भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 324, कुल 656 में से

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पृष्ठ 324

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[पृष्ठ शीर्ष] ३२२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐


[बायाँ स्तम्भ / Left Column]

उसके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर उसके प्रति सम्मानका भाव दिखलाती हुई रानीने बड़ी शीघ्रतासे उस बालकको खोजनेके लिये दूतोंको प्रेषित किया। कुछ दूसरे लोगोंने काशिराजको बतलाया कि महर्षि कश्यपजीकी भार्या यहाँ आयी हुई हैं। वे स्नान करके घरमें आये और उसे देखकर अत्यन्त प्रसन्न हुए॥ २८-२९॥ अत्यन्त श्रद्धाभक्तिके साथ हाथ जोड़कर प्रणामकर राजा बोले—'आज मेरा जन्म लेना धन्य हो गया, मेरी विद्या धन्य हो गयी, मेरी दृष्टि, मेरा राज्य, मेरे माता- पिता और मेरा तप धन्य हो गया। मैंने आज देवताओंकी माता, संसारको उत्पन्न करनेवाली शक्तिस्वरूपाका दर्शन किया है। आपके गुणोंका सम्यक् रूपसे वर्णन करनेकी मेरी शक्ति नहीं है॥ ३०-३१॥ आपका यह बालक विनायक इन्द्रसे भी अधिक बलशाली है। उसने अनेक प्रकारके प्रशस्त कर्म किये हैं और अनेकों राक्षसोंका वध किया है। उस बालक विनायकके गुणोंका वर्णन करनेमें मेरी अल्प सामर्थ्य अवश्य ही समर्थ नहीं है॥ ३२-३३॥ हे माता! आप क्षणभर यहाँ विश्राम करें। आज मेरे महान्‌से भी महान् भाग्यका उदय हुआ है। इसने योगमायाके प्रभावसे अनेकों दानवोंका वध किया है, किंतु इसके शरीरमें बिलकुल भी चोट नहीं लगी। आपका यह बालक यहाँ सुखपूर्वक रह रहा है। किस कारणसे आपका यहाँ आगमन हुआ है, आप यहाँ आ ही गयी हैं तो अब क्षणभरके लिये यहाँ रुकें। पुत्रका विवाह सम्पन्न हो जानेपर मैं आप दोनोंको आपके घर पहुँचा दूँगा'॥ ३४-३५१/२॥ **वह बोली—**हे राजन्! आप यह क्या बोल रहे हैं, इसके वियोगसे मुझे महान् दुःख हुआ है, मुझे कहीं भी कुछ भी सुख नहीं मिला है॥ ३६१/२॥ **ब्रह्माजी बोले—**जब वह ऐसा कह ही रही थी कि उसी समय वे बालक विनायक वहाँ आ पहुँचे॥ ३७॥ सभी बालकोंने विनायकको यह कहकर भेजा कि तुम्हारी माता आयी हुई हैं। तदनन्तर आँखोंमें आँसू भरी हुई उस भ्रमराने बालक विनायकका आलिंगन किया और प्रसन्नतापूर्वक बोली-॥ ३८॥


[दायाँ स्तम्भ / Right Column]

हे अतिनिष्ठुर बालक! तुम मुझे छोड़कर चिरकालसे यहाँ रह रहे हो, तुम्हारे वियोगसे मैं अत्यन्त कष्टमें हूँ और सब कुछ छोड़कर यहाँ आयी हूँ॥ ३९॥ मैंने अपने जीनेकी आशा छोड़कर तुम्हें प्राप्त करनेके लिये तपस्या की थी। मैंने बड़े ही कष्टसे तुम्हें प्राप्त किया है, मेरे उन कष्टोंको भगवान् ही जानता है। तुम्हारे बिना मेरे लिये एक क्षणका समय भी युगके समान हो गया था, इस प्रकारसे उस भामिनीने अत्यन्त दुष्ट भावसे बड़े ही मधुर शब्दोंमें उनसे कहा॥ ४०-४१॥ तदनन्तर अत्यन्त स्नेहके वशीभूत हो उसने बालक विनायकको अपने कटिदेशमें बैठाया, बालक विनायकने भी उसके प्रयत्नोंको जानकर उसके अपराधको समझते हुए अपने गूढ़ अभिप्रायसे उससे पहले यह कहा कि तुम मेरे लिये क्या लायी हो? उसके इस प्रकार कहते ही उसने बालक विनायकको एक लड्डू प्रदान किया॥ ४२-४३॥ उस लड्डूके खा जानेपर उसने महान् विष मिला हुआ दूसरा लड्डू बालकको खानेके लिये दिया। उस लड्डूको भी खा जानेपर बालक विनायकने बलपूर्वक उससे एक और लड्डू माँगा॥ ४४॥ तदनन्तर काशिराज और उनकी भार्याने उनसे प्रार्थना करते हुए कहा—'हे मातः! उठिये-उठिये, इस बालकके साथ आप भोजन कीजिये।' जब वह उठनेको हुई तो बालक विनायकने पर्वतराज हिमालयके समान भारी शरीरवाला बनकर उसे जोरसे दबा दिया, इससे वह अत्यन्त व्याकुल हो उठी॥ ४५-४६॥ वह कहने लगी 'अरे बालक! मुझे छोड़ो-छोड़ो, मैं तो तुम्हारी माता हूँ। मैं स्नेहके पाशमें बँधी हुई बहुत समयके बाद तुम्हें देखने तुम्हारे पास आयी हूँ॥ ४७॥ तुम मुझे एक पर्वतके समान दबाकर क्यों चूर-चूर करनेमें लगे हो?' वह अपने हाथोंसे बालकको हटाने लगी, किंतु वह बालक विनायक उस समय सो गया और अपने हाथों तथा पैरोंको फैलाकर जोर-जोरसे श्वास लेने तथा छोड़ने लगा। तदनन्तर काशिराजने भारसे दबी हुई उस व्याकुल स्त्रीको उठनेसे रोका॥ ४८-४९॥ इस बालककी निद्रा इतनी जल्दी भंग मत करो, आप तो इसकी स्नेहमयी माता हैं, उस समय कुछ दूसरे