भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 127, कुल 656 में से

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पृष्ठ 127

उ०ख०-अ०४२ ] * भगवान् शंकर और त्रिपुरासुरका युद्ध * १२५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 ने उस दैत्य (त्रिपुरासुर)-से किसी वस्तुकी स्पृहा न होते हुए भी कहा— ॥ १९ ॥ द्विजरूपधारी गणेशजी बोले—मैं कैलासपर्वतपर गया था, वहाँ मैंने शिवजीद्वारा सम्यक् रूपसे पूजित उत्तम गणेशमूर्तिका दर्शन किया, जो समस्त मनोरथोंको पूर्ण करनेवाली थी। हे असुरेश्वर! यदि आपमें शक्ति है, तो उसे लाकर मुझे दीजिये; क्योंकि तीनों लोकोंमें विचरण करते हुए मैंने वैसी मूर्ति कहीं नहीं देखी ॥ २०-२१॥ अतः हे दैत्यश्रेष्ठ! उसमें मेरा मन आसक्त हो गया है, हे असुरेश्वर! उसे प्राप्तकर मैं कृतकृत्य हो जाऊँगा। मैं चराचरसहित तीनों लोकोंमें आपकी कीर्तिका विस्तार करूँगा कि 'त्रिपुरासुरसे श्रेष्ठ कोई दाता नहीं है, जो वांछित वस्तुको प्रदान करता है' ॥ २२-२३॥ दैत्य [त्रिपुरासुर] बोला—हे द्विजश्रेष्ठ ! मैं शंकरको अपना किंकर (सेवक) मानता हूँ, अन्य देवताओंकी तो मैं कोई गणना ही नहीं करता। मैं उस मूर्तिको लाकर आपको प्रदान करूँगा ॥ २४॥ ब्रह्माजी बोले— [हे व्यासजी!] ऐसा कहकर [उस दैत्यने] उन [द्विजश्रेष्ठ] कलाधरका आदरपूर्वक पूजन किया। उसने उन्हें दस ग्राम, गौएँ, वस्त्र, आभूषण, मोती, मूँगे तथा अन्य बहुत-से रत्न एवं रंकु मृगके रोमसे बने हुए कम्बल और अनेक प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित सैकड़ों दास-दासियाँ प्रदान किये। उस असुरने श्रेष्ठ अश्वोंसे युक्त एवं चाँदीसे निर्मित बहुत-से रथ भी उन्हें प्रदान किये, जो रथकी रक्षा करनेवाले कवच और सोनेके धुरोंसे युक्त थे ॥ २५-२७ ॥ उस (त्रिपुरासुर)-के द्वारा आग्रहपूर्वक दी गयी सम्पूर्ण दान-सामग्रियों आदिको ग्रहणकर वे [द्विजश्रेष्ठ] कलाधर अपने आश्रमको प्रस्थान कर गये। [उन्हें देखकर] उनकी पत्नी और सम्पूर्ण आश्रमवासी हर्षित हो गये ॥ २८ ॥ ब्रह्माजी बोले—[हे व्यासजी!] इस प्रकार इस सम्पूर्ण वृत्तान्तको नारदजीने देवताओंसे कहा। वे देवता भी उचित समयकी प्रतीक्षा करते हुए दिन व्यतीत करने लगे ॥ २९ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'नारदागमन' नामक इकतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४१॥ बयालीसवाँ अध्याय भगवान् शंकर और त्रिपुरासुरका युद्ध व्यासजी बोले—[हे ब्रह्मन् !] उन [द्विजश्रेष्ठ] कलाधरके चले जानेके बाद उस दैत्य (त्रिपुरासुर)-ने क्या किया? उस मंगलमयी चिन्तामणि [गणेशजीकी] मूर्तिको उसने कैसे लाकर उन कलाधरको प्रदान किया? हे चतुरानन ब्रह्माजी! यह सब मुझसे विस्तारपूर्वक कहिये; क्योंकि गजानन गणेशजीकी लीलाओंको संक्षेपमें सुनकर मैं तृप्त नहीं हो पा रहा हूँ ॥ १-२ ॥ ब्रह्माजी बोले—हे मुनिश्रेष्ठ ! उन [द्विजश्रेष्ठ कलाधर]-के चले जानेके बाद उस दैत्य त्रिपुरासुरने जो कुछ किया, वह सब मैं कहूँगा; हे मुने! उसे सावधान होकर श्रवण करो ॥ ३ ॥ [तदनन्तर] उसने मन्दराचलपर स्थित शिवके पास दो दूतोंको भेजा। उसने उन्हें यह सिखाया कि शिवके पास जाकर आदरपूर्वक मेरी बात उनसे कहो कि तुम्हारे भवनमें जो सम्पूर्ण मनोवांछित पदार्थोंको प्रदान करनेवाली चिन्तामणि-निर्मित मंगलमयी [गणेश] मूर्ति है, हे पार्वतीपते! उसे शान्तिपूर्वक दैत्यराज (त्रिपुरासुर)-को दे दीजिये ॥ ४-५॥ पाताल, स्वर्गलोक या मर्त्यलोकमें जो भी अद्भुत वस्तुएँ हैं, उन सबको वह दैत्य [राज] बलपूर्वक अपने घरमें लाया है, अतः हे देव ! उसे आप शीघ्र लाइये, उसे लेकर हम दोनों शीघ्र ही महाबली दैत्य त्रिपुरासुरके पास जायँ। यदि आप उसे शान्तिपूर्वक नहीं देंगे, तब वह पराक्रमी दैत्य उस मूर्तिको आपसे बलपूर्वक ले लेगा, तब आपको दुःखकी प्राप्ति होगी-उस दैत्यके इस प्रकारके वचन सुनकर वे दोनों दूत शिवके पास गये ॥ ६–८॥