श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 146, कुल 656 में से
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१४४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 उदारत्रिदशाग्रणीः—उदार देवताओंमें श्रेष्ठ; ४०६. ऊर्जस्वान्—तेजस्वी; ४०७. ऊष्मलमदः—गण्डस्थलसे गर्म-गर्म मदजल बहानेवाले; ४०८. ऊहापोहदुरासदः—ऊह (वितर्क) और अपोह (उसके बाध)-से दुष्प्राप्य ॥ ७६ ॥ ओजस्वान्—शौर्य और उत्कर्षके कारणभूत तेजसे सम्पन्न; ४२९. ओषधीपतिः—ओषधियोंके स्वामी चन्द्रमारूप; ४३०. औदार्यनिधिः—उदारताके सिन्धु; ४३१. औद्धत्यधुर्यः—अपने भक्तोंपर कृपा करनेके लिये उनके सामने अपना उत्कर्ष प्रकट करनेमें श्रेष्ठ; ४३२. औन्नत्यनिस्वनः—सबकी अपेक्षा उच्चस्वरसे गर्जना करनेवाले ॥ ८१ ॥ ४०९. ऋग्यजुस्सामसम्भूतिः—अपने निःश्वाससे ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा सामवेदको प्रकट करनेवाले; ४१०. ऋद्धिसिद्धिप्रवर्तकः—राज्य-सम्पत्ति तथा अणिमा आदि सम्पत्तियोंको देनेवाले; ४११. ऋजुचित्तैकसुलभः—एकमात्र सरलचित्त—निर्मल मनसे ही सुलभ होनेवाले; ४१२. ऋणत्रयविमोचकः—देव-ऋण, ऋषि-ऋण और पितृ-ऋण—इन तीनोंसे छुटकारा दिलानेवाले ॥ ७७ ॥ ४३३. सुरनागानामङ्कुशः—देवलोक, मर्त्यलोक और पाताललोक—तीनोंको अपने नियन्त्रणमें रखनेवाले; ४३४. सुरविद्विषामङ्कुशः—देवताओं और विद्वानोंके द्वेषियोंको दण्डित करनेवाले; ४३५. समस्तविसर्गान्तपदेषु परिकीर्तितः अः—'अ' से लेकर 'क्ष' पर्यन्त जो ५१ अक्षर हैं, उनके अन्तमें विसर्ग लगानेपर जिसका उच्चारण होता है, वह 'अः' गणेशजीका एक नाम है ॥ ८२ ॥ ४१३. स्वभक्तानां लुप्तविघ्नः—अपने भक्तजनोंका विघ्न नष्ट करनेवाले; ४१४. सुरद्विषां लुप्तशक्तिः—देवद्रोही दैत्योंकी शक्ति नष्ट करनेवाले; ४१५. विमुखार्चानां लुप्तश्रीः—अपनी पूजासे विमुख या विरुद्ध रहनेवालोंकी धन-सम्पत्तिका नाश करनेवाले; ४१६. लूतास्फोटनाशनः—मकड़ी और फोड़े-फुंसी आदि रोगोंका नाश करनेवाले ॥ ७८ ॥ ४३६. कमण्डलुधरः—कमण्डलु धारण करनेवाले; अथवा सूँड़से अमृतकलश धारण करनेवाले; ४३७. कल्पः—प्रलयकालस्वरूप; अथवा निर्माणमें समर्थ; ४३८. कपर्दी—कौड़ी अथवा जटाजूट धारण करनेवाले; ४३९. कलभाननः—नाद, कान्ति और प्राणशक्तिसे सम्पन्न; ४४०. कर्मसाक्षी—अदृष्ट कर्मोंके भी साक्षी; ४४१. कर्मकर्ता—कर्मठ पुरुषोंके अन्तःप्रेरक होनेके कारण स्वयं ही कर्म करनेवाले; ४४२. कर्माकर्मफलप्रदः—स्वर्ग और मोक्षरूप फल देनेवाले ॥ ८३ ॥ ४१७. एकारपीठमध्यस्थः—त्रिकोणचक्रके मध्य-भागमें विराजमान; ४१८. एकपादकृतासनः—काशीमें एक पैरसे खड़े रहनेवाले; ४१९. एजिताखिलदैत्यश्रीः—समस्त असुरोंकी राज्य-लक्ष्मीको कम्पित कर देनेवाले; ४२०. एधिताखिलसंश्रयः—अपनी शरण लेनेवाले भक्तोंकी श्रीवृद्धि करनेवाले ॥ ७९ ॥ ४४३. कदम्बगोलकाकारः—समस्त नाड़ियोंका जो उद्गम-स्थान है, वहाँ कदम्ब-पुष्पके समान गोल आकारका कोई देवता है, जो गणेशजीसे अभिन्न है; ४४४. कूष्माण्डगणनायकः—दुष्ट ग्रहोंके नायक अर्थात् उन्हें नियन्त्रणमें रखनेवाले; ४४५. कारुण्यदेहः—करुणामूर्ति; ४४६. कपिलः-कपिलमुनिस्वरूप; ४४७. कथकः—सम्प्रदायप्रवर्तक; ४४८. कटिसूत्रभृत्—कांची धारण करनेवाले ॥ ८४ ॥ ४२१. ऐश्वर्यनिधिः—ऐश्वर्यके आधार अथवा भक्तोंके यहाँ ऐश्वर्य स्थापित करनेवाले; ४२२. ऐश्वर्यम्—ईश्वरकोटिके पुरुषोंमें ऐश्वर्यरूपा अणिमा आदि विभूतिरूप; ४२३. ऐहिकामुष्मिकप्रदः—लौकिक और पारलौकिक सुख देनेवाले; ४२४. ऐरम्मदसमोन्मेषः—जिनकी दृष्टिका उन्मेष (खोलना) विद्युत्के समान प्रकाशमान है, वे; ४२५. ऐरावतनिभाननः—ऐरावत हाथीके समान मुखवाले ॥ ८० ॥ ४४९. खर्वः—वामनरूप; ४५०. खड्गप्रियः—खड्ग (तलवार या गैंडा) जिन्हें प्रिय है; ४५१. खड्गखान्तान्तस्थः—खड्ग-शब्दगत खकारसे परे जो डकार है, उससे परे जो गकार है, वह गणेशजीका ४२६. ओंकारवाच्यः—ओंकार अर्थात् प्रणवके वाच्यार्थरूप; ४२७. ओंकारः—ओंकार-नामवाले; ४२८.