श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 129, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंउ०ख०-अ०४३] * त्रिपुरासुरके साथ युद्धमें भगवान् शंकरकी पराजय * १२७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 धूलके शान्त हो जानेपर वीर योद्धा [शत्रुपक्ष]- | भाँति बह रहे थे। वह वीरोंके मनमें सन्तोष उत्पन्न के दूसरे योद्धाओंसे युद्ध करने लगे। उनमेंसे कुछ | करनेवाली और गृध्रों एवं शृगालोंके लिये प्रसन्नताका भालोंसे, कुछ खड्गोंसे, कुछ पत्थरपर घिसकर तेज | कारण थी ॥ ३२ ॥ किये गये बाणोंसे, कुछ ऋष्टि (दुधारी तलवार)-से, | उस नदीको देखकर गिरिशायी बलवान् भगवान् कुछ मुष्टिकासे, कुछ परशुसे, तो कुछ तोमरोंसे युद्ध कर | शंकर दैत्य त्रिपुरासुरके निकट गये, [तब] वह दैत्य भी रहे थे॥ २९ १/२ ॥ | त्रिपुरमें आरूढ़ होकर सेनाके साथ उनके सामने वहाँ मारे गये वीरों, घोड़ों और पैदल सैनिकोंके | आया ॥ ३३ ॥ रक्तसे एक रक्तकी नदी उत्पन्न हो गयी, जिसमें | तब दोनों नायकोंको युद्धोद्यत देखकर भगवान् शैवालकी भाँति केश प्रवाहित हो रहे थे। [उस नदीमें] | शंकर और त्रिपुरासुरके सैनिक बिना व्याकुल हुए परस्पर ढालें कछुओंकी भाँति, तलवारें मत्स्योंकी तरह और | द्वन्द्व-युद्ध करने लगे ॥ ३४ ॥ [योद्धाओंके कटे] सिर कमलसदृश प्रतीत हो रहे | उस समय वे अनेक प्रकारके आयुधों, दिव्य थे ॥ ३०-३१ ॥ | अस्त्र-शस्त्रों और वृक्षोंसे प्रहार कर रहे थे। उन भयंकरसे भी भयंकर प्रतीत होनेवाली उस नदीमें | योद्धाओंके नामों और युद्धविषयक चेष्टाओंको मैं छत्र आवर्त (भँवर)-की भाँति और कबन्ध वृक्षकी | [आगे] संक्षेपमें कहूँगा ॥ ३५ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'युद्धका वर्णन' नामक बयालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४२ ॥ तैंतालीसवाँ अध्याय त्रिपुरासुरके साथ युद्धमें भगवान् शंकरकी पराजय ब्रह्माजी बोले-[हे व्यासजी!] उस द्वन्द्व-युद्धमें | गजारोहियोंके साथ, अश्वारोही अपने सदृश अश्वारोहियोंके गिरिशायी भगवान् शंकर असुर सेनानायक त्रिपुरासुरसे, | साथ और पैदल सैनिक पैदल सैनिकोंके साथ युद्ध करने षडानन भगवान् स्कन्द प्रचण्डसे और नन्दी चण्डसे युद्ध | लगे। उस भयंकर संग्राममें अनेक प्रकारके वाद्योंके घोष, करने लगे ॥ १ ॥ | हाथियोंकी चिंघाड़, घोड़ोंकी हिनहिनाहट, वीरोंके बलवान् पुष्पदन्त भी भीमकायसे तथा भुशुण्डी | सिंहनाद और रथोंके धुरोंके घर्षणसे उत्पन्न ध्वनिसे [वह विषके सदृश प्राणहारी कालकूटसे युद्ध करने लगे ॥ २ ॥ | रणभूमि] अत्यन्त कोलाहलयुक्त हो गयी थी ॥ ६-७ ॥ वज्रदंष्ट्र और वीरभद्र-दोनों महान् बलशाली | उस युद्धमें कुछ वीर शस्त्रोंका त्याग करके विविध [परस्पर] युद्ध करने लगे। वहाँ [उस संग्राममें] | प्रकारसे मल्लयुद्ध करने लगे। वे अपने अंगोंसे दूसरेके बलवान् इन्द्रने भी दैत्य (त्रिपुरासुर)-के अमात्यसे युद्ध | अंगोंपर प्रहार कर रहे थे ॥ ८ ॥ किया। दैत्यपुत्र बलिके साथ रणदुर्मद [इन्द्रपुत्र] जयन्तने | तभी प्रचण्डने धनुषको कानतक खींचकर पत्थरपर और [दैत्यगुरु] शुक्राचार्यके साथ अस्त्रोंके ज्ञाता देवताओंके | घिसकर तेज किये गये नौ दृढ़ बाणोंसे षडानन आचार्य बृहस्पतिने युद्ध किया ॥ ३-४ ॥ | कार्तिकेयजीपर प्रहार किया ॥ ९ ॥ इस प्रकार देवताओं और दैत्योंके अनेक जोड़ोंमें | तब भगवान् कार्तिकेयने उन्हें अपनेतक पहुँचनेके युद्ध हुआ, जिसका वर्णन करनेमें मैं सैकड़ों वर्षोंमें भी | पहले ही झुकी हुई गाँठवाले बाणोंसे काटकर पाँच समर्थ नहीं हूँ ॥ ५ ॥ | बाणोंसे उसपर प्रहार किया। इससे भ्रान्तचित्त प्रचण्ड उस युद्धमें रथी रथियोंके साथ, गजारोही | मूर्च्छित होकर भूमिपर गिर पड़ा ॥ १० १/२ ॥