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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

१७२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- परायण राजा हुआ। उसने अपने तेजसे समुद्रपर्यन्त सम्पूर्ण पृथिवीका पालन किया। उसके गुणोंके वशीभूत होकर देवता लोग नित्य उसकी सभामें स्थित रहते थे॥५१-५२॥ दैवयोगसे किसी समय भृगुमुनि उसके भवनमें आये। तब राजाने उठकर अत्यन्त आदरपूर्वक उन्हें श्रेष्ठ आसनपर बैठाकर गुरुके समान उनका पूजन किया। तदनन्तर मुनिश्रेष्ठ भृगु जब भोजनकर [अपने आसनपर] स्थित हुए तब राजाने कहा— ॥ ५३-५४॥ राजा बोले—हे भगवन्! हे सम्पूर्ण तत्त्वोंके जाननेवाले! मैं कुछ पूछता हूँ, उसे बतलायें। मैं पूर्वजन्ममें कौन था और मैने कौन-सा सुकृत (पुण्य कार्य) किया था, जिसके कारण मुझे ऐसा कण्टकरहित (शत्रुहीन) राज्य प्राप्त हुआ? ऐसा राज्य न तो किसी नृपतिको प्राप्त हुआ और न ही आगे किसीको प्राप्त होगा॥५५-५६॥ मैं गन्धर्वों, नागों, राक्षसों और देवताओंका भी पूज्य हूँ; हे मुने! कुबेरकी सम्पत्तिसे तुलना करनेवाली मेरी सम्पत्तिको देखिये। तीनों लोकोंमें जो कुछ भी रत्नसदृश अर्थात् सर्वश्रेष्ठ है, उसे मैं अपने तेजसे यहाँ ले आया हूँ। जिस-जिस पदार्थकी मैं इच्छा करता हूँ, उस-उसको मैं अपने भवनमें स्थित देखता हूँ॥ ५७-५८॥ हे प्रभो! किस कर्मसे यह सब मुझे प्राप्त हुआ, उसे बताइये। हे पुण्यवानोंमें श्रेष्ठ! मैं उस पुण्य कार्यको पुनः करना चाहता हूँ॥५९॥ भृगुजी बोले—हे नृपश्रेष्ठ! मैं योगबलसे बतलाता हूँ—तुम पूर्वजन्ममें पवित्र आचरणवाले दुर्बल क्षत्रिय थे॥६०॥ तुम अपने परिवारका भरण-पोषण करनेके लिये अनेक प्रकारके कर्म किया करते थे, परंतु तुम्हारे द्वारा किया जानेवाला कर्म फलप्रद नहीं होता था ॥ ६१॥ तब भार्या और सन्तानोंके निष्ठुर वाक्योंसे अत्यन्त पीड़ित होकर पत्नी और पुत्रोंसे बिना बताये तुम गहन वनको चले गये ॥ ६२॥

वहाँ सभी दिशाओंमें भ्रमण करते हुए तुमने सिद्धासनमें विराजमान और श्रेष्ठ मुनियोंसे सेवित [मुनिश्रेष्ठ] सौभरिको देखा ॥ ६३॥ वे शिष्योंको दुःखोंका नाश करनेवाली महाविद्याका उपदेश दे रहे थे। हे नृप! उन दिव्यर्षि सौभरि तथा अन्य ऋषिगणोंको देखकर तुम दण्डकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़े। तब उन सबके द्वारा तुम्हारा अभिनन्दन किया गया और मुनिद्वारा प्रस्तुत किये गये सुन्दर आसनपर तुम बैठ गये। तदनन्तर अवसर पाकर तुमने उन दिव्य मुनिसे आदरपूर्वक इस प्रकार पूछा— ॥ ६४-६५१/२ ॥ क्षत्रियने कहा—हे स्वामिन्! हे मुने! मैंने इस संसारके दुःखोंसे बहुत-अधिक कष्ट पाया है। पत्नी, सन्तान और मित्रोंके वचनरूपी बाणोंसे अत्यन्त पीड़ित हूँ, फिर भी उन निष्ठुर सुहृदोंके प्रति मेरे मनमें वैराग्य नहीं होता। हे मुने! मैं सर्दी-गर्मी, भूख-प्यास [आदि द्वन्द्वों]-से भी बहुत पीड़ित हूँ। मुझे इस दुःखरूपी सागरसे पार करानेवाला कोई उपाय बतलायें ॥ ६६-६८॥ शिवजी बोले—[हे स्कन्द !] उसके इस प्रकारके वचन सुनकर करुणापूर्ण चित्तवाले सौभरिमुनिने राजाके दुःखका विनाश करनेवाले उपायका चिन्तन किया; तत्पश्चात् सम्पूर्ण पापोंका विनाश करनेवाले उस उपायको उस क्षत्रियसे कहा— ॥ ६९१/२ ॥ ऋषि बोले—[हे क्षत्रिय!] मैं जिस व्रतको कह रहा हूँ, उसे स्थिर मनसे करो ॥ ७० ॥ इसके अनुष्ठानमात्रसे सम्पूर्ण दुःखोंका नाश हो जाता है। यह ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों और ब्रह्मर्षियोंद्वारा किया गया है ॥ ७१ ॥ इससे वे सम्पूर्ण दुःखोंसे मुक्त हो गये और उन्होंने उत्तमोत्तम सिद्धि प्राप्त की। वरदायक गणेशजीका यह व्रत धर्म-अर्थ-काम और मोक्ष प्रदान करनेवाला है ॥ ७२ ॥ क्षत्रियने कहा—वे गणेशजी कौन हैं? उनका शील कैसा है? उनका रूप कैसा है? उनका स्वभाव कैसा है? उनके क्या कर्म हैं? वे कैसे उत्पन्न हुए? यह सब यदि मेरे सुननेयोग्य हो और यदि मुझपर आपकी Kalyana Visheshank 2021_Section_7_1_Back

उ०ख०-अ०५१ ] * गणेशचतुर्थीव्रतानुष्ठानविधिके वर्णनके प्रसंगमें राजा कर्दमके पूर्वजन्मकी कथा * १७३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 कृपा हो तो मुझसे कहिये ॥ ७३ ॥ ऋषि बोले-जो नित्य, निर्मल, शोकरहित, ज्ञानस्वरूप, परमार्थरूप, आदि-मध्य और अन्तसे रहित और सीमारहित ब्रह्म है, उसीको सन्तजन गणाधिपति गणेश कहते हैं ॥ ७४ ॥ जिनसे ओंकारकी उत्पत्ति हुई, जिनसे वेद प्रकट हुए और जिनसे जगत् उत्पन्न हुआ, जिनसे यह सम्पूर्ण विश्व व्याप्त है, उन्हें ही गणनायक गणेश जानो ॥ ७५ ॥ जगत्की सृष्टि करनेकी कामनासे ब्रह्माजीने जिनको सन्तुष्ट करनेके लिये पूरे सौ वर्षोंतक अत्यन्त दुष्कर तप किया था। तदनन्तर उन प्रसन्न हुए गणेशजीका हर्षित मनवाले विधाता (ब्रह्माजी)-ने अनेक प्रकारके उपचारों, दिव्य रत्नों और फलोंसे पूजन किया ॥ ७६-७७ ॥ उन्होंने अपने मानसिक संकल्पसे सिद्धि-बुद्धि नामक दो कन्याओंको उत्पन्नकर उन गणेशजीको [पत्नीरूपमें] प्रदान किया, [तब उनकी आराधनासे] प्रसन्न होकर उन सर्वव्यापी भगवान् गणेशने उन्हें एकाक्षरी विद्या प्रदान की ॥ ७८ ॥ तब वर प्राप्त करके ब्रह्माजीने सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि की। पूर्वकालमें विष्णुने [भी] उन्हें षडक्षर मन्त्रसे प्रसन्न किया था ॥ ७९ ॥ उन श्रीहरिने मूर्तिका निर्माणकर पूर्वमें कहे गये विधानसे उनका व्रत किया। उन्होंने पूरे एक वर्षतक व्रतसम्बन्धी नियमोंका सांगोपांग पालन किया था ॥ ८० ॥ तदनन्तर गणेशजीसे वर प्राप्तकर सम्पूर्ण जगत्का पालन किया। इस प्रकार उन गणेशजीको सम्पूर्ण भूमण्डलमें स्तुत जानिये ॥ ८१ ॥ वे गणेशजी विश्वरूप, अनादि और सम्पूर्ण कारणोंके भी कारण हैं। सम्पूर्ण दुःखोंसे विमुक्तिके लिये तुम उनका प्रयत्नपूर्वक सम्यक् रूपसे आराधन करो ॥ ८२ ॥ क्षत्रियने कहा-हे मुनिवर! अब मुझे यह बताइये कि इस श्रेष्ठ व्रतको किस समय और किस विधिसे करना चाहिये। सम्पूर्ण दुःखोंकी शान्तिके लिये मैं आपके कथनानुसार इस व्रतको करूँगा ॥ ८३ ॥ मुनि (सौभरि) बोले-श्रावणमासके शुक्ल- पक्षकी चतुर्थी तिथिको इस व्रतका आरम्भ करे और भाद्रपदमासके शुक्लपक्षकी चतुर्थीतक परम भक्ति- पूर्वक इसे करता रहे। गणेशजीकी पार्थिव मूर्तिका षोडशोपचार पूजन प्रतिदिन भक्तिपूर्वक करे, तदनन्तर ब्राह्मणोंको भोजन कराये। हे राजन्! तुम ऐसा करो, इससे तुम अपनी सभी मनोकामनाओंको प्राप्त कर लोगे ॥ ८४-८५ १/२ ॥ भृगु बोले-हे सुव्रत! यह सुनकर तुमने उस व्रतको किया था। सौभरिमुनिके आश्रम-मण्डलमें जब तुम्हारा व्रत समाप्त हुआ तो गणेशजीकी कृपासे तुम्हारा घर दिव्य हो गया ॥ ८६-८७ ॥ वह घर दिव्य स्त्री-पुरुषोंसे युक्त, दास-दासियोंसे समन्वित, वेदघोषसे गुंजायमान और गोरूपी धनसे परिपूर्ण था। दिव्य वस्त्रोंसे विभूषित और अनेक प्रकारके अलंकारोंसे अलंकृत तुम्हारी पत्नी वैसे ही सुसज्जित तुम्हारे पुत्रोंके साथ आश्चर्यचकित होकर तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही थी ॥ ८८-८९ ॥ 'मेरे पति कब आयेंगे'- इस प्रकार सोचते हुए वह चिन्तामग्न थी, तभी तुम मुनिसे आज्ञा लेकर अपने घर चले गये। उस दिव्य भवनको छोड़कर तुम अपने [पुराने] घरको ढूँढ़ने लगे, तभी तुम्हारी पत्नीद्वारा भेजे गये लोग तुम्हें उस भवनमें ले आये ॥ ९०-९१ ॥ तब तुम्हें भी उन वरदायक गणेशजीका प्रभाव ज्ञात हुआ। उसी व्रतके प्रभावसे तुम्हें इस जन्ममें राज्य प्राप्त हुआ ॥ ९२ ॥ शिवजी बोले- [हे स्कन्द!] भृगुके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर हर्षित मनवाले राजा कर्दमने वह सब किया, जो भृगु [मुनि]-द्वारा कहा गया था ॥ ९३ ॥ इस व्रतके प्रभावसे राजा ज्ञान और वैराग्यसे युक्त होकर यथेच्छ भोगोंका भोग करके तथा पुत्रोंको अपने पदपर स्थापितकर गणेशजीके उस धामको चले गये, जहाँसे पुनरावर्तन नहीं होता। हे स्कन्द! व्रतोंमें उत्तम यह व्रत सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाला है ॥ ९४-९५ ॥ Kalyana Visheshank 2021_Section_7_2_Front

१७४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ - ऊपर] इस तरहका [प्रभावशाली] अन्य कोई व्रत लोकमें नहीं सुना गया है। हे स्कन्द! यदि तुम्हारी [कोई] इच्छा हो, तो इस सर्वार्थसाधक व्रतको करो ॥ ९६ ॥ [यह व्रत] देवताओं, दानवों, गन्धर्वों, ऋषियों और मनुष्योंद्वारा किया गया है। इसे [राजा] नल, [रानी] इन्दुमती और राजा चन्द्रांगदने भी किया था और सम्पूर्ण मनोकामनाओंको सम्यक् रूपसे प्राप्तकर [अन्तमें] वे गणेशजीके धामको चले गये ॥ ९७ ॥

[दायाँ स्तम्भ - ऊपर] गिरिराज [हिमवान्] बोले—[हे पार्वती!] इस प्रकार मैंने तुमसे इतिहाससहित इस महान् व्रतको कहा। तुम मनमें वरदायक गणेशजीका ध्यान करके इस व्रतको करो ॥ ९८ ॥ हे महाभागे! तुम इस व्रतको करके [भगवान्] शंकरको [अवश्य] पा लोगी। [हे पुत्री!] तुम्हारे स्नेहवश मैंने इसे आज तुमसे कहा है। इसे [अन्यके सम्मुख] प्रकट मत करना ॥ ९९ ॥

[मध्य भाग] ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'हिमवान्-पार्वती-संवाद' नामक इक्यावनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५१ ॥ बावनवाँ अध्याय राजा नलके पूर्वजन्मका वृत्तान्त

[बायाँ स्तम्भ - नीचे] पार्वतीजी बोलीं—हे पिताजी! नल कौन थे? उन नलने इस [गणेशचतुर्थी] व्रतको किस कारणसे किया था?—यह मुझे बतलाइये। [गणेशजीके व्रतविषयक] इन आख्यानोंको श्रवण करनेसे मेरे मनको शान्ति मिल रही है॥ १॥ हिमवान् बोले—पूर्वकालमें निषधदेशमें नल नामवाले एक महान् राजा हुए थे। वे ब्राह्मणभक्त, वेदज्ञ, शूरवीर, दानी, प्रतिष्ठित, धनवान्, मननशील, रथवाहन, खड्ग-बाण-धनुष-तूणीर और कवच धारण करनेवाले, बलवान्, अस्त्र-विद्यामें निपुण, देवताओंके लिये भी पूज्य, त्रिलोकीमें गमन करनेकी सामर्थ्यसे सम्पन्न और पवित्र [हृदयवाले] थे॥ २-३॥ उनके गुणोंका वर्णन करनेमें [सहस्र मुखवाले] शेष भी मौन हो जाते थे। उनके पास संख्यासे परे अर्थात् असंख्य घोड़े, हाथी, रथी, धनुर्धारी, शस्त्रधारी और आग्नेयास्त्रधारी थे। उनके भयसे दिक्पालोंसहित इन्द्रादि देवता [भी] काँपते थे॥ ४-५॥ उनकी पत्नी दमयन्ती [साक्षात्] सौन्दर्यका निवास- स्थान थी। ब्रह्माजीने सम्पूर्ण [दोषोंका] दमनकर और [रमणीक पदार्थोंके] सारभागको ग्रहणकर उसका निर्माण किया था, इसीलिये वह 'दमयन्ती' नामसे प्रसिद्ध हुई।

[दायाँ स्तम्भ - नीचे] ब्रह्माजीने तीनों लोकोंकी स्त्रियोंके सौन्दर्यको दमयन्तीमें प्रतिष्ठित किया था॥ ६-७॥ वह [दमयन्ती] अनेक प्रकारके अलंकारोंसे अलंकृत और अनेक मणियोंसे विभूषित रहती थी। उसका कण्ठप्रदेश मुक्ताहारसे सुशोभित रहता था तथा वह सुन्दरी [सम्पूर्ण] सद्गुणोंसे सम्पन्न थी॥ ८॥ उन (राजा नल)-का पद्महस्त नामक महान् पराक्रमी मन्त्री था, जो बुद्धिमें बृहस्पतिके सदृश और नीतिमें अंगिराके समान था॥ ९॥ ऊँचाईमें वे (नरेश) सुमेरुपर्वतके समान और गाम्भीर्यमें समुद्रके सदृश थे। किसी समयकी बात है, वे महामनस्वी राजा नल सभागृहमें नृपसमूहके मध्य विराजमान थे; सुन्दर स्वरूपवाली दर्शनीय अप्सराएँ उनके सम्मुख नृत्य कर रही थीं। ब्रह्मर्षिगणोंसे संयुक्त उन (राजा नल)-की वन्दीजन स्तुति कर रहे थे। उसी समय गौतममुनि राजाके पास आये॥ १०-१२॥ राजाने उठकर उन्हें आदरपूर्वक सुन्दर आसनपर बिठाया, तदनन्तर परम भक्तिभावसे उनका पूजन किया और तब राजा नलने उनसे पूछा—॥ १३॥ [राजा] नल बोले—हे स्वामिन्! हे महामुने! आपके दर्शनसे मैं अनुगृहीत हो गया हूँ। आज [आपके

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उ०ख०-अ०५२ ] * राजा नलके पूर्वजन्मका वृत्तान्त * १७५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 शुभागमनसे] मेरा जन्म, मेरा राज्य, मेरे माता-पिता, मेरा | तुमने उन मुनिको भक्तिभावसे प्रणाम किया॥ २४-२५॥ कुल और मेरा जीवन सफल हो गया। हे महामुने! अब | तब दीनों और अनाथोंके प्रति दयाभाव रखनेवाले आप अपने आनेका कारण शीघ्र बतलायें॥ १४१/२ ॥ | उन कौशिकमुनिने तुम्हें उठाया और दुखी जानकर गौतम [ मुनि ] बोले—हे नृप! मेरे मनमें तुम्हारे | आशीष देते हुए बोले—॥ २६ ॥ वैभवको देखनेकी महती इच्छा थी। स्वर्गस्थित ब्रह्मा, | मेरे [आराध्य] देवेश गजानन गणेशजी तुम्हारे इन्द्र, विष्णु और शूलपाणि शिव आदि देवता भी तुम्हारी | लिये कल्याण करनेवाले होंगे। उनके सौम्य आशीषको स्तुति (प्रशंसा) करते हैं। मृत्युलोकमें स्थित हुए भी तुम | सुनकर तुम्हें परम प्रसन्नता प्राप्त हुई ॥ २७ ॥ धन्य हो, जो कि मनुष्य और देवता तुम्हारी प्रशंसा करते | हे राजन्! तब तुमने उन विप्र [श्रेष्ठ]—से सम्पूर्ण हैं॥ १५-१६॥ | कामनाओंको प्रदान करनेवाला, दरिद्रताका नाश करनेवाला मैं नित्यतृप्त होते हुए भी तुम्हारी इस पूजा और | और भुक्ति-मुक्ति प्रदान करनेवाला कल्याणकारी उपाय तुम्हारे वैभवको देखकर तृप्त हो गया हूँ, इस समय मुझे | पूछा, तब कौशिकजीने तुमसे गणेशजीकी आराधना अनुज्ञा दीजिये, मैं अपने आश्रमको जाऊँगा॥ १७ ॥ | करनेको कहा॥ २८१/२ ॥ नल बोले—हे वेद-वेदांगके ज्ञाता! हे ब्रह्मन्! हे | कौशिक बोले—हे नरेश! तुम गणेशजीका मात्र सर्वशास्त्रप्रवर्तक! हे दयानिधे! हे मुने! क्षणभर रुककर | एक मासतक व्रत करो। गणेशजीकी देखनेमें सुन्दर मेरे संशयको नष्ट कीजिये॥ १८ ॥ | लगे—ऐसी एक मिट्टीकी मूर्तिका निर्माण करो, उसकी मुनि बोले—हे महाराज! आपने उचित ही प्रश्न | पहले बतायी गयी विधिसे पूजा करो और उनकी किया है; मैं आपके प्रति स्नेहभाव होनेके कारण रुक | कथाका श्रवण करो। प्रतिदिन ऐसा करते हुए जब एक गया हूँ। आपकी आज्ञाका उल्लंघन तो नाग, [अन्य] | मास पूरा हो जायगा, तब तुम सिद्धि प्राप्त कर राजागण तथा देवता भी नहीं करते हैं॥ १९ ॥ | लोगे॥ २९-३०१/२ ॥ राजा (नल) बोले—हे ब्रह्मन्! अपना वैभव | मुनि बोले—ऐसा सुनकर उस भूपतिने पुनः देखकर मुझे स्वयं भी आश्चर्य होता है। यह सब मेरे किस | कौशिकसे कहा कि मैं गजाननको नहीं जानता हूँ, उनका पुण्य अथवा किस तपस्याके प्रभावसे हुआ? मैं पूर्वजन्ममें | स्वरूप मुझसे कहिये। उन देवदेवेश [-के स्वरूप]—को कौन था—यह भी यथार्थ रूपसे बतलाइये॥ २०१/२ ॥ | जानकर मैं उनका उत्तम व्रत करूँगा॥ ३१-३२ ॥ मुनि बोले—[हे राजन्!] तुम गौड़ देशके | उनके इस प्रकार प्रश्न करनेपर वे मुनिश्रेष्ठ वाणीसे निकटवर्ती देशमें पिप्पल नामक पुरमें ज्ञानवान् और पवित्र, | परे स्वरूपवाले परब्रह्मस्वरूप गजानन गणेशजीद्वारा परंतु धनहीन क्षत्रिय थे। तुम अपनी पत्नी, सन्तानों और | अवतार लेकर धारण किये गये वैकारिक स्वरूपोंका मित्रोंके वाग्बाणोंसे अत्यन्त ताड़ित थे। अतः सबसे तुम्हें | वर्णन करते हुए बोले—॥ ३३१/२ ॥ विराग हो गया और तुम इन सबसे बिना कुछ कहे | कौशिक बोले—जो सम्पूर्ण लोकोंके कर्ता, पिता, (बताये) गहन वनमें चले गये। वह वन वृक्षों, वल्लारियों, | माता और जगद्गुरु हैं; ब्रह्मा, इन्द्र, शिव और विष्णुके सिंहों, व्याघ्रों, हाथियों और मृगोंसे भरा हुआ था। वहाँ | जो ध्येय हैं; वे ही गजानन गणेशजी हैं॥ ३४१/२ ॥ जलमें उत्पन्न होनेवाले कमलादि पुष्पोंसे सुशोभित शीतल | [गौतम ] मुनि बोले—उनके इस प्रकारके वचन जलसे युक्त सरोवर भी थे॥ २१-२३१/२ ॥ | सुनकर तुम उन मुनीश्वरके चरणोंमें प्रणामकर उनकी इस वनसे उस वनमें घूमते हुए तुमने तपस्याके | आज्ञासे अपने घरको चले गये थे। तुमने श्रावण शुक्ल निधिरूप कौशिकमुनिके आश्रमको देखा, जो वेदघोष | पक्षकी चतुर्थीसे [गणेशजीके] उत्तम व्रतका आरम्भ (उच्च स्वरमें वेदमन्त्रोंके पाठ)—से गूँज रहा था। वहाँ जाकर | किया॥ ३५-३६॥

१७६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 तुमने गणेशजीकी शास्त्रोक्त पार्थिव मूर्तिका निर्माण | तुम त्रैलोक्यके मनुष्योंसे वन्दित हो और तुममें अचल किया और स्थिर अवस्थामें, बोलते हुए, मौनावस्थामें, | लक्ष्मी प्रतिष्ठित है। अब मुझे अनुमति दो; [क्योंकि] चलते हुए, शयनावस्थामें तथा भोजन करते हुए तुम | जो कुछ तुमने पूछा था, वह सब मैंने निरूपित कर भगवान् गजाननका ध्यान करते रहने लगे। इससे तुम्हें | दिया ॥ ४०-४११/२॥ अत्यन्त उत्तम सिद्धिकी प्राप्ति हुई ॥ ३७१/२॥ | हिमवान् बोले-[हे पार्वती !] इस प्रकार गौतम [उस] व्रतके प्रभावसे तुम अनेक हाथियों, रथों, | (मुनि)-के चले जानेपर उनके वचनोंका विश्वास करके अश्वों आदिसे सम्पन्न, गोसम्पदा, धन-सम्पत्तिसे युक्त, | राजा नलने गणेशजीकी सुन्दर मूर्तिका निर्माणकर व्रतको दास-दासियोंवाले और श्रीमान् (ऐश्वर्यसम्पन्न) हो | करना आरम्भ किया। उस (राजा नल)-ने प्रतिदिन गये ॥ ३८१/२॥ | भक्तिपूर्वक गणेशजीकी कथाका श्रवणकर इस व्रतके [इष्ट] देव गणेशजीकी प्रसन्नताके लिये तुमने | प्रभावसे सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त किया। हे पुत्री! इस सभी प्रकारके दान दिये और प्रसन्नतापूर्वक गणेशजीके | प्रकार मैंने नलद्वारा किये गये व्रतको तुम्हें बतला महान् मूल्यवान् मन्दिरका निर्माण कराया ॥ ३९१/२॥ | दिया ॥ ४२-४४॥ तुम यथेच्छ भोगोंका भोगकर समय आनेपर मृत्युको | गौतमाने उन्हें पूर्वजन्ममें किये गये व्रतका ही प्राप्त हुए और अब निषधदेशमें 'नल' नामक राजाके | उपदेश दिया था, उसके सम्पूर्ण प्रभावका कथन करनेमें रूपमें उत्पन्न हुए हो। उसी (गणेशाराधन)-के प्रभावसे | तो कोई भी समर्थ नहीं है ॥ ४५ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'राजा नलके द्वारा किये गये व्रतका निरूपण' नामक बावनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५२ ॥ ❖ ❖ तिरपनवाँ अध्याय हिमवान्-पार्वती-संवादमें राजा चंद्रांगदका उपाख्यान हिमवान् बोले- हे शुभानने! अब मैं राजा | पुत्री ! [सभामें लगे हुए] नील, लोहित और पीतवर्णके चंद्रांगद और उनकी पत्नी इन्दुमतीद्वारा किये गये इस | रत्नोंसे जटित स्तम्भोंमें अत्यन्त स्वच्छ वस्त्र भी प्रतिबिम्बित व्रतको तुमसे कहता हूँ। मालवदेशमें कर्ण नामका एक | होकर अनेक वर्णवाले प्रतीत हो रहे थे ॥ ४-५॥ विख्यात नगर है, वहाँ चंद्रांगद नामका अत्यन्त पराक्रमी | राजाकी सर्वांगसुन्दरी पत्नी इन्दुमतीके नामसे विख्यात राजा हुआ था ॥ १-२॥ | थी। वह अत्यन्त साधु स्वभाववाली, महान् भाग्यशालिनी, वह [राजा] अणिमादि* सिद्धियोंसे युक्त, समस्त | पतिसेवामें रत रहनेवाली, गृहकार्योंमें उद्विग्न न होनेवाली, शास्त्रोंके तत्त्वार्थका ज्ञाता, यज्ञ करनेवाला, दानी, महान् | देवताओं-अतिथियोंकी पूजा करनेवाली, धार्मिक, व्रतपरायणा ज्ञानी और वेद-वेदांगोंका पारगामी विद्वान् था ॥ ३ ॥ | और सास-ससुरकी सेवा करनेवाली थी ॥ ६-७॥ उसकी राजसभा अलौकिक सुधर्मा सभाको भी | धर्मात्मा होनेपर भी राजा चंद्रांगदको [शिकार पराभूत करनेवाली थी, उसमें लगी सूर्यकान्तमणिकी | खेलनेका व्यसन था, अतः ] उनके मन्त्रियोंने 'पापको किरणोंसे नेत्रोंके तेजका हरण-सा हो जाता था। हे | बढ़ानेवाली महाभयंकर जीवहिंसाको रोकिये' - इस प्रकारकी

  • अणिमा (अणु जितना हल्का हो जानेकी सामर्थ्य), लघिमा (अत्यन्त लघु हो जानेकी अलौकिक शक्ति), गरिमा (अपने शरीरका भार इच्छानुसार बढ़ा सकनेकी सामर्थ्य), प्राप्ति (किसी भी पदार्थको प्राप्त करनेकी शक्ति), प्राकाम्य (सभी कामनाओंको पूर्ण कर सकनेकी शक्ति), महिमा (अपने शरीरको विशाल कर सकनेकी शक्ति), ईशित्व (दूसरोंपर प्रभुत्व कर सकनेकी शक्ति), वशित्व (वशमें करनेकी योगसे प्राप्त शक्ति), कामावशायिता (सत्यसंकल्पता)।

उ०ख०-अ०५३ ] * हिमवान्-पार्वती-संवादमें राजा चंद्रांगदका उपाख्यान * १७७ उनसे बहुत प्रार्थना की। दैवयोगसे वे किसी समय शिकार | सुनकर वे राजा बोले— ॥ १९ ॥ खेलनेके लिये लकड़बग्घों, रुरु जातिके मृगों, [वन] | 'मैं हेमांगदका बलवान् पुत्र चंद्रांगद हूँ, सूकरों तथा अन्य पशु-पक्षियोंसे भरे वनमें गये ॥ ८-९ ॥ | मालवदेशके कर्णनगरमें मेरा निवास है। राक्षसीके भयसे उन्होंने नीले रंगका अँगरखा पहन रखा था और | अत्यन्त त्रस्त होकर मैं [इस तालाबकी] विशाल नीले रंगका ही साफा बाँध रखा था तथा ऊपरसे उत्तरीय | जलराशिमें प्रविष्ट हो गया और आप लोगोंके द्वारा धारण कर रखा था। उन्होंने अँगुलियोंकी रक्षाके लिये | यहाँ लाया गया। आप लोगोंने जो कुछ पूछा, उसे गोहके चर्मके बने दस्ताने पहन रखे थे तथा तलवार- | मैंने निवेदन कर दिया ॥ २०-२१ ॥ ढाल एवं कटार धारण कर रखी थी ॥ १० ॥ | आखेटरत मेरे साथके सभी लोग [राक्षसीद्वारा] शीघ्रगामी अश्वपर समारूढ़ होकर तथा हाथोंमें | खा लिये गये। इस सरोवरके जलकी कृपासे मैं इस समय धनुष-बाण धारणकर वे बलवान् राजा वैसे ही वीरोंके | जीवित हूँ।' तब राजाके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर समुदाय, मन्त्रियों और सेवकोंसे घिरे, मृगों और वराहोंको | उन नागकन्याओंने पुनः उनसे कहा— ॥ २२ ॥ मारकर नगरको भेजते हुए वनमें भ्रमण कर रहे थे कि | वे [नागकन्याएँ] बोलीं— 'आप हम लोगोंके बलवान् राक्षसोंद्वारा देख लिये गये ॥ ११-१२ ॥ | पति हो जायें, इससे आपके सभी प्रिय कार्य सम्पन्न हो उन गुफा-जैसे मुखवाले, गड्ढे-जैसे नेत्रों और | जायेंगे। हम नागकन्याओंके साथ भोग-विलास अत्यन्त फैले हुए जबड़ोंवाले एवं नभःस्पर्शी विशाल शरीरवाले | दुर्लभ है' ॥ २३ ॥ राक्षसोंको देखकर वे शीतज्वरसे पीड़ित रोगीकी भाँति | उनके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर उन नृपश्रेष्ठ काँपने लगे। उन्हें देखकर [राजाके] सभी वीर सैनिक | (राजा चंद्रांगद)-ने कहा—'हे माताओ! मेरा एकपत्नी- और सेवकगण भी भाग खड़े हुए। उनमेंसे कुछ तो | व्रत है, उसका मैं कैसे त्याग करूँ! चंद्रवंशमें उत्पन्न मरकर यमलोकको चले गये और कुछ मूर्च्छित होकर | राजाओंके धर्मका मैं आप सबसे वर्णन करता हूँ— पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ १३-१४ ॥ | सोमवंशमें उत्पन्न साधु स्वभाववाले राजा परद्रव्य, वहाँ एक क्रूर राक्षसी [भी] थी। वह कामदेवके | परद्रोह, परदारा तथा परनिन्दाकी इच्छा भी नहीं करते। सौन्दर्यको भी पराभूत करनेवाले उन राजाको देखकर | [वेद-शास्त्रोंका] अध्ययन, यज्ञ, दान, शरणागतकी काममोहित हो गयी और उसने उनका आलिंगनकर | रक्षा, निषिद्धाचरणका त्याग तथा वेदविहित आचारका चुम्बन किया। उसने राजाके मन्त्रियोंको अपने गुप्तागारमें | पालन—ये द्विजसंज्ञक त्रैवर्णिकों (ब्राह्मण, क्षत्रिय और प्रविष्ट कर लिया और उनके सेवकोंका भक्षण कर लिया। | वैश्य)-के धर्म हैं और याजनादि (यज्ञ कराना, दान इसी बीच राजा वहाँसे पलायन कर गये ॥ १५-१६ ॥ | लेना तथा अध्यापन करना) तीन धर्म केवल ब्राह्मणोंके वे [भागकर] एक तालाबमें छिप गये, जिससे वह | लिये विहित हैं। आतिथ्य विशेष रूपसे सभी वर्णोंका राक्षसी उन्हें नहीं देख पायी। [उधर] राजा [तालाबमें] | परम धर्म है।' ॥ २४-२७१/२ ॥ नागकन्याओंद्वारा पकड़ लिये गये और वे उन्हें पातालस्थित | राजाकी इस प्रकारकी बात सुनकर उन सभी नाग- अपने भवनमें ले आयीं ॥ १७ ॥ | कुमारियोंने उन्हें शाप दे दिया कि तुम्हें अपनी पत्नीसे वहाँ नागकन्याओंने उन्हें वस्त्रालंकारों और आभूषणोंसे | बहुधा वियोग होगा। उन कामविह्वल और दुखी नागकन्याओंने विभूषित किया। तत्पश्चात् नागकन्याओंने उनसे पूछा | उन्हें जंजीरोंसे बाँध दिया ॥ २८-२९ ॥ कि आपका आगमन कहाँसे हुआ है ॥ १८ ॥ | [उधर] उस राक्षसीने राजाको प्राप्त करनेके लिये हे नरश्रेष्ठ! आप कौन हैं? किसके पुत्र हैं? | उस सरोवरका [सम्पूर्ण] जल पी डाला और [उसमें आपका क्या कार्य है? सत्य कहिये। उनका यह वचन | रहनेवाले] सम्पूर्ण जलचरोंको खा गयी, फिर भी वह

१७८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

सर्वथा तृप्त नहीं हुई ॥ ३० ॥ इस वृत्तान्तको पलंगपर बैठी हुई कमलसदृश नेत्रोंवाली रानीने उस राक्षसीसे बचकर आये हुए अपने दूतसे सुना। राजाको [सरोवरमें] डूब गया सुनकर वह दुखित होकर [पलंगसे] पृथ्वीपर गिर पड़ी और महान् मूर्च्छाको प्राप्त हो गयी। [उस समय] सखियाँ उसे पंखा झलने लगीं ॥ ३१-३२ ॥ उन सखियोंने बारम्बार रोती हुई रानीपर शीतल जल छिड़का, इससे वह उठकर बैठ गयी और अपने वक्ष, सिर तथा मुखको पीटती हुई रुदन करने लगी ॥ ३३॥ वह 'हे भर्ता! हे कान्त!'—इस प्रकार कहती हुई अत्यन्त शोकसे विलाप करने लगी। [रानी कहने लगी—] हे प्राणनाथ! मुझ प्रियवादिनीको छोड़कर आप कहाँ चले गये? मेरे शरीरके सभी अंग भलीभाँति ठीक हैं, मैं आपके चरणोंमें प्रणत रहनेवाली हूँ, आपका प्रिय करनेवाली हूँ, मैं नित्य पतिके कार्यमें संलग्न रहनेवाली हूँ और नित्य अतिथियोंका पूजन करनेवाली हूँ॥ ३४-३५॥

मेरे स्वामी कहाँ भोजन करते होंगे? स्वर्णनिर्मित पलंग और बहुमूल्य आस्तरण (चादर)-को त्यागकर कहाँ निद्रा लेते होंगे? सुगन्धित तैलका त्यागकर मेरे कान्त कैसे स्नान करते होंगे? उनके बिना अब प्रजाओंका पालन कौन करेगा? ॥ ३६-३७ ॥ अपनी सन्तानवत् प्रजाओंका आह्लादन कौन करेगा? आज गुणों और प्रतापके निधान [वे राजा] अस्त क्यों हो गये हैं? उन महात्माके बिना मैं दिशाओंको शून्य देख रही हूँ। [उनके बिना] अब मैं कहाँ सुख देखूँगी और वे भी कहाँ सुख पायेंगे? ॥ ३८-३९ ॥ हे देव! कुलांगनाओंको स्वामीके साथ जैसा सुख मिलता है, वैसा सुख स्वामीके न रहनेपर इहलोक या परलोकमें नहीं मिलता। शरणमें आये हुए दीनोंकी रक्षा कौन करेगा? इस प्रकार दीन होकर अत्यन्त विह्वलतापूर्वक वह रोने लगी ॥ ४०-४१ ॥ उसने अपने आभूषण तोड़कर दूर फेंक दिये। सभी कंगनों एवं चूड़ियों आदिको तोड़ डाला तथा मूर्च्छित हो गयी ॥ ४२ ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें चंद्रांगदोपाख्यानके अन्तर्गत 'चंद्रांगदका निग्रह' नामक तिरपनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५३ ॥

चौवनवाँ अध्याय प्रजाजनोंको आश्वासन देना, रानी इन्दुमतीका राजाको मृत समझकर विलाप करना तथा नारदजीके उपदेशसे गणेशचतुर्थीका व्रत करना

पार्वतीजी बोलीं—हे पिताजी! उस रानीके मूर्च्छित हो जानेपर प्रजाजनोंने क्या किया? हृदयको आनन्द देनेवाले इस प्रसंगको विस्तारपूर्वक बताइये ॥ १॥ हिमवान् बोले—तदनन्तर बात-चीतमें कुशल सभी नगरनिवासी अपने आँसुओंको पोंछकर राजाकी पत्नीके पास जाकर उसे आश्वासन देते हुए कहने लगे— ॥ २ ॥ नगरनिवासी बोले—हे माता! उठिये, शोक मत कीजिये। अपने पुत्रमें मन लगाइये। मृत प्राणीके लिये शोकाश्रु दाहक होते हैं, इसलिये अपने पतिका हित करिये। हे शुभानने! मरणधर्मा मनुष्योंमें कोई चिरंजीवी

नहीं देखा गया है। जैसे जीर्ण वस्त्रको त्यागकर लोग अन्य (नवीन) वस्त्रोंको ग्रहण कर लेते हैं, इसी प्रकार प्राणी भी एक देहको छोड़कर दूसरी शुभ (सुन्दर) देह ग्रहण कर लेते हैं ॥ ३-४ १/२ ॥ हे कल्याणि! यह अत्यन्त आश्चर्यकी बात है कि स्वयं मरणधर्मा और मृत्युके मुखमें स्थित होते हुए भी प्राणी दूसरे मृत व्यक्तिके लिये शोक करता है; वह अपने देहके आत्मासे होनेवाले भावी वियोगको नहीं जानता ॥ ५-६ ॥ मनुष्य 'सब कुछ मेरा है'—ऐसा मानता है, जबकि हे सत्यव्रती! ब्रह्मासे लेकर स्थावरपर्यन्त समुद्रसहित जो चराचर जगत् है, वह स्वयं दैव और कालके वशमें

उ०ख०-अ०५४] * प्रजाजनोंको आश्वासन देना * १७९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 है। अतः उसे नाशवान् जानकर शोकका त्यागकर उठो। | प्रकारके दान दिये ॥ १८-१९१/२ ॥ तुम्हारे धर्मात्मा और पुण्यवान् पतिको मुक्ति प्राप्त हो | तत्पश्चात् उस सौभाग्यशालिनी इन्दुमतीने हर्षित गयी होगी। संसारमें यदि वे कदाचित् जीवित होंगे तो | होकर अनेक प्रकारके [मंगल] वाद्य बजवाये और घर- घर आ जायँगे; क्योंकि पुण्योंकी अधिकतासे तो मनुष्य | घरमें शर्करा भिजवायी। उसने लोगोंको वस्त्र और स्वर्ग जाकर भी पुनः लौट आता है अथवा यहाँ आये | ताम्बूल देकर घर वापस जानेकी आज्ञा दी ॥ २०-२१ ॥ हुए किसी मुनिसे जो भूत-भविष्यका ज्ञाता हो, उससे | उसके बाद उस राजकन्या (रानी इन्दुमती)-ने पूछा जाय तो वह सब कुछ बता देगा, तदनन्तर जो भी | पुनः आदरपूर्वक देवर्षि नारदके चरणोंमें मस्तक रखकर करना होगा] वह हम सब करेंगे ॥ ७-१०१/२ ॥ | प्रणाम किया और उनसे अपने पतिकी प्राप्तिका उपाय हिमवान् बोले-तदनन्तर इस प्रकार लोगोंद्वारा | पूछा ॥ २२ ॥ प्रबोधित किये जानेपर रानी इन्दुमती थोड़े ही समयमें | इन्दुमती बोली-हे मुने! मेरे पति कहाँ और उनके वचनोंसे आश्वस्त हो गयी और उसने अपने | किस प्रकार रह रहे हैं? हे वेदज्ञ! किस उपायसे मुझे आँसुओंको वस्त्रसे पोंछकर वहाँ आये सभी लोगोंको | उनका दर्शन होगा? हे मुने! मुझपर कृपा करिये और विदा किया ॥ ११-१२ ॥ | उस उपायको बताइये, चाहे वह कितना भी कठिन व्रत, सौभाग्य-चिह्नोंको त्यागकर वह अत्यन्त क्षीणताको | दान या तप हो ॥ २३-२४ ॥ प्राप्त हो गयी थी। वह [प्रायः] रोती रहती, शोक करती | नारदजी बोले-मैं उस उत्तम व्रतको संक्षेपमें रहती, लम्बी-लम्बी साँसें लेती तथा बार-बार मूर्च्छित | तुमसे कहता हूँ। उसे श्रावणमासके शुक्लपक्षकी चतुर्थीसे हो जाती थी। तदनन्तर बारह वर्षोंके पश्चात् दिव्यदर्शन | प्रसन्नतापूर्वक आरम्भ करना चाहिये। प्रभातकालमें नारद मुनि अपनी इच्छासे विचरण करते हुए उसके | दातून करके नदी, तालाब या वापीमें संकल्पपूर्वक स्नान भवनमें आये। उन्हें देखकर वह अपने पतिका वृत्तान्त | करे ॥ २५-२६ ॥ बताते हुए शीघ्र ही रोने लगी और उनसे उस दुःखको | तदनन्तर श्वेत वस्त्र धारण करके घर जाकर कहा, जो उसने बारह वर्षमें अनुभव किया था। तब | गणेशजीकी चार भुजाओंवाली उत्तम और सुन्दर मूर्ति नारदमुनिने उसके रुदनको सुनकर उसे हर्ष प्रदान करते | बनाये तथा स्थिर चित्तसे षोडश उपचारोंसे पूजन करे हुए कहा- ॥ १३-१५१/२ ॥ | और दिन-रातमें स्वयं [द्वारा] प्रयत्नपूर्वक [बनाये गये] नारदजी बोले-तुम्हारा पति कहीं स्थित है, | एक अन्नका भोजन करे अथवा एक बार भोजन करे तुम्हें उसके विषयमें शोक नहीं करना चाहिये। तुम नील | या उपवास करे। इस प्रकार भाद्रपदमासकी शुक्लपक्षकी वर्णके वस्त्रसे अपने सिरको आच्छादित करो। कर्णाभूषणोंसे | चतुर्थी तिथितक व्रत करे ॥ २७-२८१/२ ॥ दोनों कानोंको अलंकृत करो। अपने भालपर कुंकुमकी | हे पतिव्रते ! हे सुन्दरि ! अपने वैभवके अनुरूप गीत, सुन्दर बिन्दी लगाओ, हाथमें कंगन और कण्ठमें मंगलसूत्र | वाद्य और नृत्य आदिपूर्वक महोत्सव करे और ब्राह्मणोंको धारण करो ॥ १६-१७१/२ ॥ | भोजन कराये। हे कल्याणि ! इस प्रकार व्रत करो, इससे हिमवान् बोले-सत्यवादी और सर्वज्ञ मुनिके | तुम्हारा पतिके साथ मिलन होगा। हे सुन्दरि ! वह जीवित वचनोंपर विश्वास करके उस (रानी इन्दुमती)-ने तत्काल | है, पातालमें नागकन्याओंद्वारा उसे बन्दी बनाया गया है। सभी वस्त्राभूषणोंको मँगाकर हर्षित होकर वैसा ही | हे राज्ञि ! मैं सत्य कहता हूँ, मेरा वचन अन्यथा नहीं किया, जैसा नारदजीने कहा था। तदनन्तर उसने समस्त | होगा ॥ २९-३१ ॥ ब्राह्मणोंको बुलवाकर सर्वप्रथम नारदजीका सम्यक् प्रकारसे | हिमवान् बोले-उन मुनिके द्वारा इस प्रकार पूजनकर सभी ब्राह्मणोंका पूजन किया और उन्हें अनेक | कहे जानेपर रानीने आदरपूर्वक व्रत प्रारम्भ किया।

१८० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 उन मुनिके चले जानेपर कुछ दिनों बाद श्रावणमास | स्मरण और ध्यानसे तथा गीत, वाद्य, नृत्य एवं ब्राह्मण- आनेपर उसने गजानन गणेशजीकी सुन्दर-सी पार्थिव | भोजनसे उन परमात्माको प्रसन्न किया ॥ ३४-३५१/२ ॥ मूर्ति बनायी तथा पहले कही गयी विधिसे अत्यन्त | उसने नारदमुनिके वचनानुसार दीर्घकालसे खोये मनोहर पूजा की ॥ ३२-३३ ॥ | हुए अपने प्रियतमकी प्राप्तिके लिये पलमात्र दुग्धका उसने दिव्य गन्धों, दिव्य वस्त्रों, दिव्य पुष्पों, अनेक | पान करते हुए श्रावणमासके शुक्लपक्षकी चतुर्थीसे प्रकारके दिव्य नैवेद्यों, फलों, सुवर्ण [दक्षिणा], दीपों, | भाद्रपद शुक्ल चतुर्थीतक [गणेशजीका] उत्तम व्रत पुष्पांजलि, प्रदक्षिणा, नमस्कार, स्तवन, गणेशजीके नाम- | किया ॥ ३६-३७ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'इन्दुमती-नारद-संवाद' नामक चौवनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५४॥ पचपनवाँ अध्याय गणेशचतुर्थीव्रतके माहात्म्यके सन्दर्भमें राजा चन्द्रांगद और रानी इन्दुमतीके पुनर्मिलनकी कथा हिमवान् बोले-[हे पार्वती !] इस प्रकार उस | स्नान करके अभी-अभी भवनको गयी हैं। उपवास और रानी इन्दुमतीके गणेशचतुर्थीव्रतके पूर्ण होनेपर गणेशजीकी | व्रतका पालन करती हुई वे अत्यन्त कृश शरीरवाली हो कृपासे पातालमें नागकन्याओंकी मति बदल गयी ॥ १ ॥ | गयी हैं, उनकी नस-नाड़ियाँ दिखायी देती हैं ॥ ८ ॥ तब उन्होंने राजाको बन्धनमुक्त कर दिया और | वे अपने पुत्र राजकुमारमें अपने प्राणोंको स्थितकर वस्त्राभूषणों तथा अनेक प्रकारके रत्नों एवं महान् धन- | नाममात्रको जीवित हैं। उनमें कुछ [नागरिकों]-ने सम्पत्तिसे उनका यथाविधि पूजन किया ॥ २ ॥ | नगरमें जाकर इस शुभ समाचारकी घोषणा कर दी ॥ ९ ॥ उन्होंने राजा [चन्द्रांगद]-को मनके समान वेगवाला | तब वह रानी इन्दुमती अत्यन्त आप्त पुरुषोंद्वारा अश्व प्रदानकर विदा किया। तब वे राजा उस तालाबसे | 'राजा आ गये हैं' इस वचनको सुनकर योगविद् बाहर आये और अश्वको एक विशाल वृक्षसे बाँधकर | ब्रह्मज्ञानीकी भाँति आनन्दसागरमें निमग्न हो गयी ॥ १० ॥ जब स्नान करने लगे, तब कुछ नागरिकोंकी दृष्टि उनपर | तदनन्तर रानी इन्दुमतीने मन्त्रियोंके नेतृत्वमें सैनिकोंको पड़ी। कुछ नागरिकोंने उनको राजा चन्द्रांगद समझा और | राजाके पास भेजा और नगरको रंग-बिरंगी ध्वजाओं कुछ लोग उन्हें भिन्न व्यक्ति समझ रहे थे। उनमें कुछ | और पताकाओंसे सुशोभित करवा दिया ॥ ११ ॥ कहने लगे कि यह चन्द्रांगद-जैसा तो है, किंतु राजा | उसने राजमार्गोंपर जलका छिड़काव करा दिया चन्द्रांगद नहीं है। उनमेंसे कुछने उनके पास जाकर पूछा | और सभाको यत्नपूर्वक सुसज्जित करा दिया तथा कि 'आप कौन हैं? कहाँके रहनेवाले हैं? कहाँसे आये | स्वयंको वस्त्रों, अलंकारों और आभूषणोंसे विभूषित हैं? हे प्रभो! आपका नाम क्या है? यह सब हमें | किया। उसने गाय, भूमि, स्वर्ण आदि अनेक प्रकारके बताइये' ॥ ३-५ ॥ | दान देकर बहुत-से द्विजोंको सन्तुष्ट किया और सौभाग्यवती उनके इस प्रकारके वचन सुनकर उन नृपश्रेष्ठ | स्त्रियोंके हाथमें आरती [-के थाल] देकर वह उनके [चन्द्रांगद]-ने [रानी] इन्दुमती और राजकुमारका दुखी | साथ गायन और वादनकी [मांगलिक] ध्वनिसहित मनसे कुशल-समाचार पूछा। तब उन लोगोंने उन्हें | नगरसे सरोवरपर आयी ॥ १२-१३१/२ ॥ पहचान लिया और प्रसन्नतापूर्वक उनका आलिंगन | मन्त्रियोंने उन नृपश्रेष्ठके सम्मुख जाकर उन्हें किया ॥ ६-७ ॥ | प्रणामकर प्रसन्नतापूर्वक उनका आलिंगन किया। उन्होंने कहा कि हे नृप ! आपकी पत्नी (रानी इन्दुमती) | तत्पश्चात् अन्य सभी नागरिकोंने यथाक्रम उन्हें प्रणाम

उ०ख०-अ०५५] * गणेशचतुर्थीव्रत-माहात्म्यमें चन्द्रांगद और इन्दुमतीके पुनर्मिलनकी कथा * १८१


[बायाँ स्तम्भ]

किया और राजा [चन्द्रांगद]-के बैठ जानेपर उनकी आज्ञासे सभी लोग बैठ गये। तदनन्तर वे श्रेष्ठ राजा सभीको कुशल-प्रश्न आदिसे प्रसन्नकर उन्हें यथायोग्य ताम्बूल और वस्त्र देकर सम्मानित करके इन्दुमतीके शिविरमें गये॥ १४-१६१/२॥

उन्होंने बारह वर्षकी अवधिमें शेष रह गये करणीय कृत्योंको धर्मशास्त्रोंके द्रष्टा द्विजोंद्वारा सम्पन्न कराया। राजाने गणेशजीका सर्वप्रथम पूजन किया। तत्पश्चात् पुण्याहवाचन करवाया तथा भगवान् शंकरका सम्यक् प्रकारसे पूजनकर ब्राह्मणोंको दक्षिणा आदिसे सन्तुष्ट किया ॥ १७-१८॥

तत्पश्चात् नारियल फोड़कर वे इन्दुमतीके सम्मुख गये और वहाँ उन्होंने इन्दुमतीको चन्द्रमाकी क्षीण कलाओंकी भाँति [तेजोहीन तथा कृश] देखा॥ १९॥

तब रानी इन्दुमतीने सौभाग्यवती युवतियोंसे राजाकी आरती उतरवायी और उनसे उनके ऊपर लाजा (धानके लावा) और पुष्पोंकी वृष्टि करवायी॥ २०॥

तब आनन्दके आँसुओंसे भरी आँखोंको सम्यक् प्रकारसे पोंछकर हर्ष और शोकसे समन्वित वे दोनों परस्पर वार्ता करने लगे॥ २१॥

उन दोनोंने वियोगजन्य अपने-अपने मानसिक क्लेशको एक-दूसरेसे शोकपूर्वक कहा, तब मन्त्रियोंने उनको नियतिके विधानकी अनिवार्यता बतलाते हुए अनेक प्रकारके वचनोंसे सान्त्वना दी॥ २२॥

तदनन्तर वे राजाको अनेक प्रकारके अलंकारोंसे अलंकृत तथा छत्र और पताकासे सुशोभित एक महान् गजराजपर बैठाकर [नगरको] ले गये॥ २३॥

वह महागवराज पादरक्षकोंसे घिरा हुआ था और उसपर लटकते हुए चार घण्टे सुशोभित हो रहे थे। लाठी लिये हुए सौ पुरुष लोगोंको रास्तेसे हटाते हुए उसके आगे-आगे चल रहे थे॥ २४॥

बहुत-से आग्नेयास्त्रधारी, अश्वारोही और रथारोही राजाके बायें और दायें पार्श्वमें स्थित होकर हाथीको देखते हुए शीघ्रतापूर्वक चल रहे थे॥ २५॥

राजाके आगे-आगे बहुत-से नट, नृत्यांगनाएँ,


[दायाँ स्तम्भ]

वाद्य-वादक और वन्दीजन तथा उनके पीछे गजारोही चल रहे थे। इस प्रकार आदरपूर्वक राजाने नगरमें प्रवेश किया। उस समय सैनिकोंके चलनेसे उठी धूलसे [नभमण्डल] व्याप्त हो जानेसे सूर्य निस्तेज-से प्रतीत होने लगे थे। यद्यपि वह नगर अलंकृत किया गया था, लेकिन [धूलके कारण] कुछ भी सूझ नहीं रहा था॥ २६-२७॥

तदनन्तर सभी लोग परस्पर एक-दूसरेका अभिवादन करके अपने-अपने घर चले गये, तत्पश्चात् विशिष्ट जनोंको राजभवनमें ले जाया गया। वहाँ वे सब राजाद्वारा वस्त्र और ताम्बूल देकर सम्मानित होनेके बाद उनकी आज्ञा पाकर घर चले गये। राजाने ब्राह्मणोंको भोजन कराकर जाति-बान्धवोंके साथ भोजन किया ॥ २८-२९॥

तदनन्तर रात्रिमें उन दोनों [राजा और रानी]-ने सुन्दर विधिसे निर्मित, बहुमूल्य गद्दोंसे युक्त, जिसपर चादर बिछा था और तकिया लगा था, ऐसे पलंगपर शयन किया। वे दोनों बार-बार शोक करते हुए अपने-अपने दुःखोंको कह रहे थे, तब पुरोहितद्वारा सान्त्वना देनेपर वे दोनों सुखपूर्वक सो गये॥ ३०-३१॥

नृपश्रेष्ठ चन्द्रांगदने अपनी पत्नीद्वारा किये गये विनायकव्रतके माहात्म्यको सुनकर स्वयं भी उसे करनेका मनमें संकल्प किया॥ ३२॥

हे सुमुखि! तदनन्तर श्रावणमासके आनेपर राजा चन्द्रांगदने महोत्सवपूर्वक इस व्रतको किया॥ ३३॥

ऋषि बोले—पिताके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर पार्वतीजी अत्यन्त हर्षित हुईं और उन्होंने आदरपूर्वक श्रावणमासमें [गणेशचतुर्थीका] व्रत किया॥ ३४॥

पार्वतीजीने यथोक्त (शास्त्रोक्त) विधिसे [गणेशजीकी] मूर्तिका निर्माणकर गजानन गणेशजीका ध्यान करते हुए पयमात्राका आहारकर प्रयत्नपूर्वक [उनकी] पूजा की। इससे भगवान् शंकरका भी मन चंचल हो उठा और वे शूलपाणि स्वयं उन पार्वतीजीके आश्रममें पधारे॥ ३५-३६॥

गणेशचतुर्थी [भाद्रशुक्ल चतुर्थी]-को उस शुभव्रतके सम्यक् रूपसे पूर्ण हो जानेपर देवी पार्वती ने वृषभपर

१८२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-


आरूढ़ भगवान् शिवको अपने आश्रममें आया हुआ देखा। तब उन्होंने उठकर उनके युगल-चरणकमलोंमें प्रसन्नतापूर्वक प्रणाम किया और सम्पूर्ण लोकोंका कल्याण करनेवाले भगवान् शंकरका विधिवत् पूजन किया। तदनन्तर प्रेमविह्वल पार्वतीजीने उन महादेवसे कहा— ॥ ३७-३८ ॥ देवी बोलीं— 'आप मुझे छोड़कर क्यों चले गये थे ? आपने मुझे क्यों विस्मृत कर दिया ? हे विभो ! आपका एक निमेषका भी वियोग कल्प-कल्पके समान हो रहा था। पिताके निर्देशपर मैंने गणेशजीके इस व्रतको किया। [उन्हीं] वरदाता गणेशजीकी कृपासे मैंने आपका दर्शन प्राप्त किया' ॥ ३९-४०१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले— [हे व्यासजी!] उसी समय हिमवान् वहाँ आये। उन्होंने आदरपूर्वक सती [पार्वती]- का हाथ उन शिवके हाथमें दे दिया। तब गन्धर्वोंसहित सभी देवताओंने आदरपूर्वक गजानन गणेशजीका और सज्जनोंका कल्याण करनेवाले शिव-शिवाका पूजन किया। उस समय देवताओंकी दुन्दुभियाँ बजने लगीं और आकाशसे फूलोंकी वृष्टि होने लगी ॥ ४१-४३ ॥ तदनन्तर उन सभीने गजानन गणेशजीको नमस्कारकर विविध स्तोत्रोंसे उनका स्तवनकर उन्हें प्रसन्न किया। भगवान् शंकरने भी जय-जयकार करते हुए गजाननका स्तवन किया ॥ ४४ ॥ तत्पश्चात् [भगवान् शंकर]-ने पार्वतीको अर्धाङ्गिनी बनाकर शीघ्र ही कैलासपर्वतके लिये प्रस्थान किया तथा अन्य सब लोग भी अपने-अपने स्थानको चले गये ॥ ४५ ॥ ब्रह्माजी बोले— हे व्यासजी ! हे महामुने ! तुमने गणाधिपति गणेशजीके व्रतके माहात्म्यके सम्बन्धमें जो कुछ पूछा था, मैंने वह सब कुछ बतला दिया। अब मैं तुमसे पुनः एक अन्य कथानकको कहता हूँ, जिसको सुनकर मनुष्य सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है और उसकी सभी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं ॥ ४६-४७ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'शंकर-पार्वतीके मिलनका वर्णन' नामक पचपनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५५ ॥


छप्पनवाँ अध्याय

गणपत्युपासनाकी महिमाके सन्दर्भमें भृशुण्डीमुनिका आख्यान

भृगुजी बोले— हे राजन् ! इस प्रकार मैंने [गणेश- चतुर्थी व्रतके] सम्पूर्ण माहात्म्यको कहा। अब जो ब्रह्माजीद्वारा व्यासजीके प्रति कहा गया था, उसे तुम पुनः सुनो ॥ १ ॥ सोमकान्त बोले— हे महामुने ! अमित बुद्धिवाले व्यासजीने ब्रह्माजीके मुखसे क्या सुना ? उसे आप कहिये। [उसे श्रवण किये बिना] मुझे तृप्ति नहीं हो रही है ॥ २ ॥ भृगुजी बोले— [हे राजन्!] इस प्रकार [गणेश- चतुर्थीव्रतके माहात्म्य-सम्बन्धी] कथानकको सुनकर व्यासजीने आदरपूर्वक ब्रह्माजीसे पूछा। हे निष्पाप [राजन्] ! तब उन्होंने भी आदरपूर्वक उसको कहना प्रारम्भ किया ॥ ३ ॥ व्यासजी बोले— हे ब्रह्मन् ! आप मुझसे गणनायक गणेशजीकी श्रेष्ठ कथाको पुनः कहिये। विघ्नेश्वर गणेशजीकी सत्कथाको श्रवण करनेकी मेरी लालसा अत्यधिक बढ़ती जा रही है ॥ ४ ॥ ब्रह्माजी बोले— हे व्यासजी ! कौतूहलसे भरी हुई गणेशजीकी एक अन्य कथाका श्रवण करो, जो शूरसेन आदि [राजाओं]-द्वारा अनुभूत है ॥ ५ ॥ मध्य देशके अत्यन्त रमणीय सहस्र नामक नगरमें शूरसेन नामके एक महान् बलवान् राजा हुए। वे वेद- वेदांगके पारगामी विद्वान्, धनवान्, रूपवान्, दानी, यज्ञकर्ता, प्रजाके रक्षक, शक्तित्रय^१से सम्पन्न, मानी, राजनीतिमें व्यवहार्य छः अंगों^२में दक्ष, [शत्रुपर विजय पानेके] चार उपायों^३के प्रयोगमें चतुर, चतुरंगिणी^४ सेनासे सम्पन्न और द्विज- देवताओंके प्रति भक्तिभाव रखनेवाले थे ॥ ६-८ ॥


१. प्रभु, मन्त्र और उत्साह—ये तीन प्रकारकी राजशक्तियाँ होती हैं। २. परराष्ट्रनीतिकी सफलताके लिये राजाद्वारा व्यवहार्य छः उपाय—१.सन्धि, २.विग्रह, ३.यान (चढ़ाई), ४.आसन (विराम), ५.द्वैधीभाव और ६.संश्रय। ३. साम, दान, भेद और दण्ड। ४. पैदल सेना, गजसेना, रथारोही और अश्वारोही।

उ०ख०-अ०५६ ] * गणपत्युपासनाकी महिमाके सन्दर्भमें भृशुण्डीमुनिका आख्यान * १८३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ] सम्पूर्ण पृथिवीमण्डल सदैव उनके वशवर्ती रहा। उनका नगर पृथवीतलपर इन्द्रके नगर (स्वर्ग)-से भी विशिष्ट प्रतीत होता था। उनकी पत्नीका नाम पुण्यशीला था, जो अत्यन्त पुण्यशालिनी थी। उसके रूपकी समानता करनेवाली नारी त्रैलोक्यमण्डलमें कोई नहीं थी ॥ ९-१० ॥ जिसके पातिव्रत्यसम्बन्धी गुणोंको देखकर अरुन्धतीको भी लज्जा आ जाती थी और उसके असूयात्यागको देखकर अनसूया भी लघुताको प्राप्त हो जाती थीं ॥ ११ ॥ किसी समय वे राजा शूरसेन मन्त्रियों और श्रेष्ठ वीरोंसे घिरे हुए राजसभामें विराजमान थे, उस समय उन्होंने नेत्रज्योतिका हरण कर लेनेवाले अग्निसदृश तेजवाले आकाशचारी उत्तम विमानको देखा। उसे देखकर गायन-श्रवणमें आसक्त राजाके साथ सभी सभासद् व्याकुल होकर 'यह क्या है, यह क्या है?'— कहते हुए दूतोंको इस विषयमें ज्ञात करनेके लिये प्रेरित करने लगे। [तब] वे दूत उस सूर्यसदृश प्रभाववाले विमानको देखनेके लिये गये ॥ १२-१४ ॥ [उन राजदूतोंमें] एक कोई राजदूत, जो वैश्य-पुत्र था और [किसी उत्कट पापके कारण] कुष्ठरोगसे ग्रस्त था। उसकी दृष्टि पड़ते ही वह विमान भूतलपर गिर पड़ा। तदनन्तर दूतोंने राजाके पास जाकर कहा—'हे महाराज! पुण्यशाली देवगणोंसे संयुक्त वह देदीप्यमान विमान किसी दुष्टके दृष्टिपातसे भूतलपर गिर पड़ा' ॥ १५—१६ १/२ ॥ तब अत्यन्त हर्षित राजा दो मन्त्रियोंको साथ ले अश्वपर आरूढ़ हो विमानको देखनेकी उत्सुकतासे अपनेको महान् भाग्यशाली मानते हुए अपने बन्धु- बान्धवोंसहित वहाँ गये। उस समय अनेक प्रकारके बाजे बज रहे थे। वहाँ उन सबने सौ यज्ञोंके कर्ता इन्द्रको देखा। उन्हें देखकर सब अपने-अपने वाहनोंसे उतर गये और उन्हें प्रणाम किया ॥ १७-१९ ॥ तदनन्तर अनेक प्रकारके अलंकारोंसे अलंकृत और सम्पूर्ण देवगणोंसे घिरे हुए बल दैत्यका वध करनेवाले इन्द्रसे राजाने हाथ जोड़कर कहा—'हे शचीपते ! आज यह धरणी धन्य हो गयी, मेरा जन्म लेना धन्य हो गया, मेरी सम्पत्ति धन्य हो गयी, मेरे पूर्वज तथा हम सबके नेत्र

[दायाँ स्तम्भ] आज धन्य हो गये, जो कि इस मृत्युलोकमें अनुगामियोंसहित मुझे आपका दर्शन प्राप्त हुआ ॥ २०—२१ १/२ ॥ ब्रह्मा, ईशान (शिव) आदि देवता भी जिनके वशवर्ती हैं, जिनका दर्शन सौ अश्वमेध यज्ञोंद्वारा ही सम्भव है, अन्य किसी भी भाँति नहीं, ऐसे आपका आज हम सब लोगोंको दर्शन न जाने किस पुण्यसे हुआ है! हे प्रभो ! यह आपका जो विमान है, वह पृथवीतलपर कैसे गिर पड़ा ? हे देव ! सम्प्रति मेरा यह संशय आप दूर करें और आप कहाँ गये थे अथवा कहाँ जायँगे— यह भी बतलाइये' ॥ २२—२४ १/२ ॥ शतक्रतु इन्द्र बोले—हे राजन् ! उस आश्चर्यमयी घटनाको सुनो, जिसे नारदजीने मुझसे कहा था। हे नृप ! मैं उसे तुमसे कहता हूँ, एकाग्रचित्त होकर [उसका] श्रवण करो ॥ २५ १/२ ॥ नारदजी बोले—हे शक्र ! मैं मृत्युलोक (पृथ्वी)- में भृशुण्डीके आश्रममें गया था, वे गणेशजीके स्वरूपमें स्थित होकर निरन्तर (रात्रि-दिन) [गणेशजीके मन्त्रका] जप करते रहते हैं ॥ २६ ॥ उनके द्वारा [गणेशजीके स्वरूपका] ध्यान किये जानेसे उनका भी स्वरूप वैसा (गणेशजीके स्वरूप- जैसा) ही हो गया है—यह आश्चर्यमयी घटना मैंने वहाँ देखी। उन गजाननस्वरूपधारी मुनिद्वारा पूजित होकर, उन्हें नमस्कारकर और उनकी आज्ञा ले मैं यहाँ आपके दर्शनके लिये आ गया। हे शतयज्ञकर्ता इन्द्र ! मैंने ऐसा [विलक्षण] सारूप्य पृथ्वीपर अन्यत्र कहीं नहीं देखा ! ॥ २७-२८ ॥ इन्द्र बोले—[हे राजन् !] तब मैं नारदजीका पूजनकर और उन्हें विदाकर उसी क्षण अत्यन्त उत्सुकतापूर्वक उस प्रकारके मुनिका दर्शन करनेके लिये चल दिया ॥ २९ ॥ मन और वायुके समान वेगशाली श्रेष्ठ विमानमें आरूढ़ होकर मैंने गजाननरूपधारी [भृशुण्डी] मुनिके [पास जाकर उनका] दर्शन किया। उनका सम्यक् प्रकारसे पूजनकर, उनके चरणोंमें प्रणामकर तथा उनकी पूजा ग्रहणकर जब सपरिवार अमरावती जानेकी इच्छासे

१८४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 मैं चला, तो तुम्हारे नगरके समीप यह विमान जैसे ही पहुँचा, उसी समय तुम्हारे कुष्ठरोगसे ग्रस्त पापी दूतकी दृष्टि पड़ते ही यह यहाँ भूतलपर गिर पड़ा। हे नृप! मैंने सारी बात तुमसे कह दी ॥ ३०-३२१/२॥ [राजा] शूरसेन बोले- हे शतक्रतु इन्द्र! किस तपस्यासे या किस व्रत-साधनसे भृशुण्डीने गजाननका स्वरूप प्राप्त कर लिया? हे प्रभो! वह सब मुझसे कहिये। प्राणीको जैसे अमृतका पान करनेपर तृप्ति नहीं होती, और पीनेकी इच्छा रहती है, वैसे ही इस अमृतोपम कथाका श्रवण करते हुए मुझे तृप्ति नहीं हो रही है अर्थात् गणपति-महिमा-सम्बन्धिनी अन्य कथाओंका श्रवण करनेकी लालसा बढ़ती जा रही है। हे स्वामिन्! गजाननकी अमृतोपम कथाओंको सुननेसे कौन विरत हो सकता है॥ ३३-३४॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'शक्रके विमानका पतन' नामक छप्पनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५६ ॥ सत्तावनवाँ अध्याय भृशुण्डीमुनिका प्रारम्भिक जीवन, मुद्गलमुनिकी उनपर कृपा, उनकी कठोर तपस्या तथा उन्हें गणेश-सारूप्यकी प्राप्ति शतक्रतु इन्द्र बोले— [हे राजन्!] अब मैं तुमसे इस प्राचीन कथाको कहता हूँ कि जिस प्रकार मुनि भृशुण्डीने गणाधिपति गणेशजीकी भक्तिके प्रभावसे उनका सारूप्य प्राप्त कर लिया था ॥ १ ॥ दण्डकारण्य देशमें 'नन्दुर' संज्ञक नगरमें 'नाम' नामसे प्रसिद्ध एक दुष्ट मछुआरा रहता था ॥ २॥ वह बाल्यकालसे ही चोरी करने लग गया था और युवा होनेपर परायी स्त्रियोंसे व्यभिचारकर्म करने लगा था। वह दूसरोंके न देखते और देखते हुए भी उनकी वस्तुएँ चुरा लेता था तथा 'मैंने चोरी नहीं की' इस प्रकारकी शपथ भी ले लेता था ॥ ३ ॥ वह दो व्यक्तियों (सुहृदों)-के हृदयमें भेद उत्पन्न करनेके लिये मिथ्या शपथ लेता था। वह जुआ खेलने और मदिरा पीनेमें लगा रहता था, इसलिये लोगोंने उसे गाँवसे बाहर निकाल दिया। तब वह वहाँसे बहुत दूर वन्य प्रान्तके पहाड़की एक गुफामें पत्नीसहित रहने लगा। उसने उस मार्गमें जानेवाले बहुत-से पथिकोंको मार डाला था। इस प्रकार [जब] उसके पास बहुत- सा धन हो गया तो उसने उससे बच्चोंसहित अपनी स्त्रीको अनेक प्रकारके अलंकारोंसे विभूषित किया और अपने धन-वैभवसे उन्हें सन्तुष्ट किया ॥ ४-६॥ वह शस्त्र, तलवार-ढाल, बहुत-से पाश, उत्तम धनुष, दोनों सिरोंपर लौहबद्ध लाठी और बाणोंसे परिपूर्ण विशाल तरकस धारण किये रहता था ॥ ७ ॥ वह वृक्षकी किसी ऊँची डालपर बैठकर या उसके कोटर (खोखले भाग)-में छिपकर [उस मार्गसे जानेवाले] बहुत-से यात्रियोंको मारकर उनकी विविध वस्तुओं, वस्त्रों तथा आभूषणोंको लाकर घरमें संचित करता था तथा दूसरे नगरमें ले जाकर उन्हें बेच देता था और नित्य अपने भवनमें यथेष्ट विषयोंका सेवन किया करता था ॥ ८-९॥ इस प्रकार पापपूर्ण आचरण करनेवाला वह वनमें अनेक पशुओंका भी वध करता था। एक बार किसी वन्य पशुके पीछे दौड़ता हुआ वह एक योजन दूरतक चला गया ॥ १० ॥ [परंतु] पशु उसकी पहुँचसे दूर जा चुका था और वह [दौड़ता हुआ] थककर धरतीपर गिर पड़ा। तदनन्तर वह दुष्ट बड़े कष्टसे उठकर धीरे-धीरे चलने लगा। मार्गमें चलते हुए उसने पवित्र गणेशतीर्थको देखा। वहाँ उसने केवल श्रमका परिहार करनेके लिये ही स्नान किया ॥ ११-१२ ॥ तदनन्तर अपने व्यवसाय (लूट-पाट)-के उद्देश्यसे जब वह जा रहा था तो मार्गमें उसने मुद्गल [मुनि]- को देखा, जो गणनाथ गणेशजीके नाम-मन्त्रका जप कर रहे थे ॥ १३ ॥

उ०ख०-अ०५७ ] * भुशुण्डिमुनिका प्रारम्भिक जीवन * १८५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ] तब वह 'नाम' नामका मछुआरा म्यानसे तलवार निकालकर उसे उठाये मुद्गल [मुनि]-के निकट उन्हें मार डालनेका मन बनाकर गया। [परंतु] गजानन गणेशजीके भक्त मुद्गलके प्रभावसे उसके शस्त्र तथा दृढ़ मुट्ठीसे तलवार भी फिसल गयी और उस दुष्टकी बुद्धि भी उसी क्षण परिवर्तित हो गयी॥ १४-१५१/२ ॥ उसे उस अवस्थामें देखकर वे मुनिवर [मुद्गलजी] हँस पड़े। तत्पश्चात् संयतचित्त होकर उससे पूछा— बताओ, तुम्हारे सभी शस्त्र बँधे होनेपर भी क्यों गिर पड़े? ॥ १६-१७ ॥ इन्द्र कहते हैं— [हे राजा शूरसेन!] गणेशतीर्थमें स्नान करने और उन मुनिका दर्शन करनेसे ज्ञान-वैराग्यसे युक्त हुआ वह [मछुआरा] मुद्गलजीसे बोला ॥ १८ ॥ मछुआरा बोला— हे ब्रह्मन् ! मैं यह अत्यन्त आश्चर्यकी बात मानता हूँ कि इस कुण्ड (गणेशतीर्थ)- में स्नान और विशेष रूपसे आपके दर्शनसे मेरी बुद्धि परिवर्तित हो गयी। बाल्यकालसे ही मेरी बुद्धि दुष्टतापूर्ण और पापपरायण हो गयी थी। हे प्रभो! मैंने आजतक असंख्य पाप किये हैं ॥ १९-२० ॥ इस समय आपकी कृपासे मेरी मति [इन पाप- कर्मोंसे] विरक्त हो गयी है। अब मैं अपने इन गिरे हुए शस्त्रोंको पुनः ग्रहण नहीं करूँगा ॥ २१ ॥ अब आप मेरे ऊपर पूर्ण कृपा कीजिये और मेरा इस भवसागरसे उद्धार कीजिये। साधु पुरुष दीन पापीजनोंपर भी अनुग्रह करते हैं। हे महामुने! जैसे पारसमणिका धातुओंसे सम्पर्क व्यर्थ नहीं होता, वैसे ही साधु पुरुषोंकी संगति कभी भी व्यर्थ नहीं देखी गयी है ॥ २२-२३ ॥ इन्द्र कहते हैं— [हे राजन्!] उस मछुआरेके इस प्रकार कहनेपर शरणागतके त्यागमें दोषका विशेष रूपसे स्मरण करते हुए वे मुद्गलमुनि उससे कृपापूर्वक बोले— ॥ २४ ॥ मुद्गलजी बोले— दानादि कृत्य विधिपूर्वक किये जाते हैं, उनमें तुम्हारा अधिकार नहीं है, तथापि तुमपर कृपा करनेके लिये तुम्हें गजानन गणेशजीके मनुष्योंके लिये सभी सिद्धियोंको देनेवाले नामजपका उपदेश करता

[दायाँ स्तम्भ] हूँ। तदनन्तर [जब वह] कैवर्तक महर्षि मुद्गलको प्रणाम करने लगा, तो उन्होंने उसके मस्तकपर अपना अभयप्रद श्रीहस्त स्थापित किया और 'गणेशाय नमः'— इस नाममन्त्रका उपदेश दिया ॥ २५-२६१/२ ॥ उन्होंने अपनी यष्टिको उसके सामने भूमिमें रोपित कर दिया और उससे प्रीतिपूर्वक बोले कि जबतक इस यष्टिमें अंकुर न निकल आये और जबतक मैं आ न जाऊँ, तबतक तुम इस मन्त्रका जप करते रहो ॥ २७-२८ ॥ एक आसनमें बैठकर वायुमात्रका भक्षण करते हुए एकाग्रचित्तसे [जप करते हुए] सायं-प्रातः नित्य- निरन्तर यष्टिमूलमें जल डालते रहना ॥ २९ ॥ इन्द्र बोले— मछुआरा नाम मुद्गलमुनिद्वारा उपदेश पाकर और उन मुनिके अन्तर्हित हो जानेके बाद अपने जीवनसे निराश होकर वहीं स्थित हो गया ॥ ३० ॥ मुनिकी यष्टिको सामने रखकर वनमें वृक्षकी छायाका आश्रय लेकर एक आसनमें स्थित हुआ वह [गणेशजीके] नाममन्त्रका [निरन्तर] जप करता रहा ॥ ३१ ॥ निराहार और निराकांक्ष रहते हुए इन्द्रियसूहोंपर विजय पाकर एवं मनको वशमें करके [वह तप करता रहा।] इस प्रकार सहस्र वर्ष बीत जानेपर उस यष्टिमें अंकुर निकल आये। तब वह मुनिके आगमनकी प्रतीक्षा करने लगा। [उस समय] उसका शरीर दीमकोंकी बाँबीसे वेष्टित हो गया था और उसपर लताओंका जाल-सा फैल गया था ॥ ३२-३३ ॥ तदनन्तर वे मुद्गलमुनि दैववशात् उस स्थानमें आये, तो उन्हें उस कैवर्त (मछुआरे) और यष्टिका स्मरण हुआ। तब भ्रमण करते हुए उन मुनिने उस उत्तम यष्टिको अंकुरित हुए और उस मछुआरेको दीमकोंकी बाँबीसे आक्रान्त शरीरवाला देखा ॥ ३४-३५ ॥ उसका वह उत्तम तप सम्पूर्ण मुनियोंके लिये भी दुष्कर था। उस समय उन मुद्गलमुनिने बड़े प्रयत्नपूर्वक मात्र नेत्रोंको देखकर उसे पहचाना ॥ ३६ ॥ तदनन्तर उन मुनिश्रेष्ठने उसके शरीरपर स्थित दीमकोंकी बाँबीको हटाया और अभिमन्त्रित जलसे उसके

१८४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 सम्पूर्ण शरीरका सिंचन किया। तदुपरान्त जपके प्रभावसे दिव्य शरीर तथा गणपति के सारूप्यको पा लेनेवाले उस कैवर्तकको मुनिने सम्बोधित किया ॥ ३७-३८ ॥ उसके दो [दिव्य] हाथ थे और वह भगवान् विनायकके शुभ नामका जप कर रहा था। मुनिके द्वारा उद्बोधित किये जानेपर उसने अपने नेत्र खोले ॥ ३९ ॥ उसके नेत्रोंसे उत्पन्न अग्नि विद्युत्की भाँति आकाशको चली गयी और वह त्रिलोकीको दग्ध करनेके लिये उद्यत हो गयी, तब मुनिके द्वारा उसका निवारण किया गया। वह मछुआरा भी अपने करुणामय गुरु उन मुद्गलमुनिको नमनकर और उनका आलिंगनकर वैसे ही प्रसन्न हुआ, जैसे पुत्र अपने पिताका आलिंगनकर प्रसन्न होता है ॥ ४०-४१ ॥ तब उस 'नाम' नामक मछुआरेको, जिसे उपदेश दिया था, पुनः वल्मीकसे उत्पन्न होनेके कारण उन्होंने अपना पुत्र मान लिया। हे राजन् ! मुद्गलमुनिने उसका आदरपूर्वक नामकरण किया; उसके भ्रूमध्यसे शुण्डा (सूँड़) निकल आयी थी, इसलिये उन्होंने उसका 'भृशुण्डी' नाम रखा ॥ ४२-४३ ॥ तदनन्तर उन मुद्गलमुनिने उसे एकाक्षर मन्त्रका उपदेश दिया और वरदान देते हुए कहा कि तुम मेरे वचनके प्रभावसे इस एकाक्षरमन्त्रके ऋषि बनो और मुनियोंमें श्रेष्ठ हो जाओ। इन्द्रादि देवताओं, गन्धर्वों और सिद्धोंके लिये भी पूज्य हो जाओ। जैसे भगवान् गणेशका ध्यान और दर्शन पापोंका नाश करनेवाला होता है, वैसे ही [प्रभावसे सम्पन्न हुए] हे मुनि ! तुम भृशुण्डीके रूपमें विख्यात हो जाओ। जिसको तुम्हारा दर्शन हो जाय, वह मनुष्य कृतकृत्य हो जायेगा ॥ ४४-४६ ॥ मेरे कथनानुसार (आशीर्वादसे) तुम्हारी आयु एक लाख कल्पोंकी होगी। इस प्रकार मुद्गलजी जब उसे बहुत-से वरदान दे रहे थे, तो उसी समय इन्द्रादि देवता और नारदादि मुनि भी उसका दर्शन करनेके लिये आये और उसे प्रणिपात करते हुए बोले- 'हे भृशुण्डी ! आपके दर्शनसे हमारा जन्म, हमारी विद्या, हमारे माता- पिता, हमारी तपस्या और हमारा यश सार्थक हो गया ॥ ४७-४८ ॥ हे मुने! आप ही गणनाथ हैं, आप ही हमारे पूजनीय हैं। तब उन भृशुण्डीमुनिने भी उन सबका सम्यक् प्रकारसे पूजनकर, उन्हें प्रणामकर विदा कर दिया ॥ ४९ ॥ तत्पश्चात् वे पुनः पद्मासनमें स्थित होकर एकाक्षर मन्त्रका जप करने लगे। वे अपने सम्मुख गणेशजीकी सुन्दर मूर्तिकी प्रतिष्ठाकर प्रतिदिन उसका षोडश उपचारोंसे पूजन करने लगे। उनका आश्रम वापी, सरोवर, वृक्ष और लताओंसे सुशोभित हो रहा था। वहाँ सिंह और मृग तथा नेवले एवं विषधर सर्प भी वैरका त्यागकर रहते थे ॥ ५०-५१ १/२ ॥ तदनन्तर सौ वर्ष बीत जानेपर गजानन गणेशजी प्रसन्न हुए और बोले- 'तुम तो मेरा सारूप्य प्राप्त कर लिये हो, फिर अब क्यों तपस्या कर रहे हो ? तुम तो कृतकृत्य हो चुके हो अर्थात् तुम्हारे सारे कार्य पूर्ण हो गये हैं; अब तुम अपनी आयु पूर्णकर अन्तमें मेरे सायुज्यको प्राप्त करोगे ॥ ५२-५३ ॥ यह क्षेत्र 'नामल'* नामसे सुविख्यात होगा। यहाँ अनुष्ठान करनेवाले मनुष्योंको अनेक प्रकारकी सिद्धियाँ प्राप्त होंगी ॥ ५४ ॥ यहाँ स्थित मेरी मूर्तिके दर्शनसे मनुष्य पुनर्जन्मका भागी नहीं होगा। [इसके दर्शनसे] पुत्रहीन व्यक्तिको पुत्रलाभकी और विद्यार्थीको ज्ञानकी प्राप्ति होगी ॥ ५५ ॥ इन्द्र बोले- हे नृपश्रेष्ठ शूरसेन! तुमने जो कुछ पूछा था, वह सब कुछ मैंने वर्णन कर दिया। अब तुम और क्या सुनना चाहते हो ? ॥ ५६ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'भृशुण्डी-उपाख्यान' नामक सत्तावनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५७ ॥

  • यह प्राचीन 'अमलाश्मक्षेत्र' है। धर्मराज यमने माताके शापसे छूटनेके लिये यहाँ गणेशजीकी आराधना की थी। यमराजद्वारा स्थापित आशापूरक गणेशजीकी मूर्ति भी यहाँ है। यहाँपर 'सुबुद्धिप्रदतीर्थ' नामक कुण्ड भी है। भृशुण्डि योगेन्द्रकी भी यहाँ मूर्ति है।

अट्ठावनवाँ अध्याय

उ०ख०-अ०५८ ] * संकष्टचतुर्थीव्रतकी महिमाके प्रसंगमें भृशुण्डीमुनिके पितरोंके उद्धारकी कथा * १८७ अट्ठावनवाँ अध्याय संकष्टचतुर्थीव्रतकी महिमाके प्रसंगमें भृशुण्डीमुनिके पितरोंके उद्धारकी कथा ब्रह्माजी बोले—हे व्यासजी! मरुत्वान् इन्द्रके इस प्रकारके उत्तम वचन सुनकर और उस [भृशुण्डि मुनिकी] अमृतोपम कथाका श्रवणकर प्रसन्न हुए राजा शूरसेनने उनसे पुनः पूछा—॥ १॥ शूरसेन बोले— हे देवेन्द्र! किस उपायसे आपका विमान आकाशमें जा सकेगा? हे विभो! उस उपायको कीजिये अथवा बताइये कि मैं आपके लिये क्या करूँ? ॥ २ ॥ ब्रह्माजी बोले—हे व्यासजी! इस प्रकारसे पुनः प्रश्न करनेवाले राजा शूरसेनसे सभी लोगोंके सुनते हुए देवशत्रुओंका वध करनेवाले इन्द्रने हँसते हुए-से यह वचन कहा— ॥ ३ ॥ इन्द्र बोले—हे नृपश्रेष्ठ! यदि आपके नगरमें कोई ब्राह्मण या क्षत्रिय भी संकष्टचतुर्थीका व्रत करनेवाला हो तो उसके द्वारा एक वर्षतक किये गये उस व्रतके पुण्यका सम्यक् प्रकारसे दान दिये जानेपर ही यह गमन कर सकेगा; अन्यथा हे राजन्! यह अयुत (दस हजार) पुरुषोंके प्रयत्न करनेपर भी नहीं चल सकता ॥ ४-५ ॥ राजा बोले—[हे विभो!] मुझे बताइये कि वह मंगलकर संकष्टचतुर्थीव्रत कैसा है? उसका क्या पुण्य है? उसका क्या फल है? उसकी विधि क्या है और उसमें किस देवताका पूजन किया जाता है? ॥ ६ ॥ यहाँ प्राचीनकालमें किसने इस व्रतको किया था, जिसे करनेसे सिद्धि प्राप्त हुई हो। हे इन्द्र! कृपया यह सब विस्तारपूर्वक बताइये ॥ ७ ॥ इन्द्र बोले—[हे राजन्!] इस सन्दर्भमें एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है, जिसमें कृतवीर्य[के पिता] और नारदजीका संवाद है ॥ ८ ॥ इस पृथ्वीतलपर कृतवीर्य नामक एक बलवान् राजा हुआ था। जो सत्यवादी, शीलसम्पन्न, दानी, यज्ञकर्ता, मानी, महारथी, जितेन्द्रिय, अल्पाहारी और देव-ब्राह्मण-पूजक था। उसके अश्वारोही, गजारोही योद्धाओं, रथियों और धनुर्धारियोंकी संख्याकी गणना नहीं हो सकती थी। हे राजन्! वे सभी सह्याद्रिक्षेत्रके निवासी थे॥ ९-१०१/२ ॥ उसके राजभवनमें सभी पलँग और पात्र सोनेके ही थे। उनके यहाँ भोजन पकानेके लिये भी कभी ताम्रपात्रका प्रयोग नहीं होता था। उसके यहाँ बारह हजार ब्राह्मण पंक्तिबद्ध होकर भोजन करते थे ॥ ११-१२ ॥ त्रैलोक्यसुन्दरी सुगन्धा उसकी पत्नी थी, जो धार्मिक स्वभाववाली, पतिव्रता और पतिको प्राणोंसे भी अधिक प्रिय माननेवाली थी। वह अनेक प्रकारके अलंकारोंसे अलंकृत, सौभाग्यवती और ब्राह्मणों, देवताओं एवं अतिथियोंके पूजनमें रुचि रखनेवाली थी। हे राजन्! वे दम्पती (राजा-रानी) इस प्रकारके अर्थात् सर्वगुणसम्पन्न होते हुए भी पुत्रहीन थे ॥ १३-१४ ॥ पुत्रप्राप्तिहेतु उन दोनोंने सभी प्रकारके दान, व्रत और तप किये तथा अन्य नियमोंका पालन किया एवं प्रभूत दक्षिणावाले यज्ञ किये। पुत्र-प्राप्तिकी लालसासे उन्होंने अनेक तीर्थों एवं [पुण्य] क्षेत्रोंकी यात्रा की, फिर भी जन्मान्तरमें किये हुए पापोंके कारण उन्हें पुत्र नहीं हुआ ॥ १५-१६ ॥ [तब] दुखी होकर राजाने एक बार मन्त्रियोंको बुलाकर राज्य, राजमुद्रा, कोश, प्रजा और जनपद—सब कुछ उन्हें दे दिया और रानीसहित [किसी] श्रेष्ठ वनको चले गये। [वहाँ पहुँचकर] वे दम्पती वल्कल और मृगचर्म धारणकर तपमें स्थित हो गये ॥ १७-१८ ॥ केवल सूखे पत्तों तथा वायुमात्रका आहार करते हुए उन दोनोंने इन्द्रियों एवं आहारपर नियन्त्रण कर लिया था। [समस्त शरीरके वल्मीक और लताजालोंसे आवृत हो जानेके कारण] उन दोनोंके मात्र नेत्र ही परिलक्षित होते थे। उन्हें इस अवस्थामें देखकर नारद मुनिने पितृलोकमें स्थित कृतवीर्यके पितासे कहा— 'मृत्युलोक (पृथ्वी)-में तुम्हारा पुत्र कृतवीर्य पुत्रहीन होनेके कारण प्रायोपवेशन (अनशन)-पर बैठा है, वह कल या परसों मर सकता है। यदि उसे स्वर्गलोककी प्राप्ति करानेवाला पुत्र प्राप्त हो जाय, तभी वह कृतवीर्य

१८८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ - ऊपर] जीवित रह सकेगा या मरनेपर स्वर्गलोकको प्राप्त करेगा-इस प्रकार कहकर नारदजी [वहाँसे] चल दिये, तभी उन्होंने पृथ्वीलोकमें [भृशुण्डीमुनिके गणेशजीसे सारूप्य-सम्बन्धी] अद्भुत घटना देखी ॥ १९-२२॥ [उधर] भृशुण्डीके माता-पिता, उनके दोनों पुत्र और पुत्रीसहित पत्नी-ये सभी अग्निकी ज्वालाओंसे परिपूर्ण कुम्भीपाक नामक भयंकर नरकमें नीचेकी ओर मुख करके लटक रहे थे। यमदूतोंके द्वारा पीटे जानेपर वे अनेक प्रकारसे चीख-पुकार करते हुए क्रन्दन कर रहे थे। उनके क्रन्दनको सुनकर दयानिधान नारदजीने आकर भृशुण्डीसे उनके दुःखको कहा ॥ २३-२४१/२॥ नारदजीने कहा-हे महामुने! गणेशजीके सारूप्यको प्राप्त हुए जिन आपका दर्शन करनेके लिये इन्द्र आदि देवगण तथा कपिल आदि मुनिगण आते हैं, उन आपके माता, पिता, पत्नी, पुत्र, पुत्री और सेवक आपके दोषसे यमलोकस्थ कुम्भीपाक नरकमें क्यों पकाये जा रहे हैं? आप स्वयं भी ज्ञानसम्पन्न हैं, फिर इस बातको क्यों नहीं जानते? आप अपने पूर्वजोंके उद्धारका प्रयत्न कीजिये ॥ २५-२७१/२॥ इन्द्र बोले- [हे राजा शूरसेन!] मुनिके द्वारा कहे गये वचनोंको सुनकर भृशुण्डी अत्यन्त दुखित हो गये। अपने पितरोंके दुःखसे दुखी होकर वे प्रज्वलित अग्निकी भाँति सन्तप्त हो उठे। तब उन्होंने उनके उद्धारका उपाय सोचा ॥ २८-२९॥ तदनन्तर परोक्ष तत्त्वके ज्ञाता भृशुण्डीने ध्यानद्वारा

[दायाँ स्तम्भ - ऊपर] [अपने पितरोंकी स्थिति] देखकर भगवान् गजाननका ध्यान करते हुए हाथमें पवित्र जल लेकर संकष्टचतुर्थीव्रत- जनित पुण्यफल अपने पितरोंको प्रदान किया। तदनन्तर पितरोंके उद्देश्यसे भगवान् गणेशसे प्रार्थना करते हुए कहा- ॥ ३०-३१॥ भृशुण्डी बोले-हे गणपति गणेशजी ! यदि मैंने भक्तिपूर्वक आपका व्रत किया हो, तो उसके प्रभावसे आप शीघ्र ही मेरे पूर्वजोंका उद्धार कीजिये ॥ ३२॥ ऐसा कहकर उन्होंने उस जलको गजानन गणेशजीके हाथमें डाल दिया। तब उस जलके डालते ही गणेशजीकी कृपासे उनके सभी पितर देवताओंके-से स्वरूपवाले होकर विमानोंमें आरूढ़ हो भगवान् गणेशजीके धामको चले गये। उस समय अप्सराएँ उनकी सेवा कर रही थीं, चारण उनकी स्तुति कर रहे थे और गन्धर्व उनका यशोगान कर रहे थे ॥ ३३-३४१/२॥ कुम्भीपाक नरकमें जो दूसरे भी पापी मनुष्य थे, वे भी विमानोंमें आरूढ़ होकर गणेशजीके धामको चले गये। इस प्रकार मैंने तुमसे इस व्रतकी महिमाका वर्णन कर दिया ॥ ३५-३६ ॥ जबकि उस व्रतका मात्र एक दिनका पुण्य प्रदान करनेसे वे सब सद्गतिको प्राप्त हो गये तो जिसने जन्मभर आदरपूर्वक संकष्टचतुर्थीका व्रत किया है, उसके पुण्यकी गणना करनेमें शेषजी भी सक्षम नहीं हैं। इसलिये उस व्यक्तिद्वारा दिये गये पुण्यके प्रभावसे मेरा विमान गतिमान् हो जायगा ॥ ३७-३८ ॥

[मध्य भाग] ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'संकष्टचतुर्थीव्रत-माहात्म्य-कथन' नामक अठ्ठावनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५८ ॥

उनसठवाँ अध्याय कृतवीर्यके पूर्वजन्मकी कथा, संकष्टचतुर्थीव्रतकी विधि और उसकी महिमा

[बायाँ स्तम्भ - नीचे] राजा बोले-[हे देवेन्द्र !] भृशुण्डीमुनिके उन पितरोंके कुम्भीपाक नरकसे निकलकर दिव्य लोक (गणेशजीके धाम)-में चले जानेपर कृतवीर्यके पिताने [अपनी वंश-परम्पराको बचाये रखनेके लिये] कौन- सा उपाय किया? ॥ १ ॥ इन्द्र बोले- [हे राजन् !] अपने वंश-विच्छेदकी

[दायाँ स्तम्भ - नीचे] सम्भावना सुनकर दुखी हुए कृतवीर्यके पिता शीघ्र ही ब्रह्मलोकको गये और वहाँ कमलपर आसीन ब्रह्माजीका दर्शन किया ॥ २ ॥ उन्होंने उन्हें प्रणाम करके उनसे अपने वंशके विच्छेदका कारण पूछते हुए कहा-'हे विधाता! मेरा पुत्र अत्यन्त धर्मात्मा, दानी, यज्ञकर्ता, देवताओं और

उ०ख०-अ०५९] * कृतवीर्यके पूर्वजन्मकी कथा, संकष्टचतुर्थीव्रतकी विधि और उसकी महिमा * १८९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ] अतिथियोंके प्रति भक्तिभाव रखनेवाला तथा मान्यजनोंका अतिशय सम्मान करनेवाला है। उसने पुत्र-प्राप्तिके लिये अनेक प्रकारके प्रयत्न भी किये हैं॥ ३-४॥ हे सुरेश्वर! फिर भी उसके पुत्र क्यों नहीं हुआ? अपना राज्य मन्त्रियोंको सौंपकर [इस समय] वह मात्र वायुका आहार करते हुए वनमें स्थित है॥ ५॥ उसके शरीरमें मात्र हड्डियाँ ही रह गयी हैं और वह आज या कल ही मर सकता है। हे प्रभो! जिससे उसके जन्मान्तरीय पापका नाश हो जाय—उस उपायको आप मुझसे दयाकर कहिये। हे कमलासन! अपने वंशकी वृद्धिके लिये मैं उस उपायको अपने पुत्रको प्राप्त करा दूँगा। तब उनकी इस प्रकारकी मधुर वाणीको सुनकर ब्रह्माजीने भी वैसी ही मधुर वाणीमें कहा कि मेरे द्वारा कथित अपने पुत्रके पूर्वजन्मके वृत्तान्तको सुनो॥ ६-८॥ [कृतवीर्य जिस नगरका राजा है,] उसी नगरमें पूर्वकालमें साम नामका एक अन्त्यज रहता था। वह इतना अधिक पापी था कि उसको देख लेनेमात्रसे पुण्योंका नाश हो जाता था। एक बार उस [पापी]-ने लोभवश रास्तेमें [जाते हुए] सांसारिक विषय-वासनाओंके प्रति तटस्थ भाव रखनेवाले बारह ब्राह्मणोंको मार डाला और उन्हें एक गुफाके अन्दर फेंक दिया॥ ९-१०॥ हे राजन्! तदनन्तर उनका सब कुछ लेकर वह माघ कृष्ण चतुर्थीकी रात्रिमें चन्द्रमाके उदय होनेपर अपने घर आ गया। [वहाँ आकर] उसने 'गणेश! गणेश!' कहकर शीघ्रतापूर्वक अपने पुत्रको बुलाया। उस दिन पूरे दिन उसे अन्न-जल नहीं प्राप्त हुआ था, अतः उसने उसीके साथ प्रसन्नतापूर्वक भोजन किया। हे राजन्! बहुत-सा समय बीत जानेके बाद कृष्णपक्षकी चतुर्थीको ही रात्रिमें चन्द्रमाके उदय होनेके बाद उसकी मृत्यु हो गयी॥ ११-१३॥ अज्ञानपूर्वक किये गये संकष्टचतुर्थीव्रतजनित पुण्यके प्रभावसे वह श्रेष्ठ विमानमें आरूढ़ होकर भगवान् गणेशके सुखदायी धाममें चला गया। उस समय अप्सराओंके समूह उसपर पंखा डुला रहे थे तथा विमानस्थित [चारण और गन्धर्व आदि] दिव्य पुष्पोंसे अर्चनाकर उसकी स्तुति कर रहे थे॥ १४-१५॥

[दायाँ स्तम्भ] उसी पुण्यके शेष रह जानेके कारण वह पृथ्वीपर तुम्हारे पुत्र राजा कृतवीर्यके नामसे उत्पन्न हुआ, जो [पूर्वजन्मकृत ब्रह्महत्याके पापके कारण] अभीतक पुत्रहीनताको प्राप्त है। हे अनघ! उस महापापका क्षय हो जानेपर ही उसे पुत्र उत्पन्न हो सकता है॥ १६ १/२॥ हे नृपश्रेष्ठ! ब्रह्माजीके इस प्रकारके वचन सुनकर वे काँपने लगे। तत्पश्चात् उन्होंने पुनः पापनाशका उपाय पूछा— ॥ १७ १/२॥ कृतवीर्यके पिता बोले—हे विधाता! उसके द्वारा किया गया ब्रह्महत्याजनित पाप कैसे नष्ट होगा? हे करुणासिन्धु! यद्यपि वह उपाय अत्यन्त दुष्कर होगा, फिर भी उसे बताइये॥ १८ १/२॥ ब्रह्माजी बोले—यदि तुम्हारा पुत्र संकष्टचतुर्थी नामक व्रतको सम्यक् रूपसे करेगा, तो वह पापसे मुक्त हो जायगा॥ १९ १/२॥ राजा (कृतवीर्यके पिता) बोले—हे ब्रह्मन्! उस व्रतको कैसे और किस शुभ मासमें किया जाता है? हे स्वामिन्! वह सब मुझसे कहिये, जिससे वह पाप नष्ट हो सके॥ २० १/२॥ ब्रह्माजी बोले—माघमासके कृष्णपक्षकी चतुर्थी यदि मंगलवारको पड़े तो चन्द्रमाके अनुकूल होनेपर शुभ मुहूर्तमें इस व्रतका प्रारम्भ करे। पहले दातून करे, फिर इक्कीस बार [किसी पवित्र नदी या सरोवरमें डुबकी लगाकर] स्नान करे॥ २१-२२॥ तत्पश्चात् नित्य कर्मोंका सम्पादनकर [गणेशजीके] श्रेष्ठ मन्त्रका जप करे। निराहार और मौन रहते हुए परनिन्दासे दूर रहे। नियमोंका पालन करे, दुष्कर्म न करे। ताम्बूल-सेवन, जलपान, परद्रोह तथा चुगली न करे। दिनके अन्तमें अर्थात् सायंकाल तिल और आँवलेके चूर्णको शरीरमें लगाकर स्नान करे [गणेशजीके] एकाक्षर, षडक्षर अथवा वैदिक मन्त्रका जप करे॥ २३-२५॥ गणेशजीकी प्रसन्नताके लिये उनके नाम-मन्त्रका यथाविधि जप करे तथा स्थिरचित्त होकर देवाधिदेव गजानन गणेशजीका ध्यान करे। तदनन्तर एक मुहूर्तके पश्चात् गणपति गणेशजीका षोडश उपचारों और अनेक

१९० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- प्रकारके नैवेद्योंसे भी पूजन करे ॥ २६-२७ ॥ [नैवेद्यके रूपमें] पूड़ी, मोदक, पुआ, लड्डू, बड़ा, खीर, विविध प्रकारके अन्नोंसे बने हुए अनेक प्रकारके लेह्य और चोष्य व्यंजनोंसे भोग लगाये ॥ २८ ॥ [तत्पश्चात्] अनेक प्रकारके फलों, ताम्बूल, पूगीफल (सुपारी), दक्षिणा, इक्कीस दूर्वाओं, दीपकों और पुष्पोंसे उनका अर्चन करे ॥ २९ ॥ चन्द्रमाके उदय होनेके समय पहले मन्त्रपूर्वक चतुर्थी तिथिको अर्घ्य दे, फिर गजानन गणेशजीको तत्पश्चात् चन्द्रमाके लिये अर्घ्य प्रदान करे ॥ ३० ॥ तत्पश्चात् [किये गये] पूजनको गणेशजीको निवेदितकर उन्हें प्रणाम और क्षमायाचना करके भक्तिपूर्वक इक्कीस ब्राह्मणोंको यथाशक्ति भोजन कराये। आर्थिक रूपसे अशक्त होनेकी स्थितिमें दस या बारह ब्राह्मणोंको भोजन कराये और उन्हें दक्षिणाएँ देकर भली-भाँति सन्तुष्ट करे। तदनन्तर सम्यक् रूपसे गणेशजीकी कथाका श्रवणकर स्वयं मौन होकर भोजन करे ॥ ३१-३२ ॥ तत्पश्चात् शेष रात्रिको गायन-वादन एवं जयघोष कर [जागरण करते हुए] व्यतीत करे। हे राजन् ! इस प्रकार प्रयत्नपूर्वक एक वर्षतक यह व्रत करनेपर [तुम्हारे पुत्रके] सम्पूर्ण पापोंका क्षय हो जानेसे उसे उत्तम पुत्रकी प्राप्ति होगी। इस व्रतके करनेवाले मनुष्यकी अन्य भी जो-जो कामनाएँ होंगी, वे पूर्ण होंगी। इसके करनेसे सम्पूर्ण संकटोंका नाश होता है और शत्रुओंकी सेनासे कोई भय नहीं रहता ॥ ३३-३४ १/२ ॥ शमीवृक्षके मूल भागमें बैठकर उपवास करते हुए चन्द्रमाके उदय होनेतक गणेशजीके मन्त्रका जप करते हुए इस व्रतको भलीभाँति करे। इस व्रतको करनेसे अन्धा, गूँगा, मूर्ख, लँगड़ा भी अपने अभीष्टको प्राप्त कर लेता है। इस व्रतको करनेवाला स्त्री, पुत्र, धन और राज्यको प्राप्त कर लेता है, इसमें सन्देह नहीं है। व्रतीको श्रावण आदि पृथक्-पृथक् मासोंमें घृत, लड्डू आदि पृथक्-पृथक् भोज्य पदार्थोंका भोजन करना चाहिये। वर्षपर्यन्त ऐसा करनेवालेको अत्यन्त उत्तम सिद्धिकी प्राप्ति होती है ॥ ३५-३७ १/२ ॥ [व्रतीको व्रतके दिन] श्रावणमासमें सात लड्डू, भाद्रपदमासमें दहीका भोजन करना चाहिये। आश्विनमासमें उपवास और कार्तिकमासमें दुग्धपान करना चाहिये। मार्गशीर्षमासमें उसे निराहार रहना चाहिये और पौषमासमें गोमूत्रका पान करना चाहिये। माघमासमें उसे तिलोंका भक्षण करना चाहिये तथा फाल्गुनमासमें शर्करायुक्त घृत खाना चाहिये। चैत्रमासमें उसे पंचगव्यका पान करना चाहिये और वैशाखमासमें शतपत्रिकाका भोजन करना चाहिये। ज्येष्ठमासमें उसे घृतका भोजन तथा आषाढ़मासमें मधुका भक्षण करना चाहिये ॥ ३८-४० १/२ ॥ कृतवीर्यके पिता बोले- हे ब्रह्मन्! अंगारक चतुर्थीका विशेष विधान क्यों कहा गया है? आपके प्रति आदरका भाव रखनेवाले मुझ विनम्र शरणागतसे यह सब कृपापूर्वक कहिये। गजानन गणेशजीकी मंगलमयी कथाको सुनते हुए मुझे तृप्ति नहीं हो रही है ॥ ४१-४२ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'संकटचतुर्थीव्रतकथन' नामक उनसठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५९ ॥ साठवाँ अध्याय भूमिपुत्र मंगलकी उत्पत्तिकी कथा, उसकी उग्र तपस्यासे गणेशजीका प्रसन्न होकर वर देना, अंगारकचतुर्थीव्रतकी महिमा ब्रह्माजी बोले- हे राजन् ! मैं अंगारक चतुर्थीकी महिमाको संक्षेपमें कहता हूँ, तुम इसे सावधान होकर श्रवण करो ॥ १ ॥ हे राजन्! अवन्तीनगरमें भारद्वाज नामके एक महान् मुनि थे। वे वेद-वेदांगके विद्वान्, अत्यन्त बुद्धिमान्, सर्वशास्त्रविशारद, अग्निहोत्रपरायण और नित्य शिष्योंके अध्यापनमें तत्पर रहनेवाले थे ॥ २ १/२ ॥ एक समय वे मुनि नदीके किनारे बैठकर अनुष्ठानमें रत थे, तभी उन्होंने एक सुन्दर अप्सराको देखा। उसे देखकर उन्होंने उसके साथ रमण करनेका मन बनाया ॥ ३-४ ॥

उ०ख०-अ०६० ] भूमिपुत्र मंगलकी उत्पत्तिकी कथा १९१

उ०ख०-अ०६० ] * भूमिपुत्र मंगलकी उत्पत्तिकी कथा * १९१ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ] अकस्मात् उस कामिनीको देखकर मुनि कामासक्त हो गये। कामदेवके बाणोंसे अभिभूत होकर वे भूतलपर गिर पड़े। उनका शरीर अत्यन्त विह्वल हो गया, जिसके कारण उनका तेज स्खलित हो गया। उनका वह तेज एक बिलके मार्गसे पृथ्वीमें प्रविष्ट हो गया ॥ ५-६ ॥ तदनन्तर उससे एक कुमारका जन्म हुआ, जिसकी कान्ति जपाकुसुमके समान [अरुणवर्णकी] थी। पृथ्वीने स्नेहवश उसका आदरपूर्वक पालन किया ॥ ७ ॥ ऐसा करते हुए पृथ्वीने अपने जन्म, माता-पिता और कुलको धन्य माना। तदनन्तर वह (बालक) जब सात वर्षका हो गया, तब उसने अपनी मातासे पूछा कि मनुष्यदेहधारी होनेपर भी मेरे शरीरका वर्ण रक्तिम क्यों है? हे माता! सम्प्रति यह बतलाओ कि मेरे पिता कौन हैं ? ॥ ८-९ ॥ पृथ्वी बोली- हे पुत्र! भरद्वाजमुनिका शुभ तेज स्खलित होकर मुझमें प्रविष्ट हो गया, उसीसे तुम्हारा जन्म हुआ और मैंने तुम्हारा पालन-पोषणकर तुम्हें बड़ा किया ॥ १० ॥ वह (बालक) बोला- हे माता! तब तुम मुझे तपस्याके निधिरूप उन मुनिका दर्शन कराओ ॥ १०१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले- तब वे पृथ्वीदेवी उसे लेकर भारद्वाजमुनिके पास गयीं ॥ ११ ॥ उन्हें प्रणामकर कहा कि [हे मुनिवर !] यह पुत्र आपके तेजसे उत्पन्न है। इसे मैंने पाल-पोसकर बड़ा कर दिया है। हे मुने! अब यह आपके समक्ष है, इसे स्वीकार करें। भारद्वाजमुनि उस पुत्रको प्राप्तकर अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्होंने उसका आलिंगन किया। तदनन्तर उनकी आज्ञा लेकर पृथ्वी देवी भी अपने सुन्दर धामको चली गयीं ॥ १२-१३ ॥ मुनिने प्रसन्नतापूर्वक उस बालकका सिर सूँघा, उसे गोदमें बैठाया और शुभ मुहूर्त एवं शुभ लग्नमें उसका उपनयन-संस्कार किया। उन्होंने उसे वेद, शास्त्र और मंगलमय गणेशमन्त्रका उपदेश देकर कहा- [हे पुत्र !] तुम चिरकालतक गणेशजीकी प्रसन्नताके लिये अनुष्ठान करो, वे सन्तुष्ट होकर तुम्हारी सभी मनोकामनाओंको

[दायाँ स्तम्भ] प्रदान करेंगे ॥ १४-१५१/२ ॥ तदनन्तर वह मुनिकुमार नर्मदा नदीके किनारे पद्मासन लगाकर बैठ गया। वह शीघ्र ही अपनी इन्द्रियोंपर नियन्त्रणकर भगवान् गणेशका अन्तःकरणमें ध्यान करते हुए उनके श्रेष्ठ मन्त्रका जप करने लगा। उस समय वह मात्र वायुका ही भक्षण कर रहा था, अतः अत्यन्त कृश हो गया था ॥ १६-१७ ॥ इस प्रकार उसने सहस्र वर्षोंतक अत्यन्त कठोर तप किया, तब माघमासके कृष्णपक्षकी चतुर्थी तिथिको जब स्वच्छ चन्द्रमाका उदय हुआ तो उस समय गणेशजीने उसे अपने दसभुजाओंवाले स्वरूपका दर्शन कराया। उन्होंने दिव्य वस्त्र धारण कर रखे थे, उनके मस्तकपर चन्द्रमा शोभायमान था, उनके हाथ अनेक प्रकारके आयुधोंसे सुशोभित हो रहे थे। उनकी सूँड सुन्दर थी तथा [मुखमें] एक दाँत शोभायमान हो रहा था। शूर्पसदृश उनके [बड़े-बड़े] कान कुण्डलोंसे युक्त थे। उनका श्रीविग्रह करोड़ों सूर्योंकी आभावाला और अनेक प्रकारके अलंकारोंसे अलंकृत था ॥ १८-२० ॥ अपने इष्टदेव भगवान् गणेशके सुन्दर स्वरूपको सामने विद्यमान देखकर वह बालक उठकर उनके चरणोंमें गिर पड़ा और उन जगदीश्वरकी स्तुति करने लगा ॥ २१ ॥ भौम (भूमिपुत्र) बोला- आप विघ्ननाशकको नमस्कार है, आप विघ्नकर्ताको नमस्कार है, देवताओं एवं असुरोंके स्वामी, सम्पूर्ण शक्तियोंका उपबृंहण करनेवाले, निरामय, नित्य, निर्गुण, गुणोंका उच्छेद करनेवाले, ब्रह्मज्ञानियोंमें श्रेष्ठ [इस जगत्की रचना] पालन और संहार करनेवालेको नमस्कार है ॥ २२-२३ ॥ हे जगत्के आधार! आपको नमस्कार है, हे त्रैलोक्यके पालक! आपको नमस्कार है। ब्रह्माके आदि कर्तारूप, ब्रह्मज्ञानी, ब्रह्मरूप, ब्रह्मरूप, लक्ष्यालक्ष्य- स्वरूप, दुर्लक्षणोंके नाशकके लिये नमस्कार है। परमेश्वर श्रीगणेशजीको बारम्बार नमस्कार है ॥ २४-२५ ॥ इस प्रकारकी स्तुतिसे प्रसन्न हुए परमात्मा गजानन गणेशजीने बालकको हर्षित करते हुए मधुर वाणीसे कहा- ॥ २६ ॥