भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 169, कुल 656 में से

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पृष्ठ 169

उ०ख०-अ०४९ ] * श्रीगणेशजीकी पार्थिव-पूजाकी विधि * १६७ आत्मावाले तथा नित्यतृप्त आपके तृप्त हो जानेपर जगत् अथवा पाँच पत्तियोंसे युक्त इक्कीस दूर्वांकुर मेरे द्वारा तृप्त हो जाता है। उत्तरापोशनके लिये मैं आपको प्रदान किये गये। [इन्हें आप स्वीकार करें]॥ ६३१/२॥ सुगन्धित जल प्रदान करता हूँ, पुनः मुख और हाथकी प्रदक्षिणा—हे देव! गणपतिदेवकी इक्कीस प्रदक्षिणा विशुद्धिके लिये आपको जल देता हूँ॥ ५३–५४१/२॥ करनी चाहिये—इस विधिवाक्यके अनुसार [मैंने इक्कीसकी फल—हे देवेश! मीठे अनार, नींबू, जामुन, आम, संख्यामें आपकी प्रदक्षिणा की है।] हे देवेश! [प्रदक्षिणा कटहल, अंगूर, केला आदि पके फल, बेर, खजूर, करते हुए] प्रत्येक पदपर मेरे पाप नष्ट हों॥ ६४१/२॥ नारियल, नारंगी, अंजीर, जम्बीर नींबू, पकी ककड़ी आरती—हे परमेश्वर! ताँबे, चाँदी, काँसे अथवा आदि इन फलोंको आप ग्रहण करें॥ ५५–५६१/२॥ स्वर्णनिर्मित पात्रमें बनाये गये आँखोंको तृप्त करनेवाली मुख-हाथ-प्रक्षालन—[हे देव!] मुख-हाथकी पाँच वर्तिकाओंसे समन्वित दीपकोंकी इन पाँच आरतियोंको विशेष शुद्धिके लिये मैं पुनः आपको जल प्रदान ग्रहण करें॥ ६५-६६॥ करता हूँ॥ ५७॥ दीपदान—[हे प्रभो!] अन्धकारका निवारण करोद्वर्तन—[हे प्रभो!] अनेक प्रकारके सुगन्धित करनेवाले तथा कर्पूरके द्वारा परिकल्पित इस सुन्दर द्रव्योंसे निर्मित, पवित्र गन्धवाले अबीर नामक उत्तम शुभ दीपकको आप ग्रहण करें। जैसे इसमें भस्म नहीं चूर्ण तथा सुन्दर चन्दनको हाथोंमें उबटन (लेपन)-हेतु दिखायी देता अर्थात् पूर्णरूपसे दग्ध हो जाता है, वैसे ग्रहण करें॥ ५८१/२॥ ही आप मेरे पापोंका [समग्र रूपसे] नाश करें॥ ६७॥ सीमन्तभूषण (सिन्दूर)—शालूर [नामक सुगन्धित पुष्पांजलि—[भाँति-भाँतिके उत्तम] पुष्प तथा द्रव्य]-से उद्भूत एवं बाँसके सार भागसे उत्पन्न पल्लव, जिन्हें मैंने वैदिक मन्त्रों एवं सूक्तोंसे अभिमन्त्रित तथा लाक्षा (महावर)-से रंजित सीमन्त (माँग)-के किया है, उन्हें पुष्पांजलिके रूपमें आप ग्रहण लिये आभूषणरूप यह चूर्ण (सिन्दूर) आपके लिये कीजिये॥ ६८॥ प्रस्तुत है॥ ५९१/२॥ स्तुतिपाठ—तदनन्तर मनको स्थिरकर बैठ करके ताम्बूल—[हे देव!] कर्पूर और सुपारीके चूर्णसे अनेक प्रकारके स्तोत्रों, सूक्तों और सहस्रनामस्तोत्रसे उन युक्त, खानेयोग्य खैरेसे संयुक्त और इलायची-लौंग- [गणेशजी]-का स्तवन करे॥ ६९॥ मिश्रित तथा केसरयुक्त ताम्बूल [आपको समर्पित है, इसे हे दीनानाथ! हे दयानिधान! हे देवगणोंद्वारा सम्यक् कृपापूर्वक ग्रहण करें]॥ ६०१/२॥ रूपसे सेवित! हे द्विज* (द्विजन्मा)! हे ब्रह्मा, ईशान, दक्षिणा—हे देव! पूजनमें कुछ न्यून या अतिरिक्त महेन्द्र, शेष, गिरिराजनन्दिनी, गन्धर्वों और सिद्धोंद्वारा स्तुत! हो जानेपर भी सम्पूर्ण फलकी प्राप्तिके लिये मैं आपके हे सम्पूर्ण अरिष्टोंका निवारण करनेमें अद्वितीय रूपसे सम्मुख स्वर्णदक्षिणा रखता हूँ॥ ६११/२॥ निपुण! हे त्रिलोकीनाथ! हे प्रभो! मेरे अपराधोंको क्षमा माला—हे परमेश्वर! श्वेत, पीत और रक्त- करके मेरी भक्तिको पूर्ण रूपसे सफल कीजिये॥ ७०॥ वर्णके कमलों तथा शुभ पुष्पोंसे गूँथी गयी सुन्दर हे देवि! इस प्रकार गणेशजीकी मूर्तिका सम्यक् मालाको ग्रहण करें॥ ६२१/२॥ रूपसे अर्चन करके दण्डवत् प्रणाम करे, तदनन्तर उनके दूर्वा—[हे प्रभो!] हरित या श्वेत वर्णवाले, तीन सर्वसिद्धिप्रदायक मन्त्रका जप करे॥ ७१॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'गणेशपार्थिवपूजानिरूपण' नामक उनचासवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ४९॥

  • गणेशजीका एक बार प्रादुर्भाव पार्वतीजीके मैलसे हुआ था, पुनः शिवजीके त्रिशूलसे उनका शिरश्छेद हो जानेपर हाथीका सिर लगाकर उन्हें जीवित किया गया, अतः उन्हें द्विज (द्विजन्मा) कहा गया।