श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 126, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें१२४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 इकतालीसवाँ अध्याय श्रीगणेशजीका कलाधर विप्रके रूपमें त्रिपुरासुरके पास आना और उसे स्वर्ण, रजत एवं लौहसे निर्मित तीन पुर प्रदान करना
व्यासजी बोले—हे चतुर्मुख ब्रह्माजी ! [सृजन, पालन और संहार आदि] सम्पूर्ण कार्योंको सम्पन्न करनेवाले वरदायक भगवान् गणेशजीने क्या किया—यह मुझ जिज्ञासुको बतलाइये ॥ १ ॥ ब्रह्माजी बोले— [हे व्यासजी !] तदनन्तर गजानन गणेशजी ब्राह्मणका रूप धारणकर त्रिपुरासुरके पास गये। वहाँ उन ब्राह्मणश्रेष्ठने उसे महामूल्यवान् आसनपर विराजमान देखा ॥ २ ॥ उसने उठकर उन्हें नमस्कार करके अपने आसनपर बैठाया और सम्यक् रूपसे उनका पूजनकर पूछा कि 'हे द्विज ! आपका आगमन कहाँसे हुआ है ? ॥ ३ ॥ हे द्विज ! आपने किस विद्याका ज्ञान प्राप्त किया है ? आपका नाम क्या है ? आपके आनेका प्रयोजन क्या है ?—यह सब मुझ जिज्ञासुको बताइये, मैं शक्तिभर आपके कार्यको पूर्ण करूँगा' ॥ ४ ॥ द्विजरूपधारी गणेशजी बोले—हे दैत्य [राज] ! हम सर्वज्ञ और सब कुछ जाननेवाले हैं; परहितकी कामनासे इच्छानुसार लोकोंमें भ्रमण करते रहते हैं और जहाँ सायंकाल हो जाता है, वहीं रुक जाते हैं ॥ ५ ॥ मैं तीनों लोकोंमें 'कलाधर' नामसे प्रसिद्ध हूँ और आपके वैभवको देखनेकी इच्छासे आपके भवनमें आया हूँ। सम्प्रति आपकी सम्पूर्ण सम्पदाको देखकर हम तृप्त हो गये। इस प्रकारकी सम्पत्ति तो कैलास, वैकुण्ठ और ब्रह्मलोकमें भी नहीं है। इन्द्रलोकमें भी ऐसी सम्पत्ति नहीं है, जैसी आपके पास दिखायी देती है ॥ ६—७१/२ ॥ दैत्य (त्रिपुरासुर) बोला—हे द्विज ! आपका नाम ही कलाधर है या आप उसे जानते भी हैं ? ॥ ८ ॥ सम्पूर्ण लोकोंकी सम्पदाओंमें आप जो इस सम्पदाकी प्रशंसा कर रहे हैं तो यदि आप जानते हों तो मुझे उनमें जो सर्वश्रेष्ठ हो, उसे दिखायें ॥ ९ ॥ हे द्विज ! उसे देखकर मैं आपको आपका वांछित [अवश्य] प्रदान करूँगा, भले ही वह मेरा प्रिय प्राण ही क्यों न हो। हे मुने ! मुझे स्मरण नहीं है कि मैंने परिहासमें भी कभी असत्य बोला हो ॥ १० ॥ कलाधर बोले—हे देवशत्रु ! दूसरोंकी सम्पदाको देखकर तुम्हारा क्या प्रयोजन सिद्ध होगा ? तुम्हारी विनम्रतासे मैं प्रसन्न हूँ और अपनी कलासे तुम्हें एक बाणपर स्थित स्वर्ण, रजत और लौहनिर्मित तीन पुर प्रदान करता हूँ। हे दैत्य ! तुम दीर्घकालतक वहाँ रहकर सुखपूर्वक रमण करो ॥ ११-१२ ॥ ये तीनों पुर देवताओं, गन्धर्वों, मनुष्यों और सर्पोंद्वारा अभेद्य, मनोवांछित पदार्थोंको देनेवाले, इच्छानुसार गमन करनेवाले, इच्छित भोगोंको प्रदान करनेवाले और मंगलमय हैं ॥ १३ ॥ हे दैत्य ! कुछ काल बीत जानेपर जब भगवान् शिव एक ही बाणसे उनका भेदन कर देंगे, तभी उनका नाश होगा ॥ १४ ॥ ब्रह्माजी बोले—[हे व्यासजी !] ऐसा कहकर [उन द्विजरूपधारी गणेशजीने] धनुष लेकर और उसपर बाणका संयोजनकर तीन पुरोंका निर्माण किया, जो तीन लोकोंके सदृश थे। वे [तीनों.पुर] विशेष रूपसे चित्रित भवनों, मनोरम दीर्घिकाओं (जलाशयों) और उद्यानोंसे युक्त थे; वहाँ अनेक प्रकारके पक्षिसमूह कलरव करते थे। वे तीनों पुर सभी प्रकारके भोगोंको प्रदान करनेवाले और आकाशमार्गसे गमन करनेवाले थे ॥ १५-१६ ॥ [गणेशजीकी] मायासे मोहित वह दैत्य त्रिपुरासुर वहाँ (उन पुरोंके मध्यमें) स्थित होकर अत्यन्त हर्षित हुआ। उस दैत्यने मेघसदृश गर्जन किया, जिससे तीनों लोक काँपने लगे। त्रैलोक्यको क्षुभित करके उसने 'मुझसे श्रेष्ठ कोई नहीं है'—इस प्रकार गर्व और दर्पसे युक्त होकर उन ब्राह्मण-देवता (द्विजरूपधारी गणेशजी)— से इस प्रकार कहा— ॥ १७-१८ ॥ हे द्विजश्रेष्ठ ! आप दुर्लभ-से-दुर्लभ पदार्थ माँगिये, वह मैं आपको दूँगा। यह सुनकर उन द्विज (कलाधर)—