भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 147, कुल 656 में से

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पृष्ठ 147

उ०ख०-अ०४६ ] * श्रीगणेशसहस्रनामस्तोत्र * १४५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ] बीजाक्षर है, उसमें विद्यमान; ४५२. खनिर्मलः- आकाशकी भाँति सर्वगत होते हुए निर्लिप्त; ४५३. खल्वाटशृङ्गनिलयः-वृक्षविहीन पर्वतके शिखरपर निवास करनेवाले; ४५४. खट्वाङ्गी-खट्वांग नामसे प्रसिद्ध अस्त्र धारण करनेवाले; ४५५. खदुरासदः-आकाशकी भाँति पकड़में न आ सकनेवाले ॥ ८५ ॥ ४५६. गुणाढ्यः-अनन्त कल्याणमय गुणगणसे सम्पन्न; ४५७. गहनः-जहाँ जाना या पहुँचना सम्भव न हो सके, वे; ४५८. गस्थः-अपने बीजस्वरूप गकारमें स्थित; ४५९. गद्यपद्यसुधार्णवः-गद्य-पद्यरूप काव्यरसामृतके सागर; ४६०. गद्यगानप्रियः-गद्य- सामगानके प्रेमी; ४६१. गर्जः-मेघगर्जनस्वरूप; ४६२. गीतगीर्वाणपूर्वजः-नादसे गीत आदि शब्द प्रकट हुए हैं और नादके अर्थसे देवता आदि; अतः नाद और नादार्थस्वरूप होनेके कारण गीत और देवताओंके पूर्वज ॥ ८६ ॥ ४६३. गुह्याचाररतः-हृदयगुहामें प्रविष्ट जीवात्मा और परमात्माके चिन्तनमें लगे हुए अन्तर्मुख साधकपर संतुष्ट रहनेवाले; ४६४. गुह्यः-एकान्तमें जाननेयोग्य; अथवा गुह-कार्तिकेयके हितकारी; ४६५. गुह्यागम- निरूपितः-गुह्य अर्थात् एकान्तवेद्य होनेके कारण 'गुह्यागमनिरूपित' के नामसे प्रसिद्ध; ४६६. गुहाशयः- हृदयगुहामें शयन करनेवाले अन्तर्यामी पुरुष; ४६७. गुहाब्धिस्थः-अव्याकृत आकाश गूढ़ और अगाध होनेके कारण गुहाब्धिके तुल्य है, उसमें विराजमान; ४६८. गुरुगम्यः-गुरुके बताये हुए योग या उपायसे प्राप्तव्य; ४६९. गुरोर्गुरुः-ब्रह्मा आदिको भी वेदका ज्ञान देनेवाले होनेके कारण गुरुके भी गुरु ॥ ८७ ॥ ४७०. घण्टाघर्घरिकामाली-घण्टाकी तरह मनोहर शब्द करनेवाली किंकिणीको 'घर्घरिका' कहते हैं। बालोचित क्रीड़ाके समय उसकी माला धारण करनेवाले; ४७१. घटकुम्भः-उलटे रखे हुए दो घड़ोंके समान दो कुम्भस्थलवाले; ४७२. घटोदरः-घटके समान विशाल उदरवाले; ४७३. चण्डः-प्रचण्ड पराक्रमी; ४७४. चण्डेश्वरसुहृत्-शिव-पार्षद चण्डेश्वरके सखा; ४७५.

[दायाँ स्तम्भ] चण्डीशः-चण्डीनाथ शिव; ४७६. चण्डविक्रमः- अत्यन्त क्रोधशील दुष्टोंपर आक्रमण करके उन्हें वशमें करनेवाले ॥ ८८ ॥ ४७७. चराचरपतिः-स्थावर-जंगम जगत्के स्वामी; ४७८. चिन्तामणिचर्वणलालसः-अपनी अतिशय उदारताके कारण चिन्तामणि, कामधेनु और कल्पवृक्षके गर्वको चूर्ण करनेकी लालसावाले; ४७९. छन्दः-गायत्री आदि छन्दःस्वरूप; ४८०. छन्दोवपुः- छन्दोमय शरीरवाले; ४८१. छन्दोदुर्लक्ष्यः-वेदसे भी कठिनतापूर्वक लक्षित होनेवाले; ४८२. छन्दविग्रहः- अपनी इच्छाके अनुसार या भक्तोंकी भावनाके अनुकूल अवतार-शरीर धारण करनेवाले ॥ ८९ ॥ ४८३. जगद्योनिः-जगत्के कारण; ४८४. जगत्साक्षी-जगत्के साक्षी या द्रष्टा; ४८५. जगदीशः- जगत्के स्वामी या रक्षक; ४८६. जगन्मयः-जगत्स्वरूप या जगत्के अधिष्ठान; ४८७. जपः-जपकर्मरूप; ४८८. जपपरः-जपकर्ता; ४८९. जप्यः-जपनीय मन्त्ररूप; ४९०. जिह्वासिंहासनप्रभुः-जिनके नाम-कीर्तनके समय जो भक्तके जिह्वारूपी सिंहासनपर विराजमान रहते हैं, वे ॥ ९० ॥ ४९१. झलज्झलोल्लसद्दानझङ्कारिभ्रमराकुलः- कानोंके हिलानेसे उड़-उड़कर मदजलके आस-पास झंकार-रव करनेवाले भ्रमरोंसे व्याप्त; ४९२. टंकारस्फारसंरावः-काँसेकी घण्टी या थालीके बजनेसे होनेवाले रण-रणनात्मक रवके समान जिनके आभूषणकी झनकार होती है, वे; ४९३. टंकारिमणिनूपुरः-बजते हुए रत्नमय पादकटककी ध्वनि फैलानेवाले ॥ ९१ ॥ ४९४. ठद्वयीपल्लवान्तःस्थसर्वमन्त्रैकसिद्धिदः- सम्पूर्ण स्वाहान्त मन्त्रोंके एकमात्र सिद्धिदाता; ४९५. डिण्डिमुण्डः-उलटकर रखे हुए नगाड़ेके समान कुम्भ- स्थलवाले; ४९६. डाकिनीशः-योगिनियोंके ईश्वर; ४९७. डामरः-डामर नामक तन्त्रस्वरूप; ४९८. डिण्डिम- प्रियः-डिण्डिम-घोष या दुन्दुभिकी ध्वनिसे प्रसन्न होनेवाले ॥ ९२ ॥ ४९९. ढक्कानिनादमुदितः-पटहध्वनिसे प्रसन्न;