजनकी भूमिको आच्छादित कर लिया। उस अत्यन्त भयानक निशाचरीको देखकर कुछ लोग भाग उठे। कौतूहलभरे कुछ लोग उसे देखनेके लिये दौड़ पड़े। उस निशाचरीको देखकर सभी लोग तथा काशिराज भी आश्चर्यचकित हो गये ॥ ५४-५५ ॥ बालकोंकी हत्या कर डालनेवाली यह निशाचरी कपटवेष धारणकर कैसे यहाँ आ पहुँची ? हम लोग तो इसे महर्षि कश्यपकी पत्नी ही समझ रहे थे, न कि राक्षसी! इस बालकके अद्भुत ज्ञान तथा सामर्थ्यको हमने देख लिया-ऐसा कहते हुए वे सभी लोग प्रसन्नतापूर्वक उन (विनायक)-के समीपमें गये ॥ ५६-५७ ॥ उस निशाचरीके ऊपर बैठे बालक विनायकको उठाकर वे कहने लगे, 'यह तो फूलके समान भारवाला है', साथ ही वे यह भी बोले कि 'इस दुष्ट स्वरूपवाली दुष्ट निशाचरीको यहाँसे दूर हटाओ ॥ ५८ ॥ जो दूसरेके अनिष्टकी कामना करता है, वह स्वयं मृत्युको प्राप्त होता है।' तदनन्तर काशिराज एवं अन्य जनोंने तथा ऋषियों एवं लोकपालोंने भी विनायकदेवकी भक्तिपूर्वक स्तुति की ॥ ५९ ॥ सभी बोले- हे देव विनायक ! आप देवताओं, मनुष्यों, नागों, राक्षसों, यक्षों, गन्धर्वों, ब्राह्मणों, हाथियों, घोड़ों, रथों तथा पक्षियोंके एकमात्र स्वामी हैं। भूतकाल, भविष्यत् तथा वर्तमान-तीनों कालों, बुद्धि, समस्त इन्द्रियों, हर्ष, शोक, दुःख, सुख, ज्ञान, मोह, अर्थ, समस्त कार्यों और हानि तथा लाभके आप ही स्वामी हैं। स्वर्ग, पाताल आदि लोकों, पृथ्वी, समुद्र, नक्षत्रों, ग्रहों, पिशाचों, लताओं, वृक्षों, नदियों, समस्त पुरुषों एवं स्त्रियों और बालकोंके स्वामी आप ही हैं। सृष्टि, स्थिति तथा संहार करनेवाले आपको बार-बार नमस्कार है ॥ ६०-६४ ॥ पशुओंके पति आपको नमस्कार है, तत्त्वका ज्ञान प्रदान करनेवाले आपको नमस्कार है। विष्णुस्वरूप आपको नमस्कार है, रुद्ररूप आपको नमस्कार है ॥ ६५ ॥ ब्रह्मारूप आपको नमस्कार है। अनन्त स्वरूपवाले आपको नमस्कार है। मोक्षके कारणरूप आपको नमस्कार है। विघ्नोंका हरण करनेवाले आपको नमस्कार है ॥ ६६ ॥ अभक्तोंका विनाश करनेवाले आपको नमस्कार है। भक्तोंको प्रिय लगनेवाले अथवा भक्तोंको प्रिय माननेवाले आपको नमस्कार है। हे अधिदैव ! हे अधिभूतात्मन् ! आप तीन प्रकारके तापोंका हरण करनेवालेको नमस्कार है। सभी प्रकारके उपद्रवोंको विनष्ट करनेवाले तथा लीलास्वरूप धारण करनेवालेको नमस्कार है। आप सर्वान्तर्यामीको नमस्कार है। आप सर्वाध्यक्षको नमस्कार है ॥ ६७-६८ ॥ देवी अदितिके गर्भसे उत्पन्न हे देव विनायक ! आपको नमस्कार है। परब्रह्मस्वरूप महर्षि कश्यपके पुत्रको नमस्कार है। अप्रमेय मायासे समन्वित पराक्रमवाले, मायास्वरूपी, मायायुक्त जनोंको मुग्ध करनेवाले, अपरिमित मायाका विनाश करनेवाले और मायाके महान् आश्रयस्वरूप आपको बार-बार नमस्कार है ॥ ६९-७० ॥ ब्रह्माजी बोले-इस प्रकारसे स्तुति करनेके अनन्तर उस राक्षसीको काटकर टुकड़े-टुकड़े करके नगरसे दूर ले जाकर फेंककर वे सभी प्रसन्नतापूर्वक अपने-अपने घरोंको गये। हे अनघ ! तीनों प्रकारके उपद्रवोंको नष्ट करनेवाले इस स्तोत्रका जो पाठ करता है, उसको महान् उत्पात, विघ्नबाधा तथा भूतोंसे भय नहीं होता। जो तीनों सन्ध्याओंमें इस स्तोत्रको पढ़ता है, वह सभी कामनाओंको प्राप्त कर लेता है और देव विनायक सदा उसकी रक्षा करते हैं ॥ ७१-७३ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें बालचरितके अन्तर्गत 'अदितिरूपा राक्षसीके वधका वर्णन' नामक इक्कीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २१ ॥

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