श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 109, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंउ०ख०-अ० ३४ ] * इन्द्रद्वारा चिन्तामणितीर्थमें चिन्तामणि विनायककी स्थापना * १०७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 चौंतीसवाँ अध्याय इन्द्रद्वारा चिन्तामणितीर्थमें चिन्तामणि विनायककी स्थापना
नारदजी बोले—हे नरेन्द्र! वे जम्भासुरके शत्रु इन्द्र कदम्बवृक्षके नीचे एक श्रेष्ठ आसनमें स्थित होकर, मनका नियन्त्रण करके तथा नासिकाके अग्रभागमें दृष्टिको जमाकर षडक्षर मन्त्रका जप करने लगे ॥ १ ॥ मरुद्गणोंके स्वामी उन इन्द्रके [तपस्यामें रत होकर] वायुका भक्षण करते हुए सहस्र वर्ष व्यतीत हो गये। उनके शरीरदेशपर वल्मीकों (दीमककी बाँबियों)- के समूह बन गये, परंतु वे पर्वतकी भाँति स्थिर रहे ॥ २ ॥ तदनन्तर जो सर्वत्र गमनशील, सर्वविद्, उग्र तेजवाले, अपने तेजसे अग्नि, सूर्य और चन्द्रमाके तेजका तथा सबके नेत्रोंका आच्छादन करनेवाले, चार भुजाओंवाले, रत्नजटित किरीट और माला धारण करनेवाले, सुन्दर बाजूबन्द धारण करनेवाले, कुण्डलोंसे सुशोभित कपोलोंवाले हैं, जो मोतियोंकी माला, नूपुर और मूल्यवान् कटिसूत्र धारण किये हुए हैं; जो कमलके समान नेत्रवाले, महान् कमलनालके सदृश विशाल सूँड़वाले, कमलके फूलोंकी माला धारण करनेवाले हैं—ऐसे सिन्दूरविलेपित विग्रहवाले अखिलदेवमूर्ति भगवान् गणेश प्रसन्न होकर इन्द्रके समक्ष प्रकट हुए ॥ ३–५ ॥ उन्हें देखकर इन्द्र भयभीत हो गये कि 'यह क्या है?', 'यह कौन आ गया?', 'मात्र अस्थि और प्राण- अवशेष मैं कैसे जीवित बचूँगा ?' ॥ ६ ॥ 'न जाने किसने इस महान् विघ्नको बनाया है और आज मेरे सम्मुख उपस्थित कर दिया है?' [इसे देखकर] मेरे शरीरसे पसीना निकल रहा है और शरीर पीपलके पत्तेकी तरह काँप रहा है ॥ ७ ॥ इन्द्रकी इस प्रकारकी व्याकुलताको सर्वज्ञ भगवान् गणेश जान गये और उन विघ्नविनायकने मधुर वाणीमें महेन्द्रसे कहा— ॥ ८ ॥ विनायक बोले—हे देवेन्द्र! भय न करो। हे देवराज! तुम मुझे कैसे नहीं जानते! जो निर्गुण, निर्विकार, चिदानन्द, सनातन, कारणातीत, अव्यक्त, जगत्के कारण-का-कारण है; जिस परमात्माका तुम निश्चल होकर इस मन्त्रसे [जप करते हुए] सदा ध्यान करते हो, जिसके [दर्शनके] लिये तुम चिरकालतक श्रान्त रहे हो, वही मैं तुम्हारे समक्ष प्रकट हुआ हूँ, तुम्हारी इस तपस्यासे प्रसन्न होकर मैं तुम्हें वर देनेके लिये यहाँ आया हूँ ॥ ९–११ ॥ हे अनघ! अनन्त ब्रह्माण्डोंका सृजन, पालन और संहार मेरे द्वारा ही होता है—ऐसा तुम जानो और तुम जो चाहते हो, वह वर मुझसे माँग लो ॥ १२ ॥ नारदजी बोले—उन गणेशजीके मनोहर वचनोंको सुनकर बलासुरहन्ता इन्द्रने विशाल विग्रहवाले देवाधिदेव भगवान् विनायकको पहचान लिया ॥ १३ ॥ तब उन शचीपति इन्द्रने शीघ्र ही उठकर परम भक्तिपूर्वक उन्हें नमस्कार किया और उन प्रत्यक्ष ब्रह्मस्वरूप गणेशजीसे कहा— ॥ १४ ॥ इन्द्र बोले—हे महाबाहो! सृजन, पालन और संहार करनेवाले आपके गुणोंको दिक्पालोंसहित ब्रह्मादि देवता भी नहीं जानते हैं। सौ [अश्वमेध]-यज्ञोंके सम्पादनसे समुद्भूत पुण्यके फलस्वरूप जो मुझे इन्द्रपद दिया गया है, वह भी कृत्रिम ही है; [क्योंकि सबके वास्तविक स्वामी तो आप ही हैं।] उसमें भी प्रायः अनेक विघ्न होते ही रहते हैं ॥ १५-१६ ॥ हे गजानन! मुझे आपकी महिमा कैसे ज्ञात हो सकती है? हे महेश्वर! जिसपर आपकी पूर्ण कृपा होगी, उसे ही आपकी महिमाका ज्ञान होगा। हे विघ्नकारण! उसीके पास आपके गुणों एवं रूपोंके वर्णनकी शक्ति होगी ॥ १७-१८ ॥ आप स्वयं निराधार होते हुए भी अखिल विश्वके आधार हैं। आप नित्य ज्ञानरूप, अजर और अमर हैं। आप नित्य आनन्दस्वरूप, पूर्णब्रह्म, मायापति, क्षर, अक्षर, परमात्मा, विश्वरूप और अखिलेश्वर हैं। उग्र तपस्याके द्वारा आपके स्वरूपका ज्ञान प्राप्तकर सनकादि
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