श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 130, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें१२८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[उधर] नन्दीने भी चण्डपर पाँच तीक्ष्ण बाणोंसे प्रहार किया, वह भी मूर्च्छित होकर सहसा धरतीपर गिर पड़ा। भीमकायने पुष्पदन्तपर दस बाणोंसे प्रहार किया, परंतु पुष्पदन्तने अपने तीक्ष्ण बाणोंसे उन्हें समरभूमिमें काट डाला और उसपर तीन बाणोंसे प्रहार किया, जिससे उसने भी भूतलका आश्रय ले लिया अर्थात् पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ११-१३ ॥ भुशुण्डीने पाँच बाणोंसे कालकूटको गिरा दिया। महाबली वीरभद्रने भी उस समरभूमिमें क्रोधित होकर वज्रदंष्ट्रपर चार तीक्ष्ण बाणोंका प्रहार किया, उन बाणोंका निवारण करके उसने वीरभद्रपर तीन बाणोंका प्रहार किया ॥ १४-१५ ॥ उन आते हुए बाणोंको वीरभद्रने शीघ्र ही तीन बाणोंसे काट डाला और वेगपूर्वक चलाये गये तीन बाणोंसे वज्रदंष्ट्रको गिरा दिया ॥ १६ ॥ इन्द्रने भी वज्रके प्रहारसे दैत्य त्रिपुरासुरके अमात्यको गिरा दिया। अनेक वीरोंका पतन हो जानेपर इन्द्रपुत्र जयन्तको मारनेकी इच्छासे तीक्ष्ण तलवार उठाये दैत्यपुत्र बलि उसके निकट आया। उसे इस प्रकार आते देखकर एक पंखयुक्त बाणसे [जयन्तने उसके] खड्गको काट डाला ॥ १७-१८ ॥ पुनः जयन्तने शीघ्र ही दैत्यपुत्र बलिपर तीन बाणोंसे प्रहार किया। उससे आहत होकर वह रक्तका वमन करते हुए मूर्च्छित होकर गिर पड़ा ॥ १९ ॥ इस प्रकार सम्पूर्ण सेनाके नष्ट-भ्रष्ट हो जानेपर देवसमूहद्वारा पीड़ित होकर चारों ओर पलायन कर रहे दैत्योंको देखकर कुछ विजयी प्रमथगण उनके पीछे दौड़ पड़े। इस प्रकार देवताओंकी विजय होने और अपनी सेनाके पलायन कर जानेपर भी त्रिपुरमें अधिष्ठित असुर त्रिपुरासुर स्वयं ही ईश्वर [भगवान् शंकर]-से युद्ध करनेके लिये आया। पहले उन दोनोंने शस्त्र-युद्ध किया और तत्पश्चात् अस्त्रोंसे युद्ध किया ॥ २०-२२ ॥ उस दैत्य त्रिपुरासुरने वरुणास्त्र छोड़ा, जिससे भयंकरसे-भी-भयंकर वर्षा होने लगी। उस समय अत्यधिक कुहासा छा जानेके कारण कुछ भी ज्ञात नहीं हो रहा था ॥ २३ ॥ उस कोलाहलपूर्ण, भयंकर और अत्यन्त कठिनाईसे जीते जा सकनेवाले युद्धमें कभी-कभी बिजलीकी चमकसे ही अपने-परायेका ज्ञान हो पाता था ॥ २४ ॥ वर्षा और आँधीसे पीड़ित उस अपनी सम्पूर्ण सेनाको उपलवृष्टिके भयसे दसों दिशाओंमें भागते देखकर गिरिशायी भगवान् शंकरने तुरंत वायव्यास्त्र छोड़ा। [उससे उत्पन्न] महान् वायुसे विशाल बादल खण्ड-खण्ड होकर आकाशमें बिखर गये ॥ २५-२६ ॥ दैत्योंकी सम्पूर्ण सेना वायुवेगसे घूमने लगी। पक्षियोंके पंखोंसे युक्त वीरोंकी पगड़ियाँ दूर-दूरतक उड़ गयीं। कुछ रथ, अश्व और हाथीसवार सैनिक गिरकर चूर-चूर हो गये, उन्मूलित वृक्षों और लताओंने सैनिकोंको आच्छादित कर लिया ॥ २७-२८ ॥ तब दैत्य त्रिपुरासुरने पर्वतास्त्रसे उस वायुका निवारण किया और अपने तूणीरसे एक बाण लेकर उसे आग्नेयास्त्रसे अभिमन्त्रितकर धनुषको कानतक खींचकर शिवकी सेनापर छोड़ दिया। उससे सहसा सब कुछ भस्म कर डालनेवाली अंगारोंकी वर्षा होने लगी ॥ २९-३० ॥ उस समय ज्वालामालाओंसे पीड़ित सम्पूर्ण शिवसेना उसे प्रलयकाल ही मानने लगी। उन देदीप्यमान ज्वालाओंसे एक महाभयंकर पुरुषका प्राकट्य हुआ, जिसका सिर नभतलको स्पर्श कर रहा था। उसका मुख भयंकर दाढ़ोंसे युक्त था। वह भूखसे पीड़ित और उच्च स्वरमें चिल्ला रहा था ॥ ३१-३२ ॥ वह अपनी सौ योजन विस्तृत जिह्वाको लपलपा रहा था और अपनी नासिकासे छोड़ी गयी वायुके वेगसे युद्धभूमिमें हाथियोंको घुमाते हुए उस सेनाका उसी प्रकार भक्षण करने लगा, जैसे पक्षिराज गरुड़ सर्पोंका भक्षण करते हैं ॥ ३३ १/२ ॥ तब उस पुरुषसे अत्यन्त पीड़ित भगवान् शंकरकी सेना भागने लगी और शिवके पीछे छिपकर 'रक्षा करो, रक्षा करो'-ऐसा कहने लगी ॥ ३४ १/२ ॥ तब गिरिजापति शिवने उस सेनाको 'भय मत करो'-ऐसा कहकर अभयदान दिया और पर्जन्यास्त्रका