श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 144, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें१४२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ] अजयासे घिरे हुए; ३१७. विजयाविजयावहः—विजयाको विजय देनेवाले ॥ ६० ॥ ३१८. अर्जिताचितपादाब्जः—अपराजिताशक्तिसे पूजित चरणारविन्दवाले; ३१९. नित्यानित्यावतंसितः— नित्याशक्तिने जिनके चरणोंको नित्य अपना शिरोभूषण बना रखा है, वे; ३२०. विलासिनीकृतोल्लासः— विलासिनीकी सेवासे उल्लसित होनेवाले; ३२१. शौण्डी- सौन्दर्यमण्डितः—शौण्डी नामक शक्तिके सौन्दर्यसे मण्डित ॥ ६१ ॥ ३२२. अनन्तानन्तसुखदः—अनन्ता नामक शक्तिको अनन्त सुख देनेवाले; ३२३. सुमङ्गलसुमङ्गलः—जिस पीठपर मंगला नामक शक्ति विद्यमान है, उसका नाम 'सुमंगल' है। ऐसा सुमंगल-पीठ जिनके कारण परम मंगलमय होता है, वे गणेशजी 'सुमंगलके सुमंगल' हैं; ३२४. इच्छाशक्तिज्ञानशक्तिक्रियाशक्तिनिषेवितः— इच्छाशक्ति, ज्ञानशक्ति तथा क्रियाशक्तिसे सेवित ॥ ६२ ॥ ३२५. सुभागासंश्रितपदः—सुभागादेवीके द्वारा सेवित चरणकमलवाले; ३२६. ललिताललिताश्रयः—ललिता- देवीके मनोरम आश्रय; ३२७. कामिनीकामनः— कामिनी या कामकला नामक शक्तिकी कामना रखनेवाले; ३२८. काममालिनीकेलिलालितः—कामेशी अथवा काममालिनी नामक शक्तिकी क्रीडाओंद्वारा प्रसन्न किये गये ॥ ६३ ॥ ३२९. सरस्वत्याश्रयः—सरस्वती (वाग्देवता)- के आश्रय; ३३०. गौरीनन्दनः—पार्वतीदेवीको आनन्द प्रदान करनेवाले; ३३१. श्रीनिकेतनः—लक्ष्मी या शोभाके आगार; ३३२. गुरुगुप्तपदः—गणक्रीड आदि गुरुओंद्वारा गोपित पदवाले; ३३३. वाचासिद्धः—जिनकी भक्तिसे वाक्-सिद्धि प्राप्त होती है, वे; ३३४. वागीश्वरीपतिः— वागीश्वरी अर्थात् नकुली नामक शक्तिके प्रियतम ॥ ६४ ॥ ३३५. नलिनीकामुकः—नलिनी अर्थात् सुरापगा नामक शक्तिके प्राणवल्लभ; ३३६. वामारामः—वामा नामक शक्ति जिनकी रामा अर्थात् प्रिया हैं, वे; ३३७. ज्येष्ठामनोरमः—ज्येष्ठा नामक शक्ति जिनकी मनोरमा हैं, वे; ३३८. रौद्रीमुद्रितपादाब्जः—रौद्री नामक शक्ति
[दायाँ स्तम्भ] जिनके चरणारविन्दोंको अपनी अंजलिमें बाँधे रखती हैं, वे; ३३९. हुम्बीजः—‘वक्रतुण्डाय हुम्’—इस षडक्षर मन्त्रका अन्तिम वर्ण जो ‘हुम्’ है, वही समस्त पुरुषार्थोंका बीज (कारण) है; अतएव भगवान् गणपति ‘हुं बीज’ नामसे प्रसिद्ध हैं; ३४०. तुङ्गशक्तिकः— उच्चशक्तिसे सम्पन्न; अथवा वक्रतुण्ड-मन्त्रमें जो ‘हुम्’ बीज है, यही उक्त गणेश-मन्त्रकी शक्ति है। इसलिये वे उक्त नामसे प्रसिद्ध हैं ॥ ६५ ॥ ३४१. विश्वादिजननत्राणः—विश्वके आदिभूत हिरण्यगर्भके जन्म और पालन जिनसे होते हैं, वे; ३४२. स्वाहाशक्तिः—‘स्वाहा’ जिनकी शक्ति है, वे; ३४३. सकीलकः—कीलकयुक्त; ३४४. अमृताब्धि- कृतावासः—सुधासिन्धुमें निवास करनेवाले; ३४५. मदघूर्णितलोचनः—सुधापानके मदसे अथवा गण्डस्थलसे झरते हुए मदसे घूमते हुए नेत्रवाले ॥ ६६ ॥ ३४६. उच्छिष्टगणः—उत्कृष्ट और शिष्ट गणोंके स्वामी; ३४७. उच्छिष्टगणेशः—(उच्छिष्टे नामरूपं च) इत्यादि अथर्ववेदीय मन्त्रोंके समूहसे प्रतिपाद्य ईश्वर; अथवा सतत मोदक-भक्षणके कारण उक्त नामसे प्रसिद्ध श्रीगणेश; ३४८. गणनायकः—जिनके गणोंकी गणना भक्तोंद्वारा होती रहती है, वे; ३४९. सार्वकालिक- संसिद्धिः—जिनकी सिद्धियाँ सब समय बनी रहती हैं, वे; ३५०. नित्यशैवः—सदा शिवका चिन्तन करनेवाले; ३५१. दिगम्बरः—दिशाओंको ही वस्त्र बनानेवाले ॥ ६७ ॥ ३५२. अनपायः—अविनाशी; ३५३. अनन्त- दृष्टिः—असीम ज्ञानशक्तिसे सम्पन्न; ३५४. अप्रमेयः— वाणी, मन एवं ज्ञानेन्द्रियोंसे अगम्य होनेके कारण प्रमाणातीत; ३५५. अजरामरः—जरा और मृत्युसे रहित; ३५६. अनाविलः—कालुष्यरहित; ३५७. अप्रतिरथः— प्रतिद्वन्द्वीसे शून्य; ३५८. अच्युतः—मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले; अथवा श्रीकृष्णसे अभिन्न; ३५९. अमृतम्— अमृत या मोक्षस्वरूप; ३६०. अक्षरम्—व्यापक अथवा अक्षय ॥ ६८ ॥ ३६१. अप्रतर्क्यः—जिसका वेदोंके द्वारा अनुमोदन न हो, ऐसे तर्कसे अगम्य; ३६२. अक्षयः—क्षय-
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