श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ
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उ०ख०-अ०४६ ] * श्रीगणेशसहस्रनामस्तोत्र * १४३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 रहित; ३६३. अजय्यः—जिनहें जीता न जा सके, ऐसे; | ३८६. इन्दीवरदलश्यामः—नीलकमलके समान ३६४. अनाधारः—स्वयं सबके आधार होनेके कारण | श्याम; ३८७. इन्दुमण्डलनिर्मलः—चन्द्रमण्डलके समान अपने लिये आधारसे रहित; ३६५. अनामयः—रोगरहित; | गौर कान्तिवाले; ३८८. इध्मप्रियः—अग्निरूपसे काष्ठ ३६६. अमलः—मलिनतासे शून्य; ३६७. अमोघ- | या ईंधनके प्रेमी; ३८९. इडाभागः—ऋत्विक् और सिद्धिः—अमोघ (अव्यर्थ) सिद्धिवाले; ३६८. अद्वैतम्— | यजमान आदिके रूपमें यज्ञकर्ममें भाग लेनेवाले; ३९०. द्वैत-प्रपंचसे रहित; ३६९. अघोरः—शिवरूप; ३७०. | इराधामा—पृथ्वीमें अन्तर्यामीरूपसे अवस्थित; ३९१. अप्रमिताननः—असंख्य मुखवाले ॥ ६९ ॥ | इन्दिराप्रियः—लक्ष्मीद्वारा पूज्य; अथवा विष्णुरूपसे लक्ष्मीके ३७१. अनाकारः—निराकार परमात्मा; ३७२. | प्रियतम ॥ ७३ ॥ अब्धिभूम्यग्निबलघ्नः—जलधि या जलकी शक्ति क्लेदन, | ३९२. इक्ष्वाकुविघ्नविध्वंसी—राजा इक्ष्वाकुके भूमिकी शक्ति स्तम्भन तथा अग्निकी शक्ति दहनका | विघ्नका नाश करनेवाले; ३९३. इतिकर्तव्यतेप्सितः— जिनपर कोई प्रभाव नहीं पड़ता, वे भूमि, जल और | इतिकर्तव्यता (क्रतुकी अंगभूत सामग्री)—की अपेक्षा अग्निकी शक्तिको प्रतिहत कर देनेवाले; ३७३. | रखकर यजमानकी मनोवांछा पूर्ण करनेवाले; ३९४. अव्यक्तलक्षणः—बहिर्मुख मानवोंकी बुद्धिमें जिनके | ईशानमौलिः—नरेश, भूतेश और सुरेश आदि ईशानों स्वरूप-लक्षण तथा तटस्थ-लक्षणकी अभिव्यक्ति नहीं | (ईश्वरों)—के शिरोमणि; ३९५. ईशानः—ईशानोंको जीवन होती, वे; ३७४. आधारपीठः—पृथ्वीसे लेकर शिवपर्यन्त | देनेवाले; ३९६. ईशानसुतः—ईश्वरपुत्र; ३९७. ईतिहा— छत्तीस आधारभूत तत्त्वोंके भी आश्रय; ३७५. आधारः— | अतिवृष्टि, अनावृष्टि, मूषकजनित उपद्रव, शलभ, शुक अ—विष्णु तथा आ—ब्रह्माको भी धारण करनेवाले; | आदि पक्षी, स्वमण्डल तथा परमण्डल—इन सबसे प्राप्त ३७६. आधाराधेयवर्जितः—आधार-आधेय-भावसे | होनेवाले भयको 'ईति-भीति' कहते हैं; उस 'ईति- रहित, अद्वैतस्वरूप ॥ ७० ॥ | भीति' के नाशक ॥ ७४ ॥ ३७७. आखुकेतनः—मूषकचिह्नसे युक्त ध्वज- | ३९८. ईषणात्रयकल्पान्तः—लोकैषणा, पुत्रैषणा वाले; ३७८. आशापूरकः—सर्वव्यापी होनेसे दिशाओंके | और वित्तैषणा—इन त्रिविध एषणाओंके लिये प्रलयंकर; पूरक अथवा सबकी आशा पूर्ण करनेवाले; ३७९. | अथवा वैराग्यदायक; ३९९. ईहामात्रविवर्जितः—चेष्टा- आखुमहार्थः—मूषकरूपी महान् रथ (वाहन)-से युक्त; | मात्रसे शून्य; चित्स्वरूप; ४००. उपेन्द्रः—कश्यप और ३८०. इक्षुसागरमध्यस्थः—ईखके रसके सागरमें | अदितिके यहाँ अवतीर्ण महोत्कट विनायक; अथवा विराजमान; ३८१. इक्षुभक्षणलालसः—ईख खानेकी | वामनसे अभिन्न; ४०१. उडुभृन्मौलिः—नक्षत्र-पालक इच्छा रखनेवाले ॥ ७१ ॥ | चन्द्रमाको भालदेशमें धारण करनेवाले; ४०२. उण्डेरक- ३८२. इक्षुचापातिरेकश्रीः—इक्षुधन्वा (कामदेव)- | बलिप्रियः—गोल-गोल मिष्टान्नके उपहारको प्रिय से भी अधिक सौन्दर्य-श्रीसे सम्पन्न; ३८३. इक्षुचाप- | माननेवाले ॥ ७५ ॥ निषेवितः—इक्षुमय चापकी अधिष्ठात्री देवी अथवा | ४०३. उन्नताननः—उत्कृष्ट ब्रह्मा आदि देवोंको कामदेवसे सेवित; ३८४. इन्द्रगोपसमानश्रीः—इन्द्रगोप | प्राणवान् करनेवाले; ४०४. उत्तुङ्गः—वराहरूपधारी (बीरबहूटी नामक कीट)-के समान अरुण कान्तिवाले; | भगवान्की दाढ़से तुंगा—नामवाली एक नदी प्रकट हुई, ३८५. इन्द्रनीलसमद्युतिः*—इन्द्रनीलमणिके समान श्याम | जिससे वे भगवान् 'उत्तुंग' कहलाये। उनसे अभिन्न कान्तिवाले ॥ ७२ ॥ | होनेके कारण गणेशजीका भी नाम 'उत्तुंग' है; ४०५.
- कामनाभेदसे भिन्न रूप-रंगमें गणेशजीका ध्यान होता है। अथवा भिन्न-भिन्न युगोंमें अवतार लेकर वे अरुण एवं श्याम-कान्ति धारण करते हैं। (खद्योतभाष्य)