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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 132, कुल 656 में से

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पृष्ठ 132

१३० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-


[बायाँ स्तम्भ]

मैं नहीं जानता कि कौन कहाँ है। मेरे भी अस्त्र उसके अस्त्रोंसे [टकराकर] सहस्रों खण्ड हो गये हैं॥८॥ ब्रह्माजी कहते हैं- [हे व्यासजी!] मुनिश्रेष्ठ नारदजीने शिवजीके वचन सुनकर तीनों लोकोंके ईश्वर शिवके पराभवको परम आश्चर्यका विषय मानते हुए उनसे कहा- ॥९॥ नारदजी बोले- हे प्रभो! आप सब कुछ जाननेवाले, सम्पूर्ण विद्याओंके स्वामी, सबके स्वामी, सब कुछ करनेवाले, सबके रक्षक, सबका संहार करनेवाले, सबका नियमन करनेवाले, कर्तुमकर्तुमन्यथाकर्तुं समर्थ, अणिमादि सिद्धियोंसे युक्त तथा षड् ऐश्वर्यों*के साथ विलास करनेवाले हैं। हे देव! आप समस्त वक्ताओंमें श्रेष्ठ हैं; मैं गायनमें आसक्त होकर त्रिलोकीमें निरन्तर भ्रमण करनेवाला मुनि आपके समक्ष क्या कह सकता हूँ? फिर भी आपके वचनोंका मान रखनेके लिये विचार करके कुछ कहता हूँ॥१०-१२१/२॥ ब्रह्माजी कहते हैं- [हे व्यासजी!] इस प्रकार कहकर और क्षणभर ध्यान करके मुनि [नारदजी]-ने शिवजीसे पुनः कहा- ॥ १३॥ नारदजी बोले- हे वह्निनेत्र (जिनके नेत्रमें अग्निका निवास है)! हे पिनाकधृक् (पिनाक नामक धनुष धारण करनेवाले)! आपने युद्धके लिये जब प्रस्थान करनेकी कामना की थी, उस समय आपने गणोंके अधिपति गणेशजीका अर्चन नहीं किया था, इसीलिये आप पराभवको प्राप्त हुए। इस समय पहले आप विघ्नोंका निवारण करनेवाले विघ्नेश्वरका अर्चन कीजिये, उन्हें आदरपूर्वक प्रसन्न करके, उनसे वर प्राप्तकर युद्धके लिये प्रस्थान कीजिये। आप उस दैत्यको पराजित करेंगे, इसमें कोई सन्देह नहीं है॥ १४-१५१/२॥ उस [दैत्य]-ने भी पूर्वकालमें महान् तपस्याके


[दायाँ स्तम्भ]

द्वारा उन देव [भगवान् गणेश]-की आराधना की थी। उस तपके फलस्वरूप उन अखिल विघ्नसमूहोंके हर्ता गणेशजीने उसे वर दिया था कि महेश्वरसे अतिरिक्त और किसीसे भी तुम्हारी मृत्यु नहीं होगी॥ १६-१७॥ इसलिये हे गिरिशायी शिव! आप उसके इच्छानुसार गमन करनेवाले त्रिपुर (स्वर्ण, रजत और लौहनिर्मित तीन विमानों)-को एक बाणसे विदीर्ण कर दीजिये- यही आपकी विजयका उपाय कहा गया है॥ १८॥ ब्रह्माजी बोले- गजमुख गणेशजीद्वारा कही गयी वाणीको स्मरणकर और मुनिश्रेष्ठ नारदजीद्वारा [कहे गये] उपायका श्रवणकर गिरिशायी भगवान् शंकर अत्यन्त हर्षित हुए और उन्होंने पुनः उनसे कहा- ॥ १९॥ शिवजी बोले- हे ब्रह्मन्! आपने सत्य कहा है। हे मुने! आपकी बातसे मुझे पूर्वकालमें [गणेशजीद्वारा] उपदिष्ट दो मन्त्रोंका स्मरण हो आया है। उनमेंसे एक षडक्षर और दूसरा एकाक्षर मन्त्र है। वे दोनों [मन्त्र] संकटका हरण करनेवाले हैं। युद्धमें विशेष रूपसे संलग्न चित्तवाला होनेके कारण न तो मैं उन दोनों मन्त्रोंका जप कर सका, न सम्यक् रूपसे स्मरण ही कर सका॥ २०-२१॥ सम्पूर्ण विघ्नोंका हरण करनेवाले, सबके कारणस्वरूप, सृजन-पालन और संहार करनेवाले गजानन भगवान् विनायकका मैंने स्मरण भी नहीं किया था॥ २२॥ [नारद] मुनि बोले- हे महादेव! उन महान् देव गजानन गणेशजीको आप प्रसन्न कीजिये॥ २२१/२॥ ब्रह्माजी कहते हैं- [हे व्यासजी!] तब नारदजीको विदाकर भगवान् शिव तपस्या करनेके लिये चले गये॥ २३॥ उन्होंने दण्डकारण्यदेशमें पद्मासनपर स्थित होकर बलपूर्वक इन्द्रियोंका नियमन करके [गणेशजीके] ध्यानमें


[पाद-टिप्पणी / Footnote]

* सर्वज्ञता तृप्तिरनादिबोधः स्वतन्त्रता नित्यमलुप्तशक्तिः। अनन्तशक्तिश्च महेश्वरस्य यन्मानसैश्वर्यमवैति वेदः॥ (शिवपुराण, विद्येश्वरसंहिता १८। १२) अर्थात् सर्वज्ञता, तृप्ति, अनादिबोध, स्वतन्त्रता, नित्य अलुप्त शक्ति आदिसे संयुक्त होना और अपने भीतर अनन्त शक्तियोंको धारण करना-महेश्वरके इन छः प्रकारके मानसिक ऐश्वर्योंको केवल वेद जानता है।